जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝
जामवन्त रामायण का ऐसा पात्र है जो दीर्घजीवी, बुद्धिमान और अत्यन्त शक्ति सम्पन्न है। समुद्रतट पर खड़े नर-वानरों में से कोई भी समुद्र पार नहीं जा पा रहा था तब उसने हनुमान जी की उस क्षमता को पहचाना जिस क्षमता का बोध स्वयं हनुमानजी को भी नहीं था। ऐसी शक्ति उनके भीतर सिन्नहित थी कि वे छलाँग लगा कर समुद्र पार कर सकते हैं। जामवन्त ने उन्हें इस कार्य के लिये तैयार कर दिया।
जैसे बिजली से चलने वाली मोटर के स्टार्टर स्विच को दबाने से मोटर अपनी क्षमता से चलने लग जाती है जबकि बिजली न तो स्टार्टर की अपनी है न ही मोटर की ताकत इस स्विच से आती है। स्विच का काम है बिजली को मोटर से मिलवा देना। इस स्टार्टर का स्टार्टिंग स्विच एक बार दब कर छूट जाता है तब भी मोटर चलती रहती है। जामवन्त ने भी ऐसा ही किया, हनुमान जी से उनका परिचय उनके भीतर मौजूद शक्ति से करा दिया और फिर अलग हो गए। हनुमान जी को न तो कोई उपदेश दिया न कोई शिक्षा दीक्षा, किया तो बस केवल अन्तर्बोध कराने का उपक्रम ही।
इसी तरह हमारे भीतर मौजूद उस तुरीय अवस्था तक कोई और नहीं ले जा सकता, यहाँ तक कि गुरू भी नहीं। गुरू हमें मन के द्वार तक लाकर और युक्ति बता कर छोड़ देता है। इसके आगे की यात्रा हमें अकेले ही करना है। याने हमारे जीवन में मोटर के स्टार्टिंग स्विच की तरह कोई व्यक्ति चाहिए, एक जामवन्त चाहिए जो हमें अन्तर्बोध करा दे। हमारे भीतर केवल हम ही जा सकते हैं कोई और नहीं लेकिन हमें अपने भीतर कुछ है इसका ज्ञान स्वतः पैदा नहीं होता इसे जनाने कोई आता है तभी हम हमारी खोज यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं इसलिये निश्चित रूप से हमें अपने जीवन में जामवन्त चाहिए। यह व्यक्ति गुरू हो सकता है, आलोचक हो सकता है और शायद हमारा शत्रु भी हो सकता है, विषम परिस्थितियाँ भी उद्दीपक हो सकती हैं।
यदि देखा जाय तो जीवन में कुछ ही सेकण्ड के अन्तराल होते है जैसे स्टार्टर स्विच का काम क्षण भर का होता है। वे क्षण जीवन के टर्निंग पॉइन्ट होते हैं जो हममें अपनी सुप्त पड़ी अन्तर्धारा से अथवा बह रही असीम शक्तियों से साक्षात्कार करा दे। यहाँ से प्रारंभ होती है हमारी अन्तर्यात्रा।
मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?
है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?
मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गया
यहाँ से तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
"अहं ब्रह्मास्मि"
पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई
शायद मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों से जन्म जन्मान्तरों से
जामवन्त रामायण का ऐसा पात्र है जो दीर्घजीवी, बुद्धिमान और अत्यन्त शक्ति सम्पन्न है। समुद्रतट पर खड़े नर-वानरों में से कोई भी समुद्र पार नहीं जा पा रहा था तब उसने हनुमान जी की उस क्षमता को पहचाना जिस क्षमता का बोध स्वयं हनुमानजी को भी नहीं था। ऐसी शक्ति उनके भीतर सिन्नहित थी कि वे छलाँग लगा कर समुद्र पार कर सकते हैं। जामवन्त ने उन्हें इस कार्य के लिये तैयार कर दिया।
जैसे बिजली से चलने वाली मोटर के स्टार्टर स्विच को दबाने से मोटर अपनी क्षमता से चलने लग जाती है जबकि बिजली न तो स्टार्टर की अपनी है न ही मोटर की ताकत इस स्विच से आती है। स्विच का काम है बिजली को मोटर से मिलवा देना। इस स्टार्टर का स्टार्टिंग स्विच एक बार दब कर छूट जाता है तब भी मोटर चलती रहती है। जामवन्त ने भी ऐसा ही किया, हनुमान जी से उनका परिचय उनके भीतर मौजूद शक्ति से करा दिया और फिर अलग हो गए। हनुमान जी को न तो कोई उपदेश दिया न कोई शिक्षा दीक्षा, किया तो बस केवल अन्तर्बोध कराने का उपक्रम ही।
इसी तरह हमारे भीतर मौजूद उस तुरीय अवस्था तक कोई और नहीं ले जा सकता, यहाँ तक कि गुरू भी नहीं। गुरू हमें मन के द्वार तक लाकर और युक्ति बता कर छोड़ देता है। इसके आगे की यात्रा हमें अकेले ही करना है। याने हमारे जीवन में मोटर के स्टार्टिंग स्विच की तरह कोई व्यक्ति चाहिए, एक जामवन्त चाहिए जो हमें अन्तर्बोध करा दे। हमारे भीतर केवल हम ही जा सकते हैं कोई और नहीं लेकिन हमें अपने भीतर कुछ है इसका ज्ञान स्वतः पैदा नहीं होता इसे जनाने कोई आता है तभी हम हमारी खोज यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं इसलिये निश्चित रूप से हमें अपने जीवन में जामवन्त चाहिए। यह व्यक्ति गुरू हो सकता है, आलोचक हो सकता है और शायद हमारा शत्रु भी हो सकता है, विषम परिस्थितियाँ भी उद्दीपक हो सकती हैं।
यदि देखा जाय तो जीवन में कुछ ही सेकण्ड के अन्तराल होते है जैसे स्टार्टर स्विच का काम क्षण भर का होता है। वे क्षण जीवन के टर्निंग पॉइन्ट होते हैं जो हममें अपनी सुप्त पड़ी अन्तर्धारा से अथवा बह रही असीम शक्तियों से साक्षात्कार करा दे। यहाँ से प्रारंभ होती है हमारी अन्तर्यात्रा।
मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?
है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?
मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गया
यहाँ से तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
"अहं ब्रह्मास्मि"
पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई
शायद मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों से जन्म जन्मान्तरों से
