Thursday, 15 December 2016

जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝

जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝

जामवन्त रामायण का ऐसा पात्र है जो दीर्घजीवी, बुद्धिमान और अत्यन्त शक्ति सम्पन्न है। समुद्रतट पर खड़े नर-वानरों में से कोई भी समुद्र पार नहीं जा पा रहा था तब उसने हनुमान जी की उस क्षमता को पहचाना जिस क्षमता का बोध स्वयं हनुमानजी को भी नहीं था। ऐसी शक्ति उनके भीतर सिन्नहित थी कि वे छलाँग लगा कर समुद्र पार कर सकते हैं। जामवन्त ने उन्हें इस कार्य के लिये तैयार कर दिया।
जैसे बिजली से चलने वाली मोटर के स्टार्टर स्विच को दबाने से मोटर अपनी क्षमता से चलने लग जाती है जबकि बिजली न तो स्टार्टर की अपनी है न ही मोटर की ताकत इस स्विच से आती है। स्विच का काम है बिजली को मोटर से मिलवा देना। इस स्टार्टर का स्टार्टिंग स्विच एक बार दब कर  छूट जाता है तब भी मोटर चलती रहती है। जामवन्त ने भी ऐसा ही किया, हनुमान जी से उनका परिचय उनके भीतर मौजूद शक्ति से करा दिया और फिर अलग हो गए। हनुमान जी को न तो कोई उपदेश दिया न कोई शिक्षा दीक्षा, किया तो बस केवल अन्तर्बोध कराने का उपक्रम ही।
इसी तरह हमारे भीतर मौजूद उस तुरीय अवस्था तक कोई और नहीं ले जा सकता, यहाँ तक कि गुरू भी नहीं। गुरू हमें मन के द्वार तक लाकर और युक्ति बता कर छोड़ देता है। इसके आगे की यात्रा हमें अकेले ही करना है। याने हमारे जीवन में मोटर के स्टार्टिंग स्विच की तरह कोई व्यक्ति चाहिए, एक जामवन्त चाहिए जो हमें अन्तर्बोध करा दे। हमारे भीतर केवल हम ही जा सकते हैं कोई और नहीं लेकिन हमें अपने भीतर कुछ है इसका ज्ञान स्वतः पैदा नहीं होता इसे जनाने कोई आता है तभी हम हमारी खोज यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं इसलिये निश्चित रूप से हमें अपने जीवन में जामवन्त चाहिए। यह व्यक्ति गुरू हो सकता है, आलोचक हो सकता है और शायद हमारा शत्रु भी हो सकता है, विषम परिस्थितियाँ भी उद्दीपक हो सकती हैं।
यदि देखा जाय तो जीवन में कुछ ही सेकण्ड के अन्तराल होते है जैसे स्टार्टर स्विच का काम क्षण भर का होता है। वे क्षण जीवन के टर्निंग पॉइन्ट होते हैं जो हममें अपनी सुप्त पड़ी अन्तर्धारा से अथवा बह रही असीम शक्तियों से साक्षात्कार करा दे। यहाँ से प्रारंभ होती है हमारी अन्तर्यात्रा।

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गया
यहाँ से तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
"अहं ब्रह्मास्मि"

पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई

शायद  मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों से जन्म जन्मान्तरों से

धर्म निरपेक्षता

धर्म निरपेक्षता की परिभाषा आये दिन  बदलती रहती है जो मात्र एक राजनैतिक स्टंट है। धर्म निरपेक्षता के पहले धर्म की पहचान की जानी चाहिए। धर्म केवल उपासना की, पूजा की, सोच की, विचारों की पद्धति पर ठहरा दिया गया है। विश्व को उस धर्म मार्ग की आवश्यकता है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को अमन चैन से रख सके। इन तीनाे की परवाह केवल वेदों ने की है। इनके सिद्धान्तो पर आधारित धर्म मार्ग केवल सनातन धर्म है। बरछी -भालों, एटम बॉम्ब की भाषा बोलने वाले धर्म का अर्थ ही नहीं जानते। वे समझाते हैं कि जो वे कह रहे है वही धर्म की लेटेस्ट लाल किताब है। धर्म के सिद्धातों में कट्टर पांथियों ने यू टर्न बना दिये हैं। विकृति लगभग सभी जगह आई है कहीं ९०प्रतिशत तो कहीं १० प्रतिशत।
इतना जरुर तय है कि ॐ शान्ति अथवा शान्ति शब्द किसी जगह सुनाई देता है तो वह केवल सत्य सनातन धर्म मार्ग लेकिन फ़िजा में इतना शोर घुला है कि 'शान्ति' शब्द सुनाई ही नहीं पड़ता। अब तो यह लगता है कि शान्ति शब्द का घोष भी इस शोर से भी ऊँची आवाज में ही कहना पड़ेगा।
श्री कृष्ण की उठी हुई ऊँगली गीता के उद्बोधन का माध्यम जरूर है परन्तु गीता नहीं सुनी तो वही उँगली सुदर्शन धारण कर सकती है।
एक भीषण सत्य है कि विश्व शान्ति के गीत गाने वाले शक्तिशाली राष्ट्र अमरीका ऐसी परमाणु अप्रसार सन्धि करता है कि उसके भण्डार में तो वह शक्ति भरी रहे पर आपकी खाली रहे।
अजीब बात है क्लास में शान्ति कायम करने के लिए मास्टर टेबल पर बेंत ठोंकता है और बच्चे चुप हो जाते हैं। लेकिन अब ऐसे मास्टर तैयार हो गए हैं कि सारी क्लास में से एक एक बच्चे को पीट-पीट कर दूसरे बच्चों को चुप रहने की सलाहियत दी जाती है।
धर्म की व्याख्या तो बदली नहीं जा सकती लेकिन अधर्म की व्याख्या करने का समय आगया है। धर्म की व्याख्या करने जाएँगे तो अपने लोग ही हमें कटघरे में खड़ा कर देंगे। अधर्म की व्याख्या एक दम सीधी सपाट है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को नुक्सान पहुंचाता है, उनके अस्तित्व के लिए खतरा है वह अधर्म ही है।
इन जीवन मूल्यों के प्रकाश में धर्म, अधर्म और धर्मनिरपेक्षता का भी पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि विधर्मी अपने हित साधन न कर सके।
सिर्फ सेवा के बल पर समाज और राष्द्र की चिन्ता और चिन्तन नहीं हो पाएगा। जमीनी क्रान्ति के पहले वैचारिक क्रान्ति की आवश्यकता है। क्रान्ति केवल "मारकाट" जैसे शब्दों का पर्याय नहीं है अपितु वह एक सुगठित क्रिया कलापों का ही संयोजन है जो किसी भी हालत में अपना मूल मकसद नहीं भूलता।

संकल्प में शिवत्व हो

संकल्प में शिवत्व हो
अगर आपके पास स्केल जैसा कोई साधन न हो तो सरल रेखा खींचना आसान नहीं है। वहीँ यदि पेचीदा (वक्र रेखा) खीचना हो तो वह सरल है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि आपके विचार कभी भी सरल रेखा में नहीं चलते। एक सिरे से सोचना शुरू करते हो तो थोड़ी ही देर में आप पाओगे कि आप विषय से हट कर कहीं ओर निकल गए हो। जैसे कि आपने सोचना है 'कल सुबह घूमने जाऊँगा।' तुरन्त कुछ और समानान्तर प्रवाह चलने लगेंगे; नींद खुलेगी कि नहीं? बरसात तो नहीं हो जाएगी? साथ जाने वाले मित्र आएँगे कि नहीं? आदि आदि।
सरल सी बात भी पेचीदा लगेगी। वस्तुतः सरल को सरल बनाए रखना भी कठिन है जिसका मूल कारण विचारों की पेचीदगी है। विचारों को शुद्ध करने का अर्थ है उनमें मिलावट को रोकना। आपके विशुद्ध उद्देश्यपूर्ण विचारों में भ्रम पैदा करने वाले विचारों का अपमिश्रण होना ही पेचीदगी है। विचारों आना और प्रवाहित होना मनुष्य का नैसर्गिक नियम है। विचार कहाँ से चलेंगे, किधर-किधर जाएंगे, मकाम पर पहुंचेंगे कि नहीं, इस पर आपका कोई नियंत्रण है कि नहीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जो सबको मालूम है।

इसका हल केवल और केवल आपके मन में है। वेद कहता है- तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु। अर्थात् मेरे मन में शुभ-संकल्प हों। जहाँ आपके संकल्प दृढ़ होंगे वहां विकल्प अपने आप क्षीण हो जाएंगे। मन में विकल्पों का होना आज के सन्दर्भों में नकारात्मक विचारों का आधिक्य होना है। स्पष्ट अर्थों में देखा जाए तो विचारों में भ्रम की उपस्थिति ही विकल्पों को जन्म देती है। विकल्प का आधार तर्कों की जमीन पर खड़ा होता है। तर्क बुद्धि का विषय है जो मन से परे है।
संकल्प में शिवत्व है तो डर कैसा? महात्मा गांधी ने संकल्प किया कि मेरा रास्ता अहिंसा और सत्य का होगा। यह संकल्प ही था कि रास्ता तो केवल यही होगा तभी तो विकल्पों का पर्यवसान हुआ होगा। भीतर से विचारों में महात्मा गांधी बन कर देखो, बड़ी कठिनाई में पड़ जाओगे। कई विकल्प तो ऐसे होंगे कि आपका शरीर और मन पक्षाघात के शिकार हो जाएँगे। इसलिए संकल्प शिव हों। विकल्प को रास्ते से हटा दो, जो कठिन लगता है वह भी सरल हो जावेगा।

युवा कौन -

युवा कौन -


थके तन और हारे मन से कोई युवा नहीं हो सकता, चाहे उसकी उम्र कुछ भी क्यों न हो?
दुनिया में जवान-बूढ़े और बूढ़े-जवान देखे जा सकते हैं।
जिसके मन में उत्साह हो, उमंग हो, जो जीवन में कोई लक्ष्य रखता हो बस वही युवा है।
वस्तुतःकुछ कर गुजरने के संकल्पित मन वाला व्यक्ति ही युवा है, जो वर्तमान को बेहतर बनाने के लिये सोचता और करता है वह युवा है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो ''युवा'' आयु की अवस्था नहीं मन की अवस्था है।

युवाओं का सर्वश्रेष्ठ गुण है की वह ऊर्जा से ओत-प्रोत रहता है, वह अपनी ऊर्जा को सुनियोजित करता है। वह विश्व में कुछ अनुठा करना चाहता है। वह भाग्य पर नहीं कर्म पर विश्वास रखता है, परिस्थितियों का दास नहीं उसका निर्माता है, नियंत्रण कर्ता और स्वामी है। मेरा देश विश्व का सर्वाधिक युवाओं से संपन्न है।

मूल स्वभाव

मूल स्वभाव
बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। आग का नैसार्गिक गुण है तपाना और जलाना। क्या केवल आग ही हमारे शरीर को जला सकती है ? ऐसा नही है। पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है।

यह अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है लोकन ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है, ऊर्जा का अशोषण अथवा ऊर्जा का निक्षेप। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी जब वापस अपने मूल स्वरूप में लौटता है तब संचित ऊर्जा बाहर निकल जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अपने भीतर अन्तर्निहित हो या फिर किसी अन्य स्रोत से मिले परन्तु ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता है। ऊर्जा किसी न किसी स्रोत से ही मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है।
स्थितिज और गत्यात्मक ऊर्जा 

"डर का डर"

"डर का डर"
तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्

"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है । जैसे नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि  बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का  अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है। इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत करो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"। भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम  रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं। वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।

स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो जाती  हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है। स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में  दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ?  वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा। 

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥

एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं  "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं  हैरान था कि कर मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी पर आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।
यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल मैं रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।
दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में मैं ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं अद्वैत हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।

जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन  इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर देखें।

यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका साक्षी बना रहूँगा। यह काल का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है,आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।

मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

एक खिलौने से एक बच्चा खेल रहा था। खिलौना बड़ा अजीब था, एक विदूषक की शक्ल-सूरत का, लंबा धड़ पर पैर नहीं थे। बस धड़ का निचला भाग बे पैंदे के लौटे जैसा। बच्चे ने उसे दाहिनी तरफ दबा कर जमीन पर  टिका दिया। लेकिन जैसे ही दबाव हटा विदूषक खड़ा हो गया जैसे मुँह चिढ़ा रहा हो कि कुछ भी प्रयास कर लो मैं फिर खड़ा हो जाऊँगा। चाहे जिस दिशा में चाहे जितना झुकाता वह वापस खड़ा हो जाता। बच्चे ने विदूषक के कान में जाकर पूछा कि जब तक मैं प्रयास करता हूँ तुम वैसे ही रहते हो और छोड़ते ही मेरा सारा प्रयास विफल हो जाता है, आखिर ऐसा क्यों? वह बोलता तो कुछ है ही नहीं बस करता ही करता है। असल में कम्पनी ने ही उसे ऐसा बनाया है। उसमें यह चंचलता भर दी है। विज्ञान में इसे ग्रेविटी टॉय कहते हैं। ग्रेविटी एक नैसर्गिक सिद्धान्त है। आदमी का नहीं प्रकृति का बनाया हुआ है। हमारा स्वभाव भी इसी तरह का है। इसे योग अथवा अध्यात्म में वृत्ति कहते हैं। जिस चित्त की वहाँ बात होती है वह यह विदूषक जैसा ही है। हम उसकी वृत्ति के निरोध करने में रत रहते हैं लेकिन प्रयास हटते ही वह पुनः अपनी वृत्ति में लौटने का प्रयास करता है। यह चित्त अन्तःकरण की क्रियाशील तीसरी और अन्तिम इकाई है। अन्तिम होने से सारी क्रियाएं यहाँ से सुपर कमाण्डो जैसी होती है। इसके बाद की इकाई बस कन्ट्रोल रूम है जिसे माण्डूक्य उपनिषद् ने स्पष्ट करके बताया है जिसे अहंकार कहा है। यह खुद तो कुछ करता नहीं है लेकिन इसके कहे आदेश के बिना कोई क्रिया अथवा कर्म असंभव है। ....


पतन्जलि योग सूत्र के समाधिपाद के तीसवें सूत्र में चित्त के दोषों में से नवाँ दोष बताया है-"अनवस्थितत्व"। मतलब चित्त का यह स्वभाव है कि आप उसकी स्थिति बदलने का प्रयास करते हैं तो भी वह वहाँ अवस्थित नहीं रहता, टिकता नहीं क्योंकि यह किसी अन्य स्थिति में रुक पाने का स्वभाव नहीं है।

Monday, 7 November 2016

अन्तर्यात्रा


आँख खुली है तो जगत दिखता है, बन्द करें तो दिखना बन्द हो जाता है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ जगत की ओर होती है तो वे सब सूचनाएँ भीतर की ओर भेजती ही रहती हैं; मन उसे पढ़ता रहता है फिर उसे जो करना है करता रहता है। न चाहे तो सूचनाएँ द्वार पर अटकी रह जाती हैं। भीतर जाएँगी तो प्रभाव होगा अन्यथा कुछ भी होता रहे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उबलता हुआ पानी थर्मस फ्लास्क में भर कर फ्रिज में रख दें तो बाहर ठंडक होगी परन्तु फ्लास्क के भीतर गर्मी बनी रहेगी क्योंकि बाहर से आने वाली ठंडक में अवरोध उत्पन्न हो गया।
हमारे शरीर के दो हिस्से किए जाएँ जिसमें से एक हो बहिःकरण और दूसरा अन्तःकरण। बहिःकरण है हमारा हाड़-मांस का स्थूल शरीर, समस्त इन्द्रियाँ, प्राण आदि तथा अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। अन्तःकरण और बहिःकरण ओत-प्रोत है इन्हें अलग अलग नहीं किया जा सकता।8 फिर भी बहिर्जगत और अन्तर्जगत को अपने-अपने कर्मक्षेत्रों में निरोध किया जा सकता है अर्थात् दोनों के अपने अपने क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रमों को एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना उन्हें अपनी अपनी जगह बरकरार रहने दिया जा सकता है। जैसे फ्रिज की ठण्डक  फ्रिज में रहे और थर्मस फ्लास्क की भीतरी ऊष्मा भीतर रहे। इसमें फ्लास्क का ढक्कन अत्यन्त महत्वपूर्ण बैरियर है। ठीक इसी तरह शरीर में यह स्थान है मन का द्वार है। बहिःकरण में चल रहे आवगों, संवेगों, सुखों, दुःखों और संवेदनाओं को अन्तःकरण तक पहुंचने से रोक देना हँसी खेल नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में बताए गए समत्व योग से यह सिद्ध हो सकता है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
हे धनञ्जय ! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्दिमें समान बुद्धिवाला होकर, योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोंको कर; यही समत्व योग कहलाता है ।। ४।।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।६/३२।।
हे अर्जुन जो पुरुष अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है वह परम योगी माना गया है।
हम यह नहीं जानते कि बहिःकरण से शक्तिशाली अन्तःकरण होता है। हमारा बाहर सब कुछ भीतर के संकल्पों और निर्देशों से ही क्रियान्वयित होता है। अर्जुन ने निश्चय किया कि उसे युद्ध करना है और वह युद्ध भूमि में उपस्थित हो गया; यह भीतर का निर्णय था। सेना में दोनों ओर अपने लोग ही मरने-मारने के लिए आमने सामने खड़े हो गए यह देख कर  उसे भीतर ही ग्लानि हुई और वह कहने लगा कि मुझे युद्ध नहीं करना; यह भीउसके अन्तःकरण से ही निर्णय आया था। और अन्त में वह गीतोपदेश सुनता है और कहता है स्मृतिर्लब्धा, गतसंदेहाः यह भी भीतर ही भीतर घटित हुआ था। अर्थात् जो कुछ बाहर हुआ वह सब अन्दर ही अन्दर, अन्तर्जगत में घटित संयोजनों का ही परिणाम था। युद्ध जैसे कठोरतम निर्णय बाहर के निर्णय नहीं थे। वे सब अन्तर्जगत के उद्वेलन और परिणाम थे।
मन के द्वार को यदि सम्यक् रूप से रेगयूलेट किया जा सके तो विलक्षण उपलब्धियाँ हो सकती हैं।

           अनवरत.......

Friday, 4 November 2016

आईने का सच


आईने कई तरह के होते हैं. सरल-सपाट, उथले-उभरे, धंसे-गहरे. सरल-सपाट आइना दर्शक की छबि विकृत नहीं करता, उभरे उथले आईने पास की वास्तु दूर और छति बताते है वहीँ धंसे-गहरे आईने छबी को उल्टा-पुल्टा कर देते हैं. आईने की इन छबियों में जीवन एवं दर्शन के कुछ साम्य अवस्थाएँ बताती हैं. यह देखने के लिए हमें आईने के सामान्य गुणों को जानना होगा .
यहाँ हम केवल सरल सपाट आईने की ही चर्चा करेंगे. लोग कहते हैं आइना झूठ नहीं बोलता. यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है केवल आभास है. यह ज्यादातर सच और थोडा थोडा झूंठ दिखाता है. चलिए आईने के सामने हम एक परिदृश्य के साथ खड़े होते है. नीचे जमीन और ऊपर आसमान है. मेरे दाएं हाथ में फूलों का एक गुलदस्ता है. मैं यहाँ परमात्मा की प्रार्थना गा रहा हूँ. मेरे आगे-पीछे दायें-बाएं लोग आ-जा रहे हैं. मेरे पीछे लगे एक नल से पानी बह रहा है, बहता हुआ पानी मेरे पावों को गीला कर रहा है. गुलदस्ते से भीनी-भीनी खुशबू आ रही है. कुछ लोग मुझ से आगे आईने की ओर और कुछ मेरे पीछे आईने से दूर जा रहे हैं. वातावरण बिजली से चालित बल्ब की रौशनी से प्रकाशित हो रहा है.
आईने के भीतर और बाहर के परिदृश्य में जो झूंठ और सच दिखाई दे रहा है वह कुछ इस प्रकार है –
१ आईने में जमीन नीचे, आसमान ऊपर ही लेकिन दायें की बजाय बाएं हाथ में गुलदस्ता दिखाई दे रहा है. सर ऊपर, पैर नीचे .जो लोग आईने की ओर जा रहे हैं वे आते हुए लेकिन मुझसे पीछे जाते हुए वास्तव में दूर ही जाते दिखाई दे रहे हैं. इसी तरह मेरे बाएं हाथ की ओर आते हुए लोग आईने में मेरे दाहिने हाथ के करीब आते दीख रहे हैं.
२ आइना एक दीवार पर लगा है, दीवार के उस पार एक असत्य अर्थात सदैव न रहने वाला संसार दिखी दे रहा है. मैं सामने खड़ा हूँ तो आइना मुझे लेकिन मेरे हट जाने पर दूसरा व्यक्ति आ जाएगा तो वह उसे दिखाने लगेगा. मेरी उपस्थिति मेरे आईने के सामने होने पर ही आइना दिखा सकेगा लेकिन वहीँ मेरा अस्तित्व रहने पर भी आईने के सामने न होने पर आइना मुझे नहीं दिखा सकेगा.
३ मेरे पैर पानी मे गीले होने से ठंडक मह्सूस करा रहे हैं. बहता पानी आईने के उस पार बहता दीख रहा है लेकिन आईने को गीला नहीं कर रहा है. गुलदस्ते के फूलों की महक आईने में नहीं हो सकती,इन्हें केवल इस पार ही महसूस किया जा सकता है, वहां केवल आभासित हो रहा है. मेरे चेहरे पर आये भाव मुझे अपनी आँखों से इस पार नहीं लेकिन उस पार आईने में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं.
४ आईने के इस पार और उस पार दृश्य रौशनी में दिखाई दे रहा है और रौशनी के जाते ही दिखाई देना बंद हो जाते हैं.इस स्थिति में मैं भी हूँ आइना भी है. सब कुछ है लेकिन रौशनी के अभाव में एक मौन खड़ा हो जाता है, आभास ही नहीं होता. रौशनी के आते ही फिर दिखाई देने लगता है.
इस स्थिति में मैं अन्दर सम्पूर्ण रूप से वही हूँ जीवन वैसा ही चल रहा है, स्वास है, धड़कन है, सभी इन्द्रियां अपनी- अपनी जगह हैं. उनके विषय ग्रहण करने की क्षमता उनमें मौजूद भी है, अंतर केवल इतना है कि वे फ़िलहाल आईने के उस पार कोई हरकत नहीं देख पा रही हैं, अगर रौशनी बहाल हो जाए तो फिर वही चलने लग जावेगा.
५ आईने के इस पार मैं हूँ मैं स्वयं जीवित हूँ यह जो जीवन की चेतना है मेरे शरीर के जीवित होने का कारन और प्रमाण है. आईने के इस पार मैं जीवन के स्रोत चेतना को लिए घूमता हूँ लेकिन चेतना का साकार दर्शन संभव नहीं. चेतना के नहीं रहने पर यह शरीर सभी भौतिक तत्वों के रहते हुए भी वैसा कुछ नहीं कर पाएगा जो पहले कर रहा था. न आईने के इस पार कुछ भी महसूस कर सकेगा न आईने के उस पार उसे कुछ महसूस होता हुआ जाना जा सकेगा. अलबत्ता इस पड़े हुए मै को कोई और आ कर देख सकता है. इस चेतना को कोई महसूस नहीं कर सकता, न ही पकड़ सकता, न इसमें गंध है न स्वाद है, न छूने योग्य है लेकिन इसके होने से ही “मै हूँ” इसका आभास है.
६ आईने के इस पर परिदृष्य बदल जाने पर आइना उसे उसी तरह दिखने लगेगा जिस तरह पहिले दिखा रहा था.
आईने का यह सच कोई अनोखा नहीं है. सब अच्छी तरह जानते हैं. यहाँ इस तथ्य को एक घटना की तरह लिया गया है जिससे माण्डुक्य उपनिषद में प्रतिपादित आत्मा के चतुष्पाद को समझने में आसानी होगी. इन चतुष्पादों की व्याख्या से ओंकार के सम्पूर्णता के लक्षणों को समझने में भी सहायता मिलेगी.
अष्टांग योग में के छटवें चरण में ध्यान की साधना बतायी गई है. ध्यानावस्था को प्राप्त करने में उक्त सिद्धांतों को समझने में बहुत आसानी होगी. ध्यान करने के लिए इसके पूर्व के पाँच चरणों का अभ्यास और व्यव्हार अपने आचरण में उतारना अत्यंत आवश्यक होगा. ध्यानावस्था योग का सबसे महत्वपूर्ण अंग है. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ध्यान साधना अपने अन्दर उतरने का प्रथम सोपान है. इसके पूर्व के पाँच चरण केवल शरीर को बाहर से तैयार करने के उद्यम है एवं बहिर्मुखी कृत्य है तथा अन्तर्मुखी होने की पूव की तयारी है. श्रीमद्भागवद्गीता में इस शरीर के चौबीस स्थूल-सूक्ष्म तत्व बताए हैं.

इनमे पाहिले बीस बहिर्मुखी हैं जबकि अंतिम चार तत्व मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार जो मिलकर अंतःकरण कहलाते है इस मानव देह के अन्तः पुर ही हैं. अध्यात्म इन विषयों के बिना समझा या व्यव्हार में लाया जाना असंभव है.
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माण्डूक्योपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। इसमें आत्मा या चेतना के चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
प्रथम दस उपनिषदों में समाविष्ट केवल बारह मंत्रों की यह उपनिषद् उनमें आकार की दृष्टि से सब से छोटा है किंतु महत्व के विचार से इसका स्थान ऊँचा है, क्योंकि इसमें आध्यात्मिक विद्या के सूत्र भर दिए गए है। इस उपनिषद् में ऊँ की मात्राओं की सूक्षम व्याख्या करके जीव और विश्व की ब्रह्म से उत्पत्ति और लय एवं तीनों का तादात्म्य अथवा अभेद प्रतिपादित हुआ है।
आईने के सच के घटना के आलोक में इसे ऐसे समझा जा सकता है.
आत्मा चतुष्पाद है अर्थात उसकी अभिव्यक्ति की चार अवस्थाएँ हैं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
1. जाग्रत अवस्था की आत्मा को वैश्वानर कहते हैं, इसलिये कि इस रूप में सब नर एक योनि से दूसरी में जाते रहते हैं। इस अवस्था का जीवात्मा बहिर्मुखी होकर "सप्तांगों" तथा इंद्रियादि 19 मुखों से स्थूल अर्थात् इंद्रियग्राह्य विषयों का रस लेता है। अत: वह बहिष्प्रज्ञ है।
2. दूसरी तेजस नामक स्वप्नावस्था है जिसमें जीव अंत:प्रज्ञ होकर सप्तांगों और 19 मुर्खी से जाग्रत अवस्था की अनुभूतियों का मन के स्फुरण द्वारा बुद्धि पर पड़े हुए विभिन्न संस्कारों का शरीर के भीतर भोग करता है।
3. तीसरी अवस्था सुषुप्ति अर्थात् प्रगाढ़ निद्रा का लय हो जाता है और जीवात्मा क स्थिति आनंदमय ज्ञान स्वरूप हो जाती है। इस कारण अवस्थिति में वह सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और अंतर्यामी एवं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और लय का कारण है।
4. परंतु इन तीनों अवस्थाओं के परे आत्मा का चतुर्थ पाद अर्थात् तुरीय अवस्था ही उसक सच्चा और अंतिम स्वरूप है जिसमें वह ने अंत: प्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ और न इन दोनों क संघात है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ और न अप्रज्ञ, वरन अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिंत्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, शांत, शिव और अद्वैत है जहाँ जगत्, जीव और ब्रह्म के भेद रूपी प्रपंच का अस्तित्व नहीं है (मंत्र 7)
ओंकार रूपी आत्मा का जो स्वरूप उसके चतुष्पाद की दृष्टि से इस प्रकार निष्पन्न होता है उसे ही ऊँकार की मात्राओं के विचार से इस प्रकार व्यक्त किया गया है कि ऊँ की अकार मात्रा से वाणी का आरंभ होता है और अकार वाणी में व्याप्त भी है। सुषुप्ति स्थानीय प्राज्ञ ऊँ कार की मकार मात्रा है जिसमें विश्व और तेजस के प्राज्ञ में लय होने की तरह अकार और उकार का लय होता है, एवं ऊँ का उच्चारण दुहराते समय मकार के अकार उकार निकलते से प्रतीत होते है। तात्पर्य यह कि ऊँकार जगत् की उत्पत्ति और लय का कारण है।
वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ अवस्थाओं के सदृश त्रैमात्रिक ओंकार प्रपंच तथा पुनर्जन्म से आबद्ध है किंतु तुरीय की तरह अ मात्र ऊँ अव्यवहार्य आत्मा है जहाँ जीव, जगत् और आत्मा (ब्रह्म) के भेद का प्रपंच नहीं है और केवल अद्वैत शिव ही शिव रह जाता है।

🤔अंधेरे का अध्यास😴



अन्धकार को सब कोसते हैं, प्रकाश की कामना सब करते हैं। क्या अन्धकार इतना बुरा है, अवांछित है, अनपेक्षित है? अन्धकार कोई स्वीकार नहीं करता।
वेद कहता है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" अर्थात् अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ। स्पष्ट है; अन्धकार को पहले स्वीकारता है, उसकी उपस्थिति को पूर्व में मौजूद होना भी पूरी तरह मानता है तभी तो वह उससे प्रकाश की ओर जाने को कहता है। प्रकाश आता है तो अन्धकार उसे जगह देता है। अन्धकार आता नहीं है पर प्रकाश ने कुछ समय तक के लिए उसकी जगह ऑकूपाय कर ली है। इसलिए कहना चाहिए कि अन्धकार उतना ही महत्व पूर्ण है जितना कि प्रकाश है। इसके बावजूद भी हम अंधकार से डरते क्यों हैं?
चौबीसों घण्टे प्रकाश रहा तो सो कब पाओगे। सिर्फ दो दिन पूरी तरह जाग कर देखो विक्षिप्तता के निकट पहुंच जाओगे। प्रकाश जीवन चलाने के लिए जरूरी है तो अंधकार जीवन बचाने के लिए जरूरी है। हमने पहले अंधकार को नहीं समझा और सीधा प्रकाश को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। एक यथार्थ यह है कि हम प्रकाश में प्रकाश को नहीं आस पास मौजूद अन्य वस्तुओं को देखते हैं जबकि अंधेरे में हम केवल अन्धकार को ही देखते हैं इस तरह कि जैसे अंधकार दर्शनीय हो। अनुभव कर के देखो अंधकार में आप प्रज्ञाचक्षु हो जाते हो, आपकी इंद्रियोँ की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। आपके कान दिशाओं का बारीकी से जानने लगते हैं। यह आभास तो होता है कि अंधेरे में हम कुछ नहीं देख रहे हैं जबकि हमारी आँखें खुली रहती है अौर खुली आँखों से तो हम देखते ही हैं; अर्थात् हम अंधेरे को देखते ही हैं।
प्रकाश हमें वस्तुस्थिति का बोध भले ही करा दे पर जरूरी नहीं कि वह शान्ति उपलब्ध करा दे अलबत्ता अंधकार में आस पास का खालीपन हमें हल्का महसूस करा सकता है। अंतरिक्ष स्वयं अंधकार से परिपूर्ण है इसलिये वहाँ यात्री जब विचरण करता है तो गहन शान्ति के सागर में तैरता है। एस्ट्रॉनाट बताते हैं कि अंतरिक्ष के अन्धमहासागर में जो शान्ति उपलब्ध है उसकी कल्पना भी धरती पर किया जाना संभव नहीं। अगर वहाँ कुछ चमकता दीख पड़ता है तो वे हैं दूरस्थ आकाशीय पिंड। लगता है कोई टिमटिमाते दिये अनन्त और गहन काले सागर में तैर रहे हैं।
हमें समझाया गया है कि प्रकाश जीवन है और अन्धकार तो मृत्यु है। परन्तु यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई एक पहलू वाला सिक्का हमें बताना चाहता हो, जैसे व्यक्ति को केवल सुख, आनन्द और जीवन ही मिलेगा। जो केवल जीवन माँगना चाहता है वह मृत्यु से बहुत डरता है लेकिन जो मृत्यु से पूर्णतः परिचित है वह जीवन जीने का आनन्द प्राप्त कर लेता है। जो प्रेम को पाना चाहता है वह एक पीड़ा को निमन्त्रण दे रहा है। इसके बगैर उसे प्रेम मिलेगा भी नहीं। जो माँ धरती पर एक जीवन लाना चाहती है वह एक प्रसव पीड़ा को निमंत्रण दे रही है। इसके बिना उसका अवतरण नहीं हो पाएगा। बरसात चाहिए तो एक तपन से गुजरना होगा। बादल बिना बिजली की प्रताड़ना के बरस नहीं पाएँगे।इसलिए प्रकाश को पाना चाहते हो तो अन्धकार को पहले स्वीकार करना होगा, उसकी सत्ता के बोध में सदैव रहना होगा। वह अभिषाप नहीं है। वह यथार्थ भी है और प्रकाश से अभिन्न भी है। अज्ञान और अन्धकार दोनों अनादि हैं। ज्ञान और प्रकाश परवर्ती है। प्राणी मात्र जीवन को प्राप्त करने के पूर्व अर्थात् जन्म के पूर्व लम्बी अवधि तक अन्धकार के महासागर में तैरता रहा है। यह कदापि संभव नहीं है कि उसका अस्तित्व सीधा प्रकाश में प्रकट हो जावे। वस्तुत: अन्धकार को प्रकृति के उपादानों से पृथक् मत समझो।

हम सब कौन हैं?


😨हम सब कौन हैं?😊

हमारी जीवन यात्रा देह से शुरू होती है और देह पर ही समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि एक फुट भर का आदमी; पाँच सात पौंड का आदमी अपने शरीर को पालते - पोसते जीवन भर उसके लिये करता ही रहता है और पार्थिव से चल कर वापस पार्थिव तक पहुँच जाता है। यदि यह केवल ऐसा ही होता तो सब के सब एक से ही होते। हम सब एक दूसरे से नितान्त अलग क्यों हैं? हम सब में कुछ कुछ मिलता जुलता है और कुछ कुछ एक दम अलग। जो मिलता जुलता है वह है- शरीर सप्त धातुओं से मिल कर बना है। सामान्यतः शरीर के अवयव जो दिखाई देते हैं; जैसे आँख, नाक, कान, हाथ,पैर आदि सबके हैं। सब  मनुष्योंमें काम करने खाने पीने सोने जागने की, व्यवहार करने की क्षमता होती है। अन्तर केवल मात्रा, गुणवत्ता, शक्ति आदि का होता है। 

📙वेदान्त इसे व्यवस्थित रूप से पारिभाषित करता है। सबमें स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि; ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि तात्विक रूप से मौजूद है। सभी लोग जन्मते हैं और अन्त में सब अवसान को उपलब्ध हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे २४ तत्व जड़ अर्थात् बेजान बताए हैं। ये सभी एक कम्पलीट मशीन की तरह असेम्बल्ड हैं और बस पाॅवर मिलते ही यह मशीन अपने कार्य करने में सक्षम हो जाएगी। अभी यह असेम्बली पार्थिव ही है। जन्मते समय छोटी थी और क्रमशः कम ज्यादा होती रहती है। केवल एक तत्व "चेतन" है जिससे यह जीवित है। पार्थिव में यही संयुक्त होता है और अन्त में जीवात्मा विलग हो जाता है। शरीर अवस्थाओं से गुजरता है लेकिन यह चेतन अविच्छिन्न है, अपरिवर्तनीय है, अखण्ड है, अतुल्य है, उसके जैसा केवल वही है। चेतना उसका ही प्रभाव है, चेतना उसके कारण ही है, हम उसे ही जीवन तत्व कहते हैं। वही परमात्म सत्ता मुझमें है, तुम में है, उन में है, सब में हैं। सब के सब अपने आप में अलग भले ही दीख रहे हो पर अगर सब में तात्विक रूप से कॉमन कुछ है तो केवल वह आत्मा है। आत्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्म है वही सत्य है, वही नित्य है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥२२॥

इस देह में स्थित आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है । वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीव रुप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा कहा गया है ।
जगत अथात् इस सृष्टि के पू;र्व भी वही था, अभी वर्तमान है, सदैव वही रहेगा भी। वह इन तीनों कालों के परे भी है। काल से अबाधित है।

ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १॥ 
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ माण्डूक्य उपनिषद्/२॥ 

“अहम आत्मा गुडाकेश सर्व भूताशय स्थितः ” अर्थात् ; हे अर्जुन ! मैं सभी प्राणियों में स्थित आत्मा हूँ। आत्मा ही परमात्मा है ,यह भगवान का उपदेश है। आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग सत्ता नहीं है। यदि तुम “आत्मस्मरण ” रखते हैं ,तो सभी के अंदर “एक” परमात्मा की अनुभूति होगी ।एकत्व की अनुभूति होगी। 

वास्तव में तो तुम ही ब्रह्म हो। तुम्हारा जो नाम है वह इस शरीर की संज्ञा है। जो तुम असल में हो वह अनाम ही हो। आत्मा अमूर्त है। आत्मा ब्रह्म है। अद्वैत है। इसलिये तात्विक रूप से सब के सब अभिन्न है।
“अयं आत्मा ब्रह्म ” -यह आत्मा ही परमात्मा है।।उपनिषद्।।
"ज्ञानात् एव तू कैवल्यं" इस बात को समझ लेना कैवल्य का जान लेना है और 
ही तुरीय है, यही परमात्म सत्ता का बोध है।

निवेदक
रामनारायण सोनी

Saturday, 29 October 2016

😋प्रसाद का माधुर्य

 😋प्रसाद का माधुर्य☺

मंदिर के भीतर लड्डू जाता है पर लौट कर प्रसाद आता है। कमाल लड्डू का नहीं, मंदिर का नहीं, मूरत का नहीं, पुजारी का नहीं, कमाल है आपकी श्रद्धा का, विश्वास का आस्था का, मान्यता का और प्रेम का।
श्रद्धा नहीं तो प्रेम नहीं, विश्वास नहीं तो प्रेम टिकता नहीं, आस्था नहीं तो प्रेमी बंधता नहीं और मान्यता नहीं तो लड्डू अंदर जाएगा और टूटा - फूटा लड्डू ही बाहर आवेगा। लड्डू बाहर आकर मीठा तो होगा लेकिन उसमे माधुर्य तभी होगा जब आप उस देवता और उसके देवत्व से प्रेम करोगे। मीठा जबान तक मिठास देगा परन्तु प्रेम आपके मन को मीठा कर देगा। क्या कभी यह महसूस किया कि  प्रसाद हाथ पर आता है और हृदय उस देवता के पास दौड़ जाता है। आप श्रद्धा और प्रेम से भर जाते हो। जिसने लडडू खाया उसने बस कवल लड्डू खाया लेकिन जिसने प्रसाद खाया उसने अपने मन को मीठी खुराक पहुँचा दी। यह जो मन तक पहुंची मिठास है यही "माधुर्य" है। आप कहीं भी खड़े हो मन का माधुर्य आपको अपने देवता के पास ले जाकर खड़ा कर देगा, देवता में प्रेम और बढ़ जावेगा। आपको पहले तो लगेगा कि आप देवता के पास पहुँच गये हो लेकिन फिर तुरन्त यह भी लगेगा कि प्रसाद में देवता का आशीष और स्नेह घुल कर आ गया है और इसके साथ ही वह आपके हृदय को गुदगुदा रहा है। आपका हृदयाकाश एक अप्रतिम आलोक से भर गया है। प्रसाद ने आपको आपके देवता से जोड़ दिया है। यह प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और आस्था के रॉ मटेरियल से बना सेतु है।
इसलिए.....
लडडू की मिठास में मत अटको हृदय को प्रसाद के माधुर्य से भर डालो।

गुरु अमृत की खान

☝गुरु अमृत की खान☝

मैने सुना है - गुरू गाय है। दुधारू गाय। गाय के स्तनों में भरा दूध तब तक बाहर नहीं आता है जब तक उसका बछड़ा दूध पीने नहीं आता।
यह कपाट उसकी स्नेह मयी ममता से ही खुलता है। खुला ही रहता है जब तक बछड़ा तृप्त नहीं हो जाता। माँ पिलाती रहती है बछड़ा पीता चला जाता है। किसी को दूध दिखाई नहीं देता है।
एक तरफ स्रोत है , ममत्व है, देने का ही भाव है। दूसरी दूसरी तरफ ललक है, प्यास है, अनुरक्ति है और ग्रहण करने की चाह है।
मैने तो यह भी सुना है कि अगर गाय का आँचल (मालवा में गाय के स्तनों को आँचल कहते हैं) दूध से भरा हो और बछड़ा उसे न पिए तो उसके आँचल में दर्द होने लगता है? कहना बड़ी बात नहीं होगी कि दुधारू गाय को भी बछड़े की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसके ऊपर यह भी सत्य है कि बछड़े को दूध उसकी माँ ही पिलाएगी। यह रिश्ता है ममत्व का, दाता का, करुणा का, प्यास का, प्रेम का।

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मैने यह भी सुना है कि गुरु बहती गंगा है। बीच में धार बहती है दोनों ओर रेत ही रेत है। सूखी रेत। किसी को प्यास लगी उसने १००-२०० मीटर दूर रेत में गड्ढा बनाया तो वह देखता है कि निर्मल, स्वच्छ नीर छन छन कर गड्ढे में तैयार है। गंगा को पता ही नहीं कौन आया और अपनी प्यास बुझा गया। लेकिन गंगा में जल है तो पोखर में पानी होगा, पोखर तब होगा जब कोई प्यासा होगा और पोखर तब होगा जब प्यास होगी, पोखर तब होगा जब प्यासा उसे खोदने का यत्न करेगा, और प्यास तब बुझेगी जब प्यासा जल पिएगा। "जल अजस्र होगा।" चाहे जितना पिए, पोखर भरता जाएगा। गंगा अपनी धारा ले कर कहीं बहती रहे। प्यासे के लिए वह रेत के भीतर से बह कर आवेगी। किसी को पता नहीं चलेगा गंगा वहाँ कैसे पहुँच गई। यहाँ रिश्ता है गंगा का और प्यासे का। प्यासे के विश्वास का कि पोखर में गंगा आवेगी, उसकी प्यास बुझाएगी। एक तृप्ति तक ले जाएगी।

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मैने यह भी सुना है कि गुरू सितार है। कोई दूसरा सितार कहीं पास में रखा है। दोनों सितारों के तारों में अनुदैर्य का साम्य हो गया। अनुदैर्य याने वे समान फ्रीक्वेन्सी पर ट्यून्ड हैं। पहला सितार बजना प्रारंभ करता है। उसमें से स्वर लहरियाँ निकलती हैं। यह नाद है। यहाँ सप्तक है। सुरम्य तरंगें वातावरण गूँजती है। तरंगें दूसरे सितार तक पहुंचती हैं तब वह दूसरा सितार अपने आप बज उठता है। उसे कोई नहीं बजा रहा पर  अनुगूँज से ही बज उठता है। पहले सितार को पता ही नहीं चला कि दूसरा सितार बज उठा है।
बस वह मुख्य सितार तो बज रहा है, बजता जा रहा है। उसमें नाद है। नाद तो असल में ब्रह्म है। इसलिये यह ब्रह्मनाद ही है। जो बजाए से बजे वह तरंग है लेकिन कबीर कह गया कि जो बिना बजाए बज गया वही अनहद है। यहाँ रिश्ता है सितारों का, उनकी ट्यूनिंग का, नाद का, अनुनाद का, हद से अनहद-नाद का।

🛂रिश्ता🛐
रिश्ता गाय-बछड़े का, रिश्ता गंगा से प्यासे का, रिश्ता सितार-दर-सितार का-- रिश्ता है सद्गुरू से शिष्य का।

"वैदिक मनोविज्ञान"

☺"वैदिक मनोविज्ञान"☺

यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१

भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

१.जाग्रत अवस्था में.....

घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी  रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।

हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
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"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
अगले अंक में.....

वैदिक मनोविज्ञान


🔥वैदिक मनोविज्ञान🔥

अंक २

"ज्योतिषां ज्योतिरेकम्"

बिजली के बल्ब में काँच है, फिलामेंट है। छत पर टँगा है। वह लगा इसलिए है कि जब भी हमें जरूरत हो तब बिजली की बटन दबाएं और हमें रोशनी मिल जाए। यह रोशनी मात्र बटन और बल्ब के कारण से नहीं है अपितु उसमें बहने वाली अद्दष्य विद्युत धारा से है। विद्युत धारा नहीं तो बल्ब में कोई चमक नहीं। इसकी रोशनी में हम वह देख पाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन कमरे में कुछ नहीं दिखने के कारण ये हैं :-

१, चीजें है ही नहीं
२, चीजें हैं देखने वाली आँखें नहीं है
३, चीजें भी हैं, आँखे भी हैं पर अंधेरा है।
४, चीजें हैं, आँखें है, वातावरण में उजेला भी है लेकिन आँखों में देख पाने की क्षमता नहीं है।

मतलब यह कि जिस कमरे में देखना है वहाँ चीजें हों, देखने वाली आँखें हों, प्रकाश हो और देखने वाली आँखों में देखने की क्षमता हो।
इस सबसे ऊपर एक और विचित्र बात वह है जिसे 'वैदिक मनोविज्ञान' ही समझा सकता है। वह यह कि सम्पूर्ण परिदृष्य में से सब कुछ मौजूद होने के बावजूद यदि चीजें दिखाई नहीं देती है तो उसका कारण है "मन"। हाँ,  केवल मन।

दो ढाई साल का बच्चा चलते-चलते जमीन पर गिर जाता है घुटनों से खून बहने लगता है। जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगता है। माँ जमीन ठोंक कर कहती है, देख! चींटी  मर गई। असल में तो वहाँ चींटी है ही नहीं, केवल मन की दिशा का परिवर्तन है। कभी चिड़िया दिखाने लगती है, कहती है, देख! चिड़िया उड़ गई। बालक का मन चींटी और चिड़िया में रम जाता है। रोना रुक जाता है, चाहे खून बहता रहे। मन घुटने से छूट कर चिड़िया और चींटी को देखने में टिक जाता है। त्वचा की संवेदना पीछे छूट जाती है क्योंकि मन अब कुछ और देख रहा है। मन उस संवेदना को प्रकाशित नहीं कर रहा।

संत सूरदास कहते हैं- "ऊधो मन न भए दस-बीस।" मन तो एक ही है, इधर लगा लो चाहे उधर और एक बार में एक तरफ ही जाता है।
यहाँ ठीक वैसा ही कुछ घट जाता है जैसे अन्धेरे में कुछ घट जाए और पता ही न चले। इससे यह भी स्पष्ट है कि मन के प्रकाश में ही समस्त जगत प्रकाशित होता है। मन के इस गुण के अभाव में समस्त जगत अप्रकाशित, अनजान और अज्ञान के अन्धकार से आवृत्त रह जावेगा। जिस प्रकार चीजें वहीं थीं, आँखें वही थी, आँखे सक्षम भी थी, देखने वाला व्यक्ति भी वही था पर मन ने नहीं देखा तो कुछ नहीं दिखा। मन ने संवेदना ग्रहण नहीं की लगा कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। मन ने देखा तो सब दिखा। आँखें मात्र इक्विपमेंट हैं, खिड़कियाँ हैं जहाँ से दृष्य भीतर प्रवेश कर रहे है।
आँखे ही नहीं समस्त इन्द्रियाँ भी मन के अनुशासन में हरकत करती हैं। जहाँ पर मन का प्रकाश होगा वही प्रकाशित होगा। मन के द्वारा सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषय के ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद जीभ नहीं अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को भाते हैं। मन उद्विग्न हो तो चंद्रकिरणें भी चुभन लगती हैं । विषयों की अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
"मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं।"
इसका अर्थ यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ ही कृत कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीवात्मा का दिव्य माध्यम है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो।

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)

इन्द्रिय रूपी अश्व उसी के अनुशासन में रहते हैं। उसी से उनके विषयों को जानने की क्षमता पाते है। इसलिए श्रुति ने मन को "इन्द्रियोँ की लगाम" कहा है। सामान्य अर्थों में मन ही इन्द्रियों और शरीर से सब कुछ करवाता है लेकिन स्पष्ट है लगाम कोई और धारण करता है वह है "जीवात्मा"। श्रुति मन को जड़ परिभाषित करती है। परन्तु बिना लगाम के रथ और घोड़े नहीं चल पाएंगे। इससे मन की महत्ता भी सिद्ध होती है। लेकिन यह भी स्वयंसिद्ध है कि ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ उस परमचेतना से ही अनुप्राणित हैं। "ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।"

एक ओंकार

एक ओंकार☝

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥

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एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं  "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं  हैरान था कि कर तो मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने अपना दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी लेकिन आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।

यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल मैं रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।

दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के मैं चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में मैं ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं अद्वैत हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।

जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
🍃        🌖🌒
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन  इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर देखें।

यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका "साक्षी", बना रहूँगा। यह काल का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है,आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।

मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..

।।हरिः ॐ तत्सत्।।

"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३

"वैदिक मनोविज्ञान"  अंक ३🤔

"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।" ।।यजुर्वेद ३४/१।।

अन्वयार्थ:-
यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु।

भावार्थ:-
जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी दूर दूर तक चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
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🌅"ज्योतिषां ज्योतिरेकं"🌇

ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ, ज्योतियाँ अर्थात् प्रकाशित दीपशिखाएँ, ज्योतियाँ अर्थात् वे शक्तियाँ जिनके आलोक में उपस्थितों का ज्ञान हो।

मिट्टी के दीपक के तीन अवयव हैं; मिट्टी का दीपक, बाती और तेल। इसमें प्रकाश उत्सर्जन की अपूर्व क्षमता है और अभी यह प्रकाश करेगा भी लेकिन बिचारा अकेला कुछ नहीं कर सकता। एक ज्योति आती है इसकी बाती में ज्योति जगाती है और अप्रकट रूप में यहीं मौजूद रहती है तो मिट्टी का अप्रकाशित दिया भी प्रकाश देने लगता है। इस बाती से इसकी आई हुई ज्योति यदि चली गई तो दिया फिर अक्षम हो जावेगा। स्पष्ट है; इसकी ज्योति भी अन्य ज्योति से ज्योतित है।
उक्त तीनों स्थितियों और अर्थों में वे ज्ञान की प्रकाशक ही हैं। ज्ञान उसका जो है। बोध उसका जो अप्रकट था। ज्ञान उसका जो हम जान पाएँ। प्रकट होने पर भी अगर बोध न हो पाए, प्रकट होने पर भी यदि प्रकाशित वस्तु का तात्पर्य ग्रहण न हो पाए या तो प्रकट अथवा अप्रकट में कोई अन्तर नहीं हो तो सभी व्यर्थ है।
अन्धेरे कमरे में यदि टेबल पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो तो दिखेगा कैसे। देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए। चलिये अब प्रकाश के लिए हमने दीप जला कर रख दिया। टेबल पर रखी कोई वस्तु दिखाई देने लगी। यदि यह ज्ञान नहीं हो कि यह वस्तु गुलदस्ता है तो प्रकाशित हो जाने पर भी उसका लाभ नहीं हानि ही है।
वस्तुतः चीजों का प्रकाश तो एक ज्योति ने कर दिया परन्तु अभी एक और ज्योति अर्थात् ज्ञान की आवश्यकता है जो उसके मूल स्वरूप का ज्ञान दे सके। वस्तु को गुलदस्ते के रूप में हमारे भीतर डिस्टिंग्विश कर सके। रस्सी को रस्सी और साँप को साँप समझा सके तथा इनमें से किसी की आपस की भ्रान्ति न आ सके अर्थात् हम रस्सी को साँप न समझ लें।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ज्योति जो बाहरी है वह अपूर्ण अथवा अपर्याप्त है जिससे वह पूर्ण ज्ञान करा सके। इसे एक परम ज्योति की आवश्यकता है, इसे एक "शाश्वत" ज्ञान की बेकिंग या सपोर्ट चाहिए।
यह ज्योति मन ही है। मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी तो है ही पर उनके विषयों को उनका ज्ञान कराने वाला भी केवल यही है। कान सूँघ नहीं सकता, आँख सुन नहीं सकती आदि आदि। आँख को उसके विषय "देखने" की समझ केवल मन से ही आई है। आँखें देखती रहे तो भी सब अनदेखा रह जाएगा यदि उसे मन ने नहीं देखा। सुना सब अनसुना रह जाएगा यदि मन ने नहीं सुना। इसकी क्वालिटी और तात्पर्य भी मन ही निकालता है; जैसे आम आदमी के पाँव को छूने और गुरू के पाँव को छूने का भेद भी मन ही जानता है। छूने का ज्ञान त्वचा से हुआ पर उसे मन ही समझ कर ग्रहण करता है। इस गुणात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
"वैदिक मनोविज्ञान" विश्व का सर्वश्रेष्ठ मनोविज्ञान है जो पाश्चात्य मनोविज्ञान से भिन्न है। उनका मनोविझान व्यवहार पर आधारित है जबकि "वैदिक मनोविज्ञान" आदमी के अन्तःकरण के संश्लेषण पर आधारित है।

श्रुति कहती है; "ज्योतिषां ज्योतिरेकं"।

"गहरे पानी पैठ

  🌊"गहरे पानी पैठ"🌞

पाँच लोग समुद्र किनारे पहली बार गए। सबने समुद्र को देखा, और जो जो जानना चाहा वह वह अपने स्तर पर जाना भी। लौट कर वे सब अपने गाँव चले आए। गाँव के मुखिया ने बारी बारी से एक के बाद एक व्यक्ति से पूछा कि हम लोगों ने समुद्र कभी नहीं देखा। आप लोगों ने समुद्र देखा है उसके बारे में बताओ।

☝पहला आदमी आया उसने कहा किनारे रेत में खड़ा होकर देखा समुद्र और कुछ नहीं केवल एक शोर है। वहाँ कुछ देर ठहरा और मैं भाग कर दूर चला आया। मैं डर गया कि अगर मैं वहाँ कुछ देर और ठहरता तो मेरे कान फट जाते। मैं तो कहता हूँ आप लोग वहाँ कभी मत जाना। पहला आदमी यह बता कर चला गया।

☝दूसरे से पूछा तो उसने कहा उठती-गिरती लहरों के अलावा समुद्र कुछ नहीं। एक लहर उठती है,  किनारे की और दौड़ती है और वहाँ आकर मर जाती है। फिर पीछे से दूसरी आती है वह भी वही करती है। अन्तहीन सिलसिला चलता है।  किनारे पर लहरों का शोर ही शोर है। मैं घबरा कर दूर चला आया। अब मैं वहाँ कभी नहीं जाऊँगा।

☝तीसरा आया उसने कहा जहाँ तक नजरें जाती है बस पानी ही पानी है यानी बहुत सारा इकट्ठा पानी ही समुद्र है। वहाँ लहरें हैं, लहरों का शोर है, दूर-दूर तक केवल पानी ही पानी है। लगता है इससे तो धरती अच्छी है जहाँ देखने को कुछ और भी है, लोग भी है। समुद्र तो एक निस्सीम निर्जन है। इसीलए मैं तो यही कहता हूँ कि समुद्र शोर भरा उजाड़ है जहाँ पाने को कुछ भी नहीं है।

☝चौथा कहने लगा मैने किनारे पर आई लहर के पानी को चख कर देखा तो मुझे लगा कि बहुत सारा खारा पानी ही समुद्र है। किनारे पर खड़ा मैं देख रहा हूँ। शोर मचाती हुई लहरें आती हैं और मुझे धरती की ओर ढकेलती है। मैं डरता हूँ कि मुझे लहरें बहा न ले जावें। मैं चिन्तित हूँ कि समुद्र में जाने के बाद मैं शायद वापस लौट नहीं पाऊँ और वहीं मैं समाधिस्थ हो जाऊँ। मुझे धरती ही अच्छी लगती है। डर के मारे में वहाँ से दूर भागा।

😔पाँचवें ने कहा मैने देखा कि किनारे पर एक पनडुब्बी खड़ी है। पनडुब्बी वाले से निवेदन किया कि वह मुझे समुद्र की सैर करा दे। उसने मुझे हौले से पनडुब्बी में बिठाया और लहरों को चीरता हुआ लहरों के शोर के उस पार ले चला।
(यह पनडुब्बी वाला ही मेरे उस गुरु की तरह ही है और वह भी सुषुप्ति तक पहुँचा कर अदृष्य सा हो गया)
मैंने भीतर जाकर देखा वह बड़ा ही विलक्षण था, अद्भुत और अपूर्व था। वहाँ एक गहन शान्ति थी। कई जीव मौजूद है जो इधर उधर घूम रहे हैं। उनके लिए कई प्रकार की वनस्पतियाँ है। जैसी नीरवता और शान्ति यहाँ है वैसी समुद्रके बाहर नहीं, धरती पर भी नहीं। यहाँ अगर कुछ चलता भी है तो सब मन्थर गति से है। विशाल आकाश है। धरती पर यह पूरा खुला नहीं दिखाई देता है, वहाँ कई बाधाएँ है। मैं जहाँ जहाँ देखता हूँ वहाँ वहाँ उस विराट की असीम सत्ता का स्पष्ट बोध होता है। थोड़ा आगे और चलता हूँ तो  लगता है यहाँ केवल मेरा मैं और मेरा परमात्मा ही है।

थोड़ी देर उस जगह और ठहरा तो लगा कि यहाँ केवल हूँ, मेरा वह "मैं" पीछे छूट गया और चूँकि मेरे अतिरिक्त शेष भी अशेष है इसलिए जो अशेष है वही "पूर्ण" है। वहाँ केवल यही प्रतीति शेष रही कि यही कैवल्य है।
🕉
मैं जो यहाँ हूँ वही बाहर था। तत्व मैं ही तो हूँ। "तत्वमसि।"

🌍🌓🌊इस रूपक में धरती और वह ग्राम बाह्य जगत है। पाँच लोग वे विभिन्न प्रकार के लोग हैं जो समुद्र याने अन्तःकरण को अपनी अपनी वृतियों और दृष्टिकोण से आँकते हैं। कुछ लोग लहर और उसके शोर अर्थात् मन और विचारों के पार नहीं जा पाते हैं। हवा के थपेड़े न हो तो लहरें होगी ही नहीं इसीलिये अर्जुन कहते हैं कि मन "वायोरिव सुदुष्करं" है। कुछ लोग स्वाद अर्थात् इन्द्रियों के विषयों में उलझ कर जगत में अटके रह जाते हैं। किनारे पर ही खड़े रह जाते हैं।
समुद्र ही अन्तःकरण है।  जिसके सबसे ऊपरी तह मन है। उठने वाले विचार  तो लहरें ही हैं। धरती (जगत) "जाग्रत" अवस्था है। समुद्र के भीतर "स्वप्न" की भाँति ही जगत का प्रतिबिम्ब मौजूद है। वही भी अनुभूतियाँ हैं। आगे बढ़ने पर गहन शांति है। यही सुषुप्ति है जहाँ केवल साक्षी मौजूद है। साक्षी आत्मा ही है  इसलिए अब आगे की अवस्था तुरीय है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिश्यते।।

अहंकार और प्रेम

  😟अहंकार और प्रेम😟

        प्रेम का सर्वप्रथम आघात अहंकार पर ही होता है। यदि अहंकार नहीं टूटा तो प्रेम टूट जाएगा। दोनों में से एक का टूटना तय है। एक बात और है, दोनों टूटी फूटी अवस्था में भी एक साथ नहीं रह सकते। जब भी मौका मिलेगा दोनों में से कोई भी खड़ा हो जाएगा और खड़े होते ही एक अन्तर्द्वन्द्व शुरु हो जाएगा। इसलिए कोई यह न समझ ले कि जब मैं एक को बचा कर तिजोरी में रख लूँ और दूसरे से काम चलाऊँ और फिर दूसरे को रख कर पहले को काम ले लूँ। ऐसा किया तो धोखा खुद खाओगे। अंहकार अगर टूट कर खड़ा हुआ तो उसकी ताकत पहले से भी अधिक बढ़ जावेगी।
इसलिए सावधान! प्रेम करना चाहते हो तो अंहकार को छोड़ना ही होगा और हाँ, प्रेम यदि अहंकार पर चोट करता है तो उसका स्वागत करना होगा। एक बार प्रेम ने ठीक से जगह बना ली तो सब आसान होने लगेगा। प्रेम पसर गया तो अहंकार वहाँ से अपने आप विदा हो जाएगा। प्रेम का पहला लक्षण प्रकट होगा तब यह पाओगे कि हृदय के बीच की दूरियाँ कम होने लगी है।
बड़े मजे की बात है - एक व्यक्ति जिसे हम बिल्कुल नहीं जानते, जिसके बारे में हमको कुछ नहीं पता वह एकदम से अजनबी है; उसके सामने सहज रूप में ही हम अहंकार प्रदर्शित करने का नहीं सोचते। उसे सम्मान देते हैं और सम्मान देने का अर्थ यही है कि अभी हमारा अहंकार उसके समक्ष ठीक से जागा नहीं है। संभवत: हम उसे "आप" कह कर भी संबोधित कर रहे हैं। अभी वह हमसे न दूर है न पास है। जैसे जैसे आपस की जानकारियाँ बढ़ती है वैसे वैसे अहंकार धरातल पर उतरने लगता है। लेकिन प्रेम का अवतरण होगा तभी कुछ ठीक हो पाएगा।
जैसे दूध में नींबू की एक बूँद भी अगर गिर गई तो दूध का फटना तय है वैसे ही यदि प्रेम प्रसंग में अहंकार का लेश भी पड़ा तो प्रेम का मिटना तय है। अहंकार कभी हो कर नहीं करते बल्कि यह नैसर्गिक है जो कि एक वृत्ति की दशा में भीतर ही बैठा हुअा है। यह देश काल और परिस्थिति की अनुकूलता में प्रस्फुटित हो पड़ता है। प्रेम बढ़ने की गति बहुत मंथर होती है जबकि अहंकार मल्टीप्लाय बहुत जल्दी होता है।
एक किसान एक बंदर से बहुत परेशान था वह आकर उसके खेत की फसल रोज खराब कर देता था। रोज भगाता पर वह न भागता, लौट कर फिर आ जाता था। एक दिन उसको एक तरकीब सूझी। उसने बन्दर को पकड़ कर उसकी पूँछ में खाली टीन का डब्बा बाँध दिया। बंदर को बड़ा अजीब लगा। थोड़ी देर उसने कोई परवाह नहीं की पर जैसे ही दूसरी डाली पर छलांग लगाई, डिब्बा बजा। उसे लगा डिब्बे की आवाज और डिब्बा उसका पीछा कर रही है। इससे जान छुड़ाने के लिए वह जंगल की ओर भागा। फिर क्या था जैसे जेसे तेज भागता वैसे वैसे डिब्बा और अधिक जोर से बजता। बन्दर भागते जब दूर झाड़ी में पहुँचा तो डिब्बा वहाँ फँस गया तब तुरंत डिब्बा बजना बन्द हो गया। बन्दर समझ गया कि मेरे भागने के कारण ही यह पारिणाम हुआ है। अहंकार भी हमारे पल्लू से बँधा है। इसको लेकर भागे तो यह कम नहीं होगा। रोकना है तो ठहरो और उसका निषेध करो।
अहंकार और प्रेम हमारे हृदय के (एक) ही खेत में उगने वाली उपज हैं। "अहंकार खरपतवार है और प्रेम मुख्य खेती है। अगर प्रेम नहीं बोया तो अहंकार का खरपतवार बिना उगाए ही उग जायगा।"

अंधेरे का अध्यास

🤔अंधेरे का अध्यास🤔

अन्धकार को सब कोसते हैं, प्रकाश की कामना सब करते हैं। क्या अन्धकार इतना बुरा है, अवांछित है, अनपेक्षित है? अन्धकार कोई स्वीकार नहीं करता।
वेद कहता है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" अर्थात् अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ। स्पष्ट है; अन्धकार को पहले स्वीकारता है, उसकी उपस्थिति को पूर्व में मौजूद होना भी पूरी तरह मानता है तभी तो वह उससे प्रकाश की ओर जाने को कहता है। प्रकाश आता है तो अन्धकार उसे जगह देता है। अन्धकार आता नहीं है पर प्रकाश ने कुछ समय तक के लिए उसकी जगह ऑकूपाय कर ली है। इसलिए कहना चाहिए कि अन्धकार उतना ही महत्व पूर्ण है जितना कि प्रकाश है। इसके बावजूद भी हम अंधकार से डरते क्यों हैं?
चौबीसों घण्टे प्रकाश रहा तो सो कब पाओगे। सिर्फ दो दिन पूरी तरह जाग कर देखो विक्षिप्तता के निकट पहुंच जाओगे। प्रकाश जीवन चलाने के लिए जरूरी है तो अंधकार जीवन बचाने के लिए जरूरी है। हमने पहले अंधकार को नहीं समझा और सीधा प्रकाश को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। एक यथार्थ यह है कि हम प्रकाश में प्रकाश को नहीं आस पास मौजूद अन्य वस्तुओं को देखते हैं जबकि अंधेरे में हम केवल अन्धकार को ही देखते हैं इस तरह कि जैसे अंधकार दर्शनीय हो। अनुभव कर के देखो अंधकार में आप प्रज्ञाचक्षु हो जाते हो, आपकी इंद्रियोँ की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। आपके कान दिशाओं का बारीकी से जानने लगते हैं। यह आभास तो होता है कि अंधेरे में हम कुछ नहीं देख रहे हैं जबकि हमारी आँखें खुली रहती है अौर खुली आँखों से तो हम देखते ही हैं; अर्थात् हम अंधेरे को देखते ही हैं।
प्रकाश हमें वस्तुस्थिति का बोध भले ही करा दे पर जरूरी नहीं कि वह शान्ति उपलब्ध करा दे अलबत्ता अंधकार में आस पास का खालीपन हमें हल्का महसूस करा सकता है। अंतरिक्ष स्वयं अंधकार से परिपूर्ण है इसलिये वहाँ यात्री जब विचरण करता है तो गहन शान्ति के सागर में तैरता है। एस्ट्रॉनाट बताते हैं कि अंतरिक्ष के अन्धमहासागर में जो शान्ति उपलब्ध है उसकी कल्पना भी धरती पर किया जाना संभव नहीं। अगर वहाँ कुछ चमकता दीख पड़ता है तो वे हैं दूरस्थ आकाशीय पिंड। लगता है कोई टिमटिमाते दिये अनन्त और गहन काले सागर में तैर रहे हैं।
हमें समझाया गया है कि प्रकाश जीवन है और अन्धकार तो मृत्यु है। परन्तु यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई एक पहलू वाला सिक्का हमें बताना चाहता हो, जैसे व्यक्ति को केवल सुख, आनन्द और जीवन ही मिलेगा। जो केवल जीवन माँगना चाहता है वह मृत्यु से बहुत डरता है लेकिन जो मृत्यु से पूर्णतः परिचित है वह जीवन जीने का आनन्द प्राप्त कर लेता है। जो प्रेम को पाना चाहता है वह एक पीड़ा को निमन्त्रण दे रहा है। इसके बगैर उसे प्रेम मिलेगा भी नहीं। जो माँ धरती पर एक जीवन लाना चाहती है वह एक प्रसव पीड़ा को निमंत्रण दे रही है। इसके बिना उसका अवतरण नहीं हो पाएगा। बरसात चाहिए तो एक तपन से गुजरना होगा। बादल बिना बिजली की प्रताड़ना के बरस नहीं पाएँगे।इसलिए प्रकाश को पाना चाहते हो तो अन्धकार को पहले स्वीकार करना होगा, उसकी सत्ता के बोध में सदैव रहना होगा। वह अभिषाप नहीं है। वह यथार्थ भी है और प्रकाश से अभिन्न भी है। अज्ञान और अन्धकार दोनों अनादि हैं। ज्ञान और प्रकाश परवर्ती है। प्राणी मात्र जीवन को प्राप्त करने के पूर्व अर्थात् जन्म के पूर्व लम्बी अवधि तक अन्धकार के महासागर में तैरता रहा है। यह कदापि संभव नहीं है कि उसका अस्तित्व सीधा प्रकाश में प्रकट हो जावे। वस्तुत: अन्धकार को प्रकृति के उपादानों से पृथक् मत समझो।

मनोवृत्ति और चित्तवृत्ति

🤔मनोवृत्ति और चित्तवृत्ति 🤗

मन के सत्य को गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरितमानस में गाया है-
‘गो गोचर जहाँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥’
अर्थात् इन्द्रियाँ, इन्द्रियों की पहुँच और जहाँ- जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, तुम उस सब को माया जानना, मिथ्या समझना।
मन की परेशानी, मन से उलझन, मनोवेगों को सम्हाल पाना साधकों का सबसे जटिल लगता है। आइए इस उलझन को सुलझाने के लिए सबसे पहले यह जान लें कि आखिर मन अपने आप में है क्या? यह हमारे भीतर बैठा हुआ क्या कर रहा है? आमतौर पर सब यही सोचते रहते हैं कि मन सिर में पड़ी या रखी हुई कोई भौतिक चीज है लेकिन जिसने भी मन को अन्दर से पहचान लिया है, वह ऐसी बातें नहीं स्वीकारेगा। आज का विज्ञान भी ऐसी बातों को मानने से इन्कार करता है।
कोई चलता हुआ आदमी बैठ जाय, तो बैठने पर उसका चलना कहाँ भाग गया? चलना तो एक क्रिया है। इसलिए कोई किसी के बैठने पर यह नहीं पूछा करता कि तुमने अपना चलना कहाँ छुपा कर रख दिया? मैं चाहूँ, तो फिर से चल सकता हूँ, बार- बार चल सकता हूँ। चाहने पर चलना रोक भी सकता हूँ। बस, कुछ इसी तरह मन भी एक तरह का क्रियाकलाप चलता रहता है। मन या ‘माइण्ड’ शब्द से किसी तत्त्व या पदार्थ के होने का भ्रम नहीं होना चाहिए। हालाँकि  पाश्चात्य दर्शन के अनुसार "माइण्ड" सिर में स्थित है और हमारे दर्शन के अनुसार "मन" हमारे हृदयस्थल में स्थित है ऐसा माना जाता है। फिर भी व्याहारिक दृष्टि से देखें तो कार्य संपादन लगभग एक सा परिलक्षित होता है। इस मन की क्रियाशीलता थमे तो मन का अवसान हो और साधक "योगी" बने।
यदि मन की क्रियाशीलता के साथ अपनी आसक्ति समाप्त हो जाए, तो मन को ऊर्जा मिलना बन्द हो जाती है। अपने आप तो मन बस थोड़ी देर बहेगा। जब पिछला संवेग चुक जावेगा तब मन अपने आप ही रुक जाएगा। "मन" की वृत्तियों में सबसे प्रमुख है उसकी गतिशीलता। दुनिया में यदि कोई सबसे गतिमान है तो वह है मन। निमेष भर में वह धरती से चाँद, चाँद से सूरज अौर न जाने कहाँ कहाँ गति कर सकता है। मजे की बात यह है कि जबरजस्ती रोका गया तो मुश्किल से रुकेगा। इस कोाशिश में उसे और नए नए विषय मिलते चले जाते हैं, कड़ियों से कडियाँ जुड़ती चली जाती है फलतः मन की स्थिरता और समरसता समाप्त हो जाती है। लेकिन सतत अभ्यास से यह साध्य हो जाता है।

जीह देहरी द्वार

  💥जीह देहरी द्वार 💥

जब हम सोते है तो थोड़ा सा जागते हैं और जब जागते हैं तो थोड़ा सा सोते हैं। कहने सुनने में यह अजीब लगेगा पर ऐसा है। जब शरीर को जरा सी असुविधा होती है तो हम सोते सोते करवट ले लेते हैं, सर्दी लगने लगती है तो बिस्तर पर पड़ा कम्बल ओढ़ लेते हैं। जागते हैं तब पता चलता है कि हम जब सोए थे तब कंबल बिस्तर पर केवल फैला सा पड़ा था जाने कब और कैसे हमने उसे ओढ़ लिया। सोने लगे तब की शारीरिक स्थिति कुछ होती है जब उठते है तब कुछ और पाते है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर  भीड़ में सोते हुए आदमी को उसका साथी आवाज देता है तो वह सुन कर उठ बैठता है, उसे महसूस होता है कि मुझे ही पुकारा जा रहा है। ठीक इसी तरह ही आदमी जागते हुए भी सोता है। परिवार का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है उसे तुरन्त सहायता पहुँचाने की गरज से दोड़ते हुए आदमी को कोई परिचित जोर से भी पुकारे तो वह सुनता नहीं है। वह जाग कर भी सोए हुए आदमी सा व्यवहार करता है। वह सड़क पर शरीर से है पर मन से तो अस्पताल में ही है, ठीक उस तरह जैसे नींद में बिस्तर पर सोया आदमी भेड़ाघाट के झरने और उसके शोर को देख सुन रहा हो।
जागने और सोने का कोई एक सन्धि स्थल जरूर है जिसके इस पार जागना और उस पार सोना है। दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो जागना-सोना एक सापेक्ष स्थिति है या कहा जाना चाहिए कि जिस जगह है उसी जगह पर पूरी तरह मौजूद होना जागना है और उसी जगह न रहते हुए कहीं और विचरण करना सोना है। बहुत अच्छे से समझा जाए तो जागने-सोने की इस प्रक्रिया में मन ही जिम्मेदार है। जहाँ शरीर है वहीं मन है, वर्तमान है,  तो समझो जागे हुए हो और अलग अलग हो तो समझो "सोए हुए" से कुछ अलग नहीं हो। जब सो कर स्वप्न देख रहे हो तो आपका कोई बस नहीं पर बिना सोए मन भटका रहे हो तो जाग कर भी सोए ही हो, गफलत में हो। "संकल्पना" और "स्वप्न" को एक ही समझने की भूल मत कर बैठना। "संकल्पना" मानव और केवल मानव को ईश्वर प्रदत गुण है जो मनुष्येतर प्राणी में नहीं। यही तर्क अौर ज्ञान की उपलब्धि में सहायक होती है। लेकिन नियंत्रण के अभाव में ध्वंसात्मक हो सकती है। स्वप्न यथार्थ तो है पर सत्य नहीं है। जागते ही स्वप्न का यथार्थ घुटने टेक देता है। छोटे और तात्कालिक अर्थों में स्वप्न जल्दी ही "अनित्य" मालूम हो जाते हैं पर यह जगत पता नहीं चल पाता है कि यह भी एक बड़ा "अनित्य" है। वस्तुत: जाग्रत अवस्था और स्वप्नावस्था दोनों ही मन के परिक्षेत्र है। संसार मनोमय है। मन फैलता है तो जगत फैलता है, मन सिकुड़ता है तो जगत का प्रभाव भी सिकड़ता है। मन का बहुत सारा नियन्त्रण तो उसे वर्त्तमान में रखने से ही हो सकता है। दूसरी सीढ़ी है उसका परिक्षेत्र सीमित करने की। तीसरी सीढ़ी है इसे मौन करने की। मौन कर लिया तो हम सुषुप्ति के बिल्कुल निकट होंगे, ध्यान की उपलब्धि के निकट, धारणा के उस पार। यहाँ आनन्द का साम्राज्य है। दुःखों और सुखों से परे आनन्दानुभूति। जिस मन को लोग भला बुरा कहते रहते हैं वह न लगे तो अन्तर्यात्रा असम्भव है। यह अतःकरण का गेटकीपर है(जीह देहरी द्वार)। इस संधि पर दीप जला तो भीतर-बाहर का उजास होगा।
  "मन तू जोत सरूप है, अपना मूल पछाण।"

"इस मन के उजास में जागते रहाे- भीतर जागते रहो, बाहर जागते रहाे।" 

जीवन एक उत्सव है

😊जीवन एक उत्सव है😊

     जरा सोच कर देखें-- "हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है इसलिए मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है। मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण और भव्य होने चाहिए।"
यह विचार आते ही  आपके भीतर ही भीतर एक क्रान्ति का जन्म होगा, ऐसी क्रान्ति जो जीवन को सकारात्मकता से भर देगी। आपको लगेगा कि आप आज और अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और कोई अभी कोई आपको झकझोर कर खड़ा करके चला गया। आपको तुरन्त यह भी महसूस हो जाएगा कि अपने  आपको जगाने वाले आप स्वयं हैं। आपके सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा।
उपनिषद् इसको कहता है आप में "जिजीविषा" अर्थात् जीने की चाह हो। यही जिजीविषा मुर्दे में भी जान फूँक सकती है। शरशैया पर पड़े भीष्म जिजीविषा से ही अपनी मृत्यु पर नियंत्रण पा सके थे। हम कई बार देखते हैं कि डॉ जवाब दे देते हैं कि मरीज को अब उपचार के दम पर बचाया नहीं जा सकता लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से कई व्यक्ति पुनर्जीवित हो जाते हैं। सोचिये यदि जिजीविषा व्यक्ति को मृत्यु के मुख से लौटा सकती है तो जीवन के सामान्य दिनों में तो विलक्षण और अद्भुत कार्य की संभावनाओं को भला कौन रोक सकता है। यह विचारों की ही सामर्थ्य कि शिथिल पड़े शरीर और मन ऊर्जा से भर उठते हैं। यह ऊर्जा इम्पोर्टेड नहीं है, आपकी अपनी है, आवश्यकता है उसे पहचानने की, आवश्यकता है अपने भीतर भरे ऊर्जा भण्डार के दोहन की। सिर्फ प्रयोग करके देखिये, वह दिन है आज और वह समय है अभी। संकल्प करने वाले व्यक्ति हैं आप और संकल्प जहाँ ठहरेगा वह है आपका मन। कर्मक्षेत्र है जीवन और कर्मठता है आपकी भक्ति। कर्म में रुचि तभी होगी जब मन आशाओं और उमंगों से भरा होगा। उत्साह और उमंग है तो जीवन उत्सव है। हमें उत्सव चाहिए या मातमपुर्सी हमारी अपनी चॉइस है। दोनो सदैव उपलब्ध है। उत्सव चाहने से आवेगा। आपके कर्मक्षेत्र में आपने अपनी सफलता के बीज नहीं बोए तो उसमें निराशा और हताशा की उपज खुद उग जाएगी। आज की उपलब्धि वह पहली सीढ़ी है जहाँ से आगे आपके जीवन की अगली सीढ़ी जुड़ी हुई है। इसलिये आज को जीवन के उत्सव का प्रथम दिवस बनाइये। जीवन आनन्द और उत्साह से भर जाएगा।

Saturday, 24 September 2016

तू सबका ही शिल्पकार है

अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिम-आच्छदित शैल-शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर l
        इन सबका तू शिल्पकार है l 
       तेरी महिमा अमित अपार है l l

हहर-हहर कर झरते निर्झर
कल-कल बहती सरिता अविरल
हरित-वसन धरि वसुधा सुन्दर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

बिंदु, बिंदु से सिन्धु बनाता
कुंद-इंदु से रस सरसाता
पुष्प-पुष्प में गंध समाता
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

अग-जग, अचर-जीव सृष्टि में
रवि-शशि आतप और वृष्टि में
अविरल है क्रम सृजन-क्षरण का
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l

विश्व सकल तेरा है मंदिर
कण-कण तेरा विलास है
सत्य सनातन मेरे प्रभुवर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l
              रामनारायण सोनी 

Thursday, 22 September 2016

मंत्र-शब्द-मन

♻मंत्र-शब्द-मन ♻

निवेदन....

मंत्र में अचित्य शक्ति होती है। हमारा सारा जगत् शब्दमय है। शब्द को ब्रह्म माना गया है।

मन के तीन कार्य हैं-
~स्मृति, कल्पना एवं चिन्तन~
मन प्रतीत की स्मृति करता है, भविष्य की कल्पना करता है और वर्तमान का चिन्तन करता है।
       ...किन्तु शब्द के बिना न स्मृति होती हैं, न कल्पना होती है और न चिन्तन होता है। सारी स्मृतियां, सारी कल्पनाएं और सारे चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
हम किसी की स्मृति करते हैं तब तत्काल शब्द की एक आकृति बन जाती है। जैसे भगवान श्रीराम के श्रीविग्रह की स्मृति को स्थायित्व शब्दों से पुनः सजीव हो जाती है।
उस आकृति के आधार पर हम स्मृत वस्तु को जान लेते हैं। इसी तरह कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का बिम्ब ही सहायक होता है।
यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो मन चंचल हो नहीं सकता। मन शब्द का आधार ले कर टिक सकता है। नाम जप इसका प्रमाण है।
मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है।
सोचने का अर्थ है-भीतर बोलना। सोचना और बोलना दो नहीं है। सोचने के समय में भी हम बोलते हैं और बोलने के समय में भी हम सोचते हैं।
यदि हम साधना के द्वारा निर्विकल्प या निर्विचार अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें शब्द को समझकर उसके चक्रव्यूह को तोड़ना होगा।
यह सारा जगत तरंगों से आंदोलित हैं। विचारों की तरंगे, कर्म की तरंगे, भाषा और शब्द की तरंगे पूरे आकाश में व्याप्त है, सर्वत्र। शक्तिशाली शब्दों का समुच्चय ही मंत्र है। शब्द में असीम शक्ति होती है जो मंत्र बन कर विस्तार पाती है।

योग से तन-मन का स्वास्थ्य

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अपने जीवन में सौंदर्य

अपने जीवन में सौंदर्य देखना चाहते हो तो आओ जरा मेरे साथ चल कर देखो।

हम में से हर एक के जीवन में यादों का विशाल भंडार भरा पड़ा है।
कुछ मधुर तो कुछ कड़वे,
कुछ आनन्द पूर्ण कुछ पीड़ा दायक,
कुछ अवसाद भरे तो कुछ प्रेरणास्पद।

कुछ ऐसे पल भी हैं कि जिनके कारण हमारा जीवन सँवर गया,  वहीँ कुछ ऐसे पल भी थे कि जो हाथ से फिसल गए और जिनके कारण सुनहरे अवसर का लाभ नहीं ले पाए।

अपनी याददाश्त को टटोल कर जैसा आप देखना चाहते हो वैसे-वैसे चुन कर देख लो, जो जो देखोगे उस-उस के अनुरूप अभी अनुभतियाँ सजग हो जाएगी। चुनाव आपका ही है कि आप इनमें से क्या पसंद करते हैं।

 बेहतर ता यही होगा कि आप सुखानुभूति वाले पल चुनें। वे आपको गुदगुदाऐगे। आप और भी आनन्दित महसूस करेंगे। 

शब्द और मन

शब्द और मन

हमारा सारा जगत् शब्दमय है। शब्द अक्षर से निर्मित है। अक्षर  ही ब्रह्म है।

😌मन के तीन कार्य हैं-
स्मृति😴 कल्पना 😔एवं चिन्तन🤔।

☝मन उसकी स्मृति करता है जो घटित हो चुका  है,  भविष्य की कल्पना करता है जो अभी आया ही नही है, और वर्तमान का चिन्तन करता है।
शब्द के बिना स्मृति ही नहीं होती हैं, 'बादल' शब्द स्मृति में होगा तभी आकाश में कभी देखे गए बादल  स्मृति में आएँगे। बादल शब्द कहते ही किसी को वास्तविक बादलों की स्मृति होगी। उसी प्रकार शब्द के बिना न कल्पना होती है और न  ही चिन्तन होता है। शब्द एक तरह से अलग-अलग चीजों के कोड है इसलिये सारी कल्पनाएं और सारा चिन्तन शब्द के माध्यम से ही चलता हैं। कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का  ही आश्रय होता है।
यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो जगत में किसी की कोई पहचान नहीं रह जाएगी।

सहज योगी अच्छे से जानते हैं कि
मन की चंचलता वास्तव में ध्वनि की, शब्द की या भाषा की चंचलता है। मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है।
सोचने का अर्थ है-भीतर बोलना। सोचना और बोलना दो नहीं है। सोचने के समय में भी हम बोलते हैं और बोलने के समय में भी हम सोचते हैं।
यदि हम साधना के द्वारा निर्विकल्प या निर्विचार अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें शब्द को समझकर उसके चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। उससे बाहर आना होगा। यह सारा जगत सब और तरंगों से भरा पड़ा है। विचारों की तरंगे, कर्म की तरंगे, शब्द की तरंगें। शब्द में असीम शक्ति होती है। साधना से शब्द स्वयं ही नेपथ्य मे चले जाते हैं और सहज योग मे तो एक दम सरलता से संभव हो जाता है। निर्विकार होना निर्विचार होने की पहली सीढी है। यह सीढी पार करते ही शब्द स्मृतियों को अपने आप शिथिल कर देता है। इसलिये शब्द  की साधना ब्रह्म की उपासना  है। शायद इसीलिये सहज होना ब्रह्म के सरलता से निकट जाना है।

मन की वृत्तियाँ

मन की वृत्तियाँ

मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ सदैव काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किसे रोका जाय, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। यदि सही दिशा में जा रहा है तो उसे प्रोत्साहन दिया जाय और यदि दिशा गलत है, तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाना चाहिए। यही हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाना ही जरूरी है।

शुभ संकल्प वाला मन आशावादी, दूरदर्शी और पुरुषार्थी होता है। वहीं सदा निराश रहने वाला मन कठिनाइयों की बात सोच-सोचकर खिन्न रहने वाला रहता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में असमर्थता महसूस करता है। ऐसा नहीं है कि मन बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर यह संभव है। इसका सुधार जाना ही जीवन का वास्तविक सुधार है।
जिनने अपने भीतर आशा और उत्साह का वातावरण बना लिया है उज्ज्वल भविष्य का उदीयमान सूर्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।असफलताएँ, बाधाएँ और कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और आगे बढऩे की चेतावनी देने आती हैं वे हमारी शत्रु नहीं हैं।
शुभ संकल्प युक्त मन वाले व्यक्ति छोटी-छोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं, क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र साबित होते हैं।

मनुष्य की शक्तियाँ महान हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती है। बार-बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन हो पाता है। जिस व्यक्ति ने स्वयं को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है, उनकी जीवन साधना सफल हुई है।

क्या बॉटना चाहते हो?

क्या बॉटना चाहते हो?

 जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बो से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। भगवान को पुष्प चढ़ाओगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी। कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और  रबड़ी पीने को मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के वक्त रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी संवेदनाएँँ मर चुकी है। परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजरिया खराब नहीं था, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बाय प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न तो दीपक और न दियासलाई ढूँढ पाओगे। पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।

बड़ी समस्या, छोटे-छोटे हल

बड़ी समस्या, छोटे-छोटे हल

घर का दरवाजा घर से छोटा, दरवाजे पर लगने वाला ताला दरवाजे से छोटा और इस ताले से भी छोटी होती है इसकी कुंजी। कहाँ विशाल घर और कहाँ छोटी सी कुंजी। घर की सुरक्षा की पहली और अंतिम जिम्मेदारी कुंजी की ही है। कुंजी पूरा घर खोल सकती है। कुंजी न हो तो घर कैसे बन्द हो और कैसे खुले। एक बात और है कि घर पर ताला लागा हो और कुंजी न हो तो अपना मकान भी अपने काम का नहीं।
कुंजी की खास बात यह है कि वह एक बारीक से छिद्र से ताले के भीतर प्रवेश करती है और वहीं अपना काम करती है, वहाँ जाकर ताले के भीतरी भाग में संपूर्ण चक्कर लगाती है। उसे इस प्रकार बनाया गया है कि ताले के भीतरी पुर्जों में सधी हुई मात्रा में काम करती है।
देखो!  जितना ख्याल मकान का रहे उतना ही कुंजी का भी रहे।
जिस तरह मकान को खोलने के लिए छोटी सी कुंजी कमाल का काम करती है उसी तरह बड़ी बड़ी समस्याओं का हल छोटी छोटी बातों से, छोटे छोटे सुविचारों से संभव है। वे हमारे भीतर जा कर कुंजी की तरह काम करते है। इस प्रकार आवश्यकता है सम्यक सोच की,आवश्यकता है सम्यक दृष्टि की, सम्यक प्रकार से समस्या के समाधान में विचारों का उपयोग करने की।

परम चेतना

"परम चेतना"
एक आदमी हरि प्रसाद चौरसिया के घर इस नीयत से चोरी करने घुस गया कि इनकी बॉंसुरी से मधुर संगीत झरता है। वहॉ से उसने चार-पाँच बँसुरियाँ चुरा ली और एक संगीत संध्या में बजाने पहुँच गया। उस बिचारे को पता नहीं था कि वाँसुरी में स्वर उस बाँस से नहीं अपितु वादक के हृदय से प्रारंभ हो कर बॉंसुरी के छिद्रों से बाहर निकलते हैं। वस्तुतः बाँसुरी उन स्वरों की अभिव्यक्ति का साधन है जो हृदय की भूमि पर लहलहा रहे हैं। वेद कहता है --
"ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्टितम्...।"
हे दयामय ! मुझे वरदान दो कि वाणी मेरे मन में प्रक्तिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। साधक को पहले वाणी को हृदय में प्रतिष्ठित करना होगा, फिर मन और वाणी का तादात्म्य पाना होगा और तब लय प्राप्त होगी। लय तो योग है ही। जो हृदय मे बैठ जाएगी वही बाहर आवेगी। वाणी तो स्पन्दन है, स्पन्दन ही सुर है, सुर ही हवा पर सवार होते है। यह जगत वाणी के विस्तार का स्थान है।
एक बात और इसके भी ऊपर है वह यह कि इसके मूल कारण में परम चैतन्य है। बिना चेतना का हरिप्रसाद चौरसिया कोई बाँसुरी नहीं बजा सकेगा।
मेरे जीवन की बॉसुरी भी आत्मा की चेतना ही से बज रही है। जितनी भी बाँसुरियाँ है सब की सब उसी चेतना ही से तो बज रही है। बाँसुरी का प्राण रंध्र चेतना की फूँक पाता है फिर वह सात निर्गम द्वारो से जगत में प्रवेश करती है। जो स्वर जगत सुनता है उसका मूल कारण तो चेतना की फूँक ही है। हमें लगता है इसे चौरसिया जी ही बजा रहे है। असल में तो ...."निमित्त मात्रं शरीराणि।"

लघु चिन्तन

आज का लघु चिन्तन
धरती पर ये प्राणी  हमें कुछ सिखाते हैं:---

१, हमारी सुबह और शाम कैसी हो, बरगद के झुरमुट में चहचहाते पंछियों से सीखें।
२, उल्लू को हम चाहे जितना कोसें, वह अन्धकार में भी जीवन ढूँढ लेता है।
३, चमगादड़ भले ही उल्टी लटकती रहती है पर वह कमाल का राडार है।
४, कोई सामूहिकता, चक्रव्यूहात्मक आक्रमण और सशक्त टीम वर्क सीखना चाहे तो जंगली कुत्तों से सीखे।
५, गाय की जुगाली से एकाग्रता और चिन्तन
सीखें।
६, मोर और लार्क से आनन्द को उत्सव बनाना सीखें।
७, शेर से ''स्वयमेव  मृगेन्द्रता'' सीखें।
८, कोयल सा वाणी का माधुर्य और भला कहाँ।
९, बकरी से सीखें काँटों के बीच से भी अपना भोजन चुन लेना।
१०, मधुमक्खी से सीखें कड़वे-मीठे फूलों से मधुर-मधु बनाना।
११, गिद्ध से सीखें दूरदृष्टि और पैनी दृष्टि रखना।
१२, चकोर से सीखें लक्ष्य साधना और धारणा में स्थित होना।
१३, कंगारू से सीखें अपनी सन्तान को संग और सुरक्षित रखना।
१४, तोते से सीखें शुभवाक्यों को कंठस्थ करना

आदमी समय को रोकने के लिये घण्टाघर की सुई पर लटक भी जाए तो न तो वक्त रुकेगा न वक्त की बरबादी।

डर का डर

"डर का डर"

"तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्।
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्।।"

"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है। डर हर प्राणी का नैसर्गिक स्वभाव है।
नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि  बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का  अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो छुपने की कहीं जगह न हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है।
इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत घोलो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"।
भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम  रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं।
वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।

स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो पाती  हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है।
स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में  दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ?  वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा।

या मौला खर्च बढ़ा


मेरे जीवन की एक छोटी सी घटना

मैं चश्मे के काँच लगने की प्रतीक्षा में बैठा था, कटारिया औप्टीशियन के ८० वर्षीय मालिक से मैने पूछा एक वाक्य में अपने जीवन का अनुभूत आदर्श सन्देश बताइये।

वे तपाक से बोले-
मैं सुबह उठते ही बोलता हूँ ---

🙏या मौला! खर्च बढ़ा...

🤔🤔🤔
मैं आश्चर्य में उनकी ओर देखने लगा। इस पर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हर व्यक्ति की ऐसी ही प्रतिक्रिया उन्हे देखने को मिलती थी।
....
.....




उन्होंने पूछा -  कारण जानना नहीं चाहोगे?

मैने हाँ इसलिये नहीं कहा कि मैं तो खर्च कम करना चाहता हूँ,
और
ना इसलिये नहीं बोला कि शायद इसके पीछे अदृष्य जरूर कुछ होगा ही।

परन्तु

उन्होने कहा.....
....
.....
......

मैं उस खर्च को बढ़ाने की कह रहा हूँ  जिससे मैं
.......अपने परिवार के हर बड़े छोटे सदस्य का परिपालन कर सकूँ....
मेहमान की अच्छी आवभगत कर सकूँ....
असहाय की मदद कर सकूँ......
जितना बन पड़े सत्कार्यों में दान कर सकूँ....

और चूँकि.....

""अब खर्च मैंने मौला से माँगा है तो कहाँ से आएगा, इसकी फिक्र मौला ही करेंगे।""

मेरा चश्मा तैयार हो गया। मालिक मुस्कुराते हुए दुकान से निकला और स्कूटर पर बैठ कर लन्च पर चला गया।

मैं अवाक् रह गया कि---

उनमें कर्म की प्रतिष्ठा, अपनी जिम्मेदारी, परमार्थ का संकल्प और ईश्वर पर अटल विश्वास का अद्भुत समन्वय था।

सौन्दर्य जीवन का

उपासना, स्वप्न और बीज एक जैसे है। सामान्यतया तो ऐसा लगता है कि इनमें कुछ नहीं है लेकिन इनमे सब कुछ करने की क्षमता है।

उपासना, सपने और बीज। इन तीनों में एक विचित्र सा साम्य है। प्रत्यक्ष रूप में तो ऐसा लगता है कि ये तीनों ही अपने आप में कुछ नहीं लेकिन इनके गर्भ में असीम वैभव भरा पड़ा है। उपासना से आनन्द, सपने से जीवन और बीज से आगे सृष्टि का सृजन होता है। जिस तरह वटवृक्ष के एक बीज के भीतर एक वटवृक्ष और फिर उस एक वटवृक्ष के द्वारा पुनः अनगिनत बीजों का सृजन संभव है। उसी तरह एक उपासना में और सपने में अनंत सृजन की सम्भावना भरी पड़ी है। उपासना के अपने ढंग हो सकते हैं, सपनों के अपने आकार हो सकते हैं और बीज की अपनी बहुगुणन क्षमता हो सकती है परंतु एक बात तो तय है कि ये तीनों ही अपने भीतर वैभव की विशाल सम्पदा संजोए है। बगैर उपासना के परम की आराधना, बगैर सपनों के सार्थक जीवन और बगैर बीज के अग्रिम भविष्य के बीजों का होना अकल्पनीय है। आवश्यकता है इस क्षमता को पहचानने की, आवश्यकता है इनके महत्व को अनावृत्त करने की, आवश्यकता है इसके आचरण में लाने की।


अपने जीवन में सौंदर्य देखना चाहते हो तो आओ जरा मेरे साथ चल कर देखो।

हम में से हर एक के जीवन में यादों का विशाल भंडार भरा पड़ा है।
कुछ मधुर तो कुछ कड़वे,
कुछ आनन्द पूर्ण कुछ पीड़ा दायक,
कुछ अवसाद भरे तो कुछ प्रेरणास्पद।

कुछ ऐसे पल भी हैं कि जिनके कारण हमारा जीवन सँवर गया,  वहीँ कुछ ऐसे पल भी थे कि जो हाथ से फिसल गए और जिनके कारण सुनहरे अवसर का लाभ नहीं ले पाए।

अपनी याददाश्त को टटोल कर जैसा आप देखना चाहते हो वैसे-वैसे चुन कर देख लो, जो जो देखोगे उस-उस के अनुरूप अभी अनुभतियाँ सजग हो जाएगी। चुनाव आपका ही है कि आप इनमें से क्या पसंद करते हैं।

बेहतर ता यही होगा कि आप सुखानुभूति वाले पल चुनें। वे आपको गुदगुदाऐगे। आप और भी आनन्दित महसूस करेंगे। 

मूल की ओर जाओ

बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता परंतु आग ही नहीं पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है। अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है और ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी वापस अपने मूल स्वरूप में लौटने पर उसी ऊर्जा स्खलन हो जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अन्तर्निहित हो अथवा किसी स्रोत से मिले पर ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता, ऊर्जा किसी स्रोत से मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना लेले।

जीवन का उत्सव

जीवन का उत्सव

      हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है । मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है । मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण होने चाहिए ।

"कीर्तिर्यस्य स जीवति।"

कायर व कमजोर होकर नहीं अपितु स्वाभिमान व आत्मज्ञान के साथ जीवन को जीना कला है। भगवान ने महान् कार्य करने हेतु हमारा सृजन किया है।
इसलिए न बहुत भागो! न बहुत भोगो !!  हड़बड़ा कर भागने वाले कायर, कमजोर लोग हैं तथा भोगी तो अविवेकी ही होते हैं। भागम-भाग तो दुनियाँ में सदा से मची है। हम भी इससे न बच पाएँगे। यहाँ हर कोई चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में से किसी न किसी को या सब को पाने के लिए भाग रहा है, लेकिन इस भागने में खुद को नहीं भूलना है।
रात विश्रान्ति के लिए, दिन भर का श्रम दूर करने के लिए थी। रात अनचाहे, अचीते स्वप्नों से भरी हो सकती है
अतः अब जागो !
जागो! जागने पर ही सवेरा ज्ञात हो पाएगा। बिना जागे सवेरा न देख पाओगे। जागते ही ऊषा की रक्तिम रश्मियाँ हमारा स्वागत करेगी। और जागने पर मन चाहे स्वप्न देख पाओगे। भुवन भास्कर परमात्मा का अव्यय स्वरूप है। अव्यय याने जो खर्च करे पर उसके पास खूटे ना। वह  इस रूप में करोड़ों साल से ऊर्जा खर्च कर रहा है पर खुटी नहीं। आज भी वह ऊर्जा लेकर आया है। घर बैठे पा लो। जीवन एक उत्सव है। यह जीवन परमात्मा का सबसे बड़ा उपहार है। यह देह देवालय, शिवालय व भगवान का मन्दिर है। यह शरीर अयोध्या है। इसमें अपने राम का, अपने इष्ट का एहसास करो।

"जीवन में सत्कर्म के फूलों की खेती होगी तो सौंदर्य और सुगन्ध एक साथ आवेगी।"

गुरु अमृत की खान

गुरु अमृत की खान

मैने सुना है - गुरू गाय है। दुधारू गाय। गाय के स्तनों में भरा दूध तब तक बाहर नहीं आता है जब तक उसका बछड़ा दूध पीने नहीं आता।
यह कपाट उसकी स्नेह मयी ममता से ही खुलता है। खुला ही रहता है जब तक बछड़ा तृप्त नहीं हो जाता। माँ पिलाती रहती है बछड़ा पीता चला जाता है। किसी को दूध दिखाई नहीं देता है।
एक तरफ स्रोत है , ममत्व है, देने का ही भाव है। दूसरी दूसरी तरफ ललक है, प्यास है, अनुरक्ति है और ग्रहण करने की चाह है।
मैने तो यह भी सुना है कि अगर गाय का आँचल (मालवा में गाय के स्तनों को आँचल कहते हैं) दूध से भरा हो और बछड़ा उसे न पिए तो उसके आँचल में दर्द होने लगता है? कहना बड़ी बात नहीं होगी कि दुधारू गाय को भी बछड़े की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसके ऊपर यह भी सत्य है कि बछड़े को दूध उसकी माँ ही पिलाएगी। यह रिश्ता है ममत्व का, दाता का, करुणा का, प्यास का, प्रेम का।

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मैने यह भी सुना है कि गुरु बहती गंगा है। बीच में धार बहती है दोनों ओर रेत ही रेत है। सूखी रेत। किसी को प्यास लगी उसने १००-२०० मीटर दूर रेत में गड्ढा बनाया तो वह देखता है कि निर्मल, स्वच्छ नीर छन छन कर गड्ढे में तैयार है। गंगा को पता ही नहीं कौन आया और अपनी प्यास बुझा गया। लेकिन गंगा में जल है तो पोखर में पानी होगा, पोखर तब होगा जब कोई प्यासा होगा और पोखर तब होगा जब प्यास होगी, पोखर तब होगा जब प्यासा उसे खोदने का यत्न करेगा, और प्यास तब बुझेगी जब प्यासा जल पिएगा। "जल अजस्र होगा।" चाहे जितना पिए, पोखर भरता जाएगा। गंगा अपनी धारा ले कर कहीं बहती रहे। प्यासे के लिए वह रेत के भीतर से बह कर आवेगी। किसी को पता नहीं चलेगा गंगा वहाँ कैसे पहुँच गई। यहाँ रिश्ता है गंगा का और प्यासे का। प्यासे के विश्वास का कि पोखर में गंगा आवेगी, उसकी प्यास बुझाएगी। एक तृप्ति तक ले जाएगी।


मैने यह भी सुना है कि गुरू सितार है। कोई दूसरा सितार कहीं पास में रखा है। दोनों सितारों के तारों में अनुदैर्य का साम्य हो गया। अनुदैर्य याने वे समान फ्रीक्वेन्सी पर ट्यून्ड हैं। पहला सितार बजना प्रारंभ करता है। उसमें से स्वर लहरियाँ निकलती हैं। यह नाद है। यहाँ सप्तक है। सुरम्य तरंगें वातावरण गूँजती है। तरंगें दूसरे सितार तक पहुंचती हैं तब वह दूसरा सितार अपने आप बज उठता है। उसे कोई नहीं बजा रहा पर  अनुगूँज से ही बज उठता है। पहले सितार को पता ही नहीं चला कि दूसरा सितार बज उठा है।
बस वह मुख्य सितार तो बज रहा है, बजता जा रहा है। उसमें नाद है। नाद तो असल में ब्रह्म है। इसलिये यह ब्रह्मनाद ही है। जो बजाए से बजे वह तरंग है लेकिन कबीर कह गया कि जो बिना बजाए बज गया वही अनहद है। यहाँ रिश्ता है सितारों का, उनकी ट्यूनिंग का, नाद का, अनुनाद का, हद से अनहद-नाद का।

🛂रिश्ता🛐
रिश्ता गाय-बछड़े का, रिश्ता गंगा से प्यासे का, रिश्ता सितार-दर-सितार का-- रिश्ता है सद्गुरू से शिष्य का।
🙏🙏🙏🙏
वन्दन सहित....