Monday, 9 May 2022

धड़कनों में तुम

वह दिल भी क्या दिल है
जो धड़कना नहीं जानता
वह आँख भी कोई आँख है
जो फड़कना नहीं जानती
उस कान को भी कान कैसे कहें
जो उनके मौन को न सुन सके
वे रोंएँ तो तन की जमीन पर
बेजान उगी हुई तृणें हैं
जो रोमांचित होना नहीं जानती
वे यादें सब मरी मरी सी हैं
जो मन मस्तिष्क के आकाश में
बिजली सी गरजती और कौंधती नहीं
ये नजरें भी बस
काँच की निरी गोलियाँ सी ही हैं
अगर ये खाली कैनवास पर भी
तुम्हें नहीं देख सके
वह प्रज्ञा ही तो है 
जो हजारों आहटों में से
उसके हल्की सी पदचाप को भी
साफ साफ सुन लेती है
तुम्हें बता दूँ!
कि ये सब एक साथ
मेरे पास हैं, मेरे साथ है,
और मुझ में मौजूद है
इसलिये ही तो मैं..
महसूस करता हूँ मैं पूरी तरह
तुम्हें! हमेशा!!

रामनारायण सोनी
९.५.२२

Thursday, 18 January 2018

उपनिषद एक परिचय

!---: उपनिषदों का सामान्य परिचय :---!!!
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"उपनिषद्" शब्द का अभिप्राय
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उपनिषद् शब्द में उप और नि उपसर्ग है, सद्लृ धातु से बना है । इस धातु के तीन अर्थ हैं---
(1.) विशरण अर्थात् नाश होना,
(2.) गति अर्थात् प्राप्त करना या जानना ,
(3.) अवसादन अर्थात् शिथिल होना ।

उपनिषदों के अध्ययन से अविद्या का नाश होता है । ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है और सांसारिक दुःख शिथिल होता है । उपनिषदों में ब्रह्मविद्या है । ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक ग्रन्थों को उपनिषद् कहा जाता है ।

सद्लृ धातु का अर्थ बैठना भी होता है । गुरु के समीप बैठना । गुरु के समीप बैठने से रहस्यमय ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि उपनिषद् जिसमें विद्या का कथन हुआ हो, गुरु के अतिनिकट रहकर रहस्यमयी विद्या को प्राप्त करना ।

उपनिषदों को रहस्य भी कहा जाता है ।

उपनिषदों की संख्या अनगिनत है । किन्तु वैदिक-विचारधारा अनुसार कुल मुख्य उपनिषद् 10 हैं ।

(क.) ऋग्वेद से सम्बन्धित---(1.) ऐतरेय, (2.) कौषीतकि,

(ख) शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित---(3.) बृहदारण्यक, (4.) ईश,

(ग) कृष्णयजुर्वेद से सम्बन्धित---(5.) तैत्तिरीय, (6.) कठ, (7.) मैत्रायणीय. (8.) श्वेताश्वतर,

(घ) सामवेद से सम्बन्धित---(9.) छान्दोग्य,, (10.) केन,

(ङ) अथर्ववेद से सम्बन्धित---(11.) मुण्डक, (12.) माण्डूक्य, (13.) प्रश्न ।

उपनिषदों का सामान्य परिचय
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(1.) ईशोपनिषद्
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शुक्लयजुर्वेद का अन्तिम व चालीसवाँ अध्याय ही "ईशोपनिषद्" है । इसमें कुल 18 मन्त्र हैं । इसका प्रथम मन्त्र "ईशावास्यम्" से प्रारम्भ होता है, अतः इसका नाम ईशोपनिषद् पड गया ।

निष्काम कर्म, परमार्थ ज्ञान की प्रधानता, कर्म और ज्ञान का समन्वय और ईश्वर की सर्वव्यापकता इसका प्रतिपाद्य विषय है । यह लघुकाय किन्तु महत्त्वपूर्ण उपनिषद् है ।

यह ज्ञान, कर्म और उपासना का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है । अतः इसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ग्रन्थ माना गया है ।

(2.) केनोपनिषद्
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इस उपनिषद् का प्रथम श्लोक "केनेषितम्" है, अतः इसका नाम "केनोपनिषद्" पड गया ।

इसमें चार खण्ड हैं । प्रथम दो खण्डों में ब्रह्म के रहस्यमय रूप एवं अमृतत्व का विवेचन तथा तृतीय एवं चतुर्थ खण्डों में उमा हैमवती के समधुर आख्यान प्रस्तुत किए गए हैं ।

इस उपनिषद् को "जैमिनीयोपनिषद्" और "तवलकारोपनिषद्" भी कहा जाता है ।

(3.) कठोपनिषद्----
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कृष्णयजुर्वेद की शाखा "कठ" से सम्बन्धित होने के कारण इसका नाम "कठोपनिषद्" है । इसमें दो अध्याय है । इसके प्रथम अध्याय में प्रसिद्ध यम और नचिकेता का संवाद है ।

इसमें आत्मा के विषय में प्रश्न किया गया है । यम के उत्तर से मृत्यु के रहस्य से पर्दा उठ जाता है । साथ ही आत्मा के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है ।

इसमें ऐहिक जगत् की नश्वरता और ब्रह्म की नित्यता को प्रतिपादित किया गया है ।

(4.) प्रश्नोपनिषद्
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इस उपनिषद् प्रारम्भ प्रश्नों से होता है । अतः इसका नाम "प्रश्नोपनिषद्" पड गया । प्रश्न छः ऋषि पिप्पलाद मुनि से पूछते हैं । यह अथर्ववेद के पिप्पलाद शाखा से सम्बन्धित है, जिसके मुख्य ऋषि पिप्पलाद ही है । पिप्पलाद ऋषि जो केवल पीपल के फलों को खाकर जीवित रहे, इसलिए उनका नाम पिप्पलाद पड गया ।

इसमें ब्रह्मविद्या से सम्बन्धित प्रश्न पूछे गए हैं---
(1.) समस्त प्रजा कहाँ से और कैसे उत्पन्न हुई ।
(2.) प्रजा को धारण करने वाले देवता कितने हैं ।
(3.) प्राणों की उत्पत्ति कहाँ से होती है ।
(4.) आत्मा की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति --इन तीन अवस्थाओं का क्या रहस्य है  ।
(5.) ओम् की उपासना का क्या स्वरूप है ।
(6.) षोडश कला सम्पन्न पुरुष का क्या स्वरूप है ।

इन सभी प्रश्नो के उत्तर आप इसी वैदिक संस्कृत पेज पर पढ सकते हैं, जो गतवर्ष लिखे गए । आप उन्हें प्रश्नोपनिषद् लिखकर सर्च कर लें, इसी पेज पर ।

(5.) मुण्डकोपनिषद्
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"मुण्डक" शब्द का अर्थ है---घुटे हुए सिर वाला । सम्भवतः सिर घुटाने वाले लोगों के किसी सम्प्रदाय से इसका सम्बन्ध रहा हो ।

यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है । इसमें तीन मुण्डक एवं छः खण्ड हैं । इसमें ब्रह्मविद्या के उपदेश की प्रधानता है ।

इसमें बताया गया है कि ब्रह्मा ने अपने पुत्र अथर्वा को ब्रह्मा विद्या का उपदेश दिया है । इसमें याज्ञिक अनुष्ठान और कर्मकाण्ड की हीनता दिखाई गई है, जबकि ब्रह्मज्ञान की श्रेष्ठता प्रमाणित की गई है ।

सांख्य और वेदान्त के सिद्धान्त भी इसमें प्रतिपादित किया गया है । द्वैतवाद का प्रसिद्ध मन्त्र इसमें दिया गया है---"द्वा सुपर्णा सयुजा सखायः ।



(6.) माण्डूक्योपनिषद्
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यह लघु आकार का छोटा ग्रन्थ है, किन्तु महत्त्व इसका सबसे अधिक है । इसमें केवल 12 वाक्य या खण्ड हैं । इसमें ओंकार की विस्तृत व्याख्या की गई है । चैतन्य की चार अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और व्यवहार) का वर्णन किया गया है । इसी प्रकार  आत्मा को भी चार प्रकार का बताया गया है ---वैश्वानर, तैजस्, प्राज्ञ, प्रपञ्चोपशम । वेदान्त-दर्शन  का प्रासाद इसी उपनिषद् पर खडा है ।

(7.) तैत्तिरीयोपनिषद्--
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तैत्तिरीयारण्यक के अन्तिम तीन अध्याय (7,8 और 9) को ही तैत्तिरीय-उपनिषद् कहा जाता है ।

इस प्रकार इसमें तीन अध्याय है । इसमें अध्यायों को "वल्ली" कहा गया है । इसका प्रथम अध्याय शिक्षावल्ली, द्वितीय अध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली और तृतीय अध्याय भृगुवल्ली है ।

"शिक्षावल्ली" में वर्ण, स्वर, मात्रा और बल का विवेचन है । इसमें वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के प्रकार भी दिए गए हैं । आचार्य अपने शिष्य को कैसे अनुशासित करता है--बताया गया है ।

ब्रह्मावल्ली में ब्रह्मा के स्वरूप को बताया गया है । ब्रह्मा को आनन्द कहा गया है । समस्त सृष्टि ब्रह्मा से उत्पन्न हुई है । ब्रह्म की प्राप्ति से परमानन्द की प्राप्ति होती है । इसमें पाँच कोशों ( अन्न, प्राण, मन, विज्ञान तथा आनन्द) का भी वर्णन किया गया है ।

"भृगुवल्ली" में भृगु और वरुण का संवाद है । यहाँ भी ब्रह्म के स्वरूप को बताया गया है ।

(8.) ऐतरेयोपनिषद्---
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यह ऐतरेयारण्यक का एक अंश है । ऐतरेयारण्यक के द्वितीय अध्याय के चतुर्थ, पञ्चम और षष्ठ खण्ड ही "ऐतरेयोपनिषद्" है । इस प्रकार इसमें कुल अध्याय हैं ।

अध्याय एक में बताया गया है कि परमात्मा ईक्षण के सृष्टि हुई है । शरीर में सभी देवों का निवास है । शरीर में व्याप्त ब्रह्म के दर्शन से ही जीवात्मा का नाम "इन्द्र" पडा ।

द्वितीयाध्याय में पुनर्जन्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है । कर्मानुसार विभिन्न योनियों में जन्म का वर्णन है ।

तृतीयाध्याय में प्रज्ञान-ब्रह्म का वर्णन है । मनोविज्ञान की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण अध्याय है । मन ही ब्रह्म, इन्द्र और प्रजापति है ।

(9.) छान्दोग्योपनिषद्
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सामवेद के छान्दोग्य ब्राह्मण के अन्तिम आठ अध्यायों को "छान्दोग्योपनिषद्" कहा जाता है ।
इस प्रकार इसमें कुल आठ अध्याय हैं । यह सन्धिकालीन उपनिषद् है । इसका आकार बहुत बडा है ।

प्रथमाध्याय में ओम् (प्रणव, उद्गीथ) की उपासना, ऋक् और साम का युग्म, वाक्---मन और प्राण की उपासना, प्रणव और उद्गीथ की एकता, साम का आधार स्वर, प्राण--आदित्य और अन्न का मह्त्त्व बताया गया है ।

द्वितीयाध्याय में पञ्चविध साम की उपासना, सप्तविध साम, त्रयी विद्या, धर्म के तीन स्कन्ध और ओम् ही वेदत्रयी का सार है---बताया गया है ।

तृतीयाध्याय में सूर्योपासना, गायत्री का महत्त्व, प्राण ही वसु, रुद्र और आदित्य है , बताया गया है ।

चतुर्थाध्याय में रैक्व द्वारा अध्यात्म-शिक्षा,  सत्यकाम जाबाल की कथा और ब्रह्म के चार पाद का वर्णन ।

पञ्चमाध्याय में प्राण की श्रेष्ठता, प्रवाहण जैबलि के दार्शनिक सिद्धान्त, परलोक-विज्ञान, राजा अश्वपति द्वारा सृष्टि-उत्पत्ति विषय प्रश्न, आदि ।

षष्ठाध्याय में महर्षि आरुणि द्वा अपने पुत्र श्वेतकेतु को अद्वैतवाद का उपदेश दिया गया है ।

सप्तमाध्याय में ऋषि सनत्कुमार द्वारा नारद को उपदेश ।

अष्टमाध्याय में देवराज इन्द्र और असुरपति विरोचन को प्रजापति का उपदेश ।

(10.) बृहदारण्यकोपनिषद्
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शुक्लयजुर्वेद से सम्बद्ध शतपथ-ब्राह्मण के 14 वें काण्ड के अन्तिम छः अध्यायों को ही बृहदारण्यकोपनिषद् कहा जाता है । इसमें आरण्यक और उपनिषद् का सम्मिश्रण होने से यह नाम पडा है । इसे ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् तीनों कह सकते हैं ।  इसमें कुल छः अध्याय हैं । यह आकार में सबसे विशाल उपनिषद् है । यह अध्यात्म-शिक्षा से ओत-प्रोत है ।

इसके प्रथमाध्याय में यज्ञीय-अश्व के रूप में परम पुरुष का वर्णन, मृत्यु का विकराल रूप और प्राण की श्रेष्ठता का वर्णन है ।

द्वितीयाध्याय में गार्ग्य और काशीराज अजातशत्रु का संवाद , याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयी का संवाद है ।

तृतीयाध्याय में गार्गी और याज्ञवल्क्य का संवाद साथ में याज्ञवल्क्या द्वारा प्रतिपक्षियों को हराना ।

चतुर्थाध्याय में याज्ञवल्क्य द्वारा राजा जनक को ब्रह्मविद्या का उपदेश है ।

पञ्चमाध्याय में प्रजापति द्वारा देव, मनुष्य और असुरों को द, द, द का उपदेश, ब्रह्म के विभिन्न रूपों का वर्णन, प्राण ही वेदरूप है और गायत्री के विभिन्न रूपों का वर्णन है ।

षष्ठाध्याय में ऋषि प्रवाहण जैबलि और श्वेतकेतु का दार्शनिक संवाद, पञ्चाग्नि-मीमांसा और ऋषियों की वंश-परम्परा का वर्णन ।

आचार्य शंकर ने भी इन्हीं 10 उपनिषदों पर स्व-व्याख्या लिखी है ।

विषय-वस्तु
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वेद के चार भाग हैं - संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्।

(१) संहिता में वैदिक देवी देवताओं की स्तुति के मंत्र हैं;
(२) ब्राह्मण में वैदिक कर्मकाण्ड और यज्ञों का वर्णन है;
(३) आरण्यक में कर्मकाण्ड और यज्ञों की रूपक कथाएँ और तत् सम्बन्धी दार्शनिक व्याख्याएँ हैं; और
(४) उपनिषद् में वास्तविक वैदिक दर्शन का सार है।

उपनिषद् में आत्म और अनात्म तत्त्वों का निरूपण किया गया है जो वेद के मौलिक रहस्यों का प्रतिपादन करता है। प्राय: उपनिषद् वेद के अन्त में ही आते हैं। इसलिए ये वेदान्त के नाम से भी प्रख्यात हैं। वैदिक धर्म के मौलिक सिद्धान्तों को तीन प्रमुख ग्रन्थ प्रमाणित करते हैं जो प्रस्थानत्रयी के नाम से विख्यात हैं, ये हैं - उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता।

मुक्तिकोपनिषद् में एक सौ आठ (१०८) उपनिषदों का वर्णन आता है, इसके अतिरिक्त अडियार लाइब्रेरी मद्रास से प्रकाशित संग्रह में से १७९ उपनिषदों के प्रकाशन हो चुके है। गुजराती प्रिटिंग प्रेस बम्बई से मुदित उपनिषद्-वाक्य-महाकोष में २२३ उपनिषदों की नामावली दी गई है, इनमें उपनिषद (१) उपनिधि-त्स्तुति तथा (२) देव्युपनिषद नं-२ की चर्चा शिवरहस्य नामक ग्रंथ में है लेकिन ये दोनों उपलब्ध नहीं हैं तथा माण्डूक्यकारिका के चार प्रकरण चार जगह गिने गए है इस प्रकार अबतक ज्ञात उपनिषदो की संख्या २२० आती है ।

Monday, 17 April 2017

नज़र क्या? नज़रिया क्या?

       (औपनिषदैय चिन्तन)

👁नज़र क्या? नज़रिया क्या?💐

जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। शायद यह तुम जानते भी नहीं हो। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बों से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। उनकी आँखों को क्यों अपनी रुलाई से भरते हो। सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। अरे, भगवान को पुष्प चढ़ाओगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी। हमें देखना नहीं आता, देखो तो "सर्वं खल्विदं ब्रह्म"।
बड़ी अजीब बात है; कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और  रबड़ी पीने को मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के बारी आई तो रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी संवेदनाएँँ तो मर चुकी है। परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है। हर समय अनुकूलता नहीं मिलेगी। इसलिए, "जमाने वालों किताबे गम में कोई तराना ढूँढो।" गुलमोहर को देखो पतझड़ में भी रंगों से लकदक है।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजर खराब नहीं थी, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बेड-बाय प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे मुख्य फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न दीपक ढूँढ पाओगे न ही दियासलाई । अंधेरे में न खुद को खुद दिखोगे और न किसी अौर को। दीपक जलाओ; रोशनी देख कर अंधेरे में से निकल कुछ और लोग भी तुम्हारे संग होंगे। "तमसो मा ज्योतिर्गमय।"

पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।   चलोगे न ?
खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।।     चलोगे न ?
"मृत्योर्माऽमृतं गमय।"
पुरूषार्थ का प्रथम पदार्थ धर्म है, प्रेम का प्रथम सोपान समर्पण है और परम-प्रिय वह परमात्मा है। धर्म के पथ पर निकलो, परमात्मा के पावन चरणों में समर्पित हो जाओ। देखो वह तुम्हारा भजन कर रहा है।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४/११
योगेश्वर कृष्ण कह रहे हैं कि जो मनुष्य जिस तरह से मेरा अर्चन करते हैं, मुझसे प्रेम करते और आनंदित होते हैं, मैं भी उन्हें उसी तरह अपनाता हूँ, उनका स्मरण करता हूँ और आनंदित होता हूँ। उस की ओर जाने का मार्ग अमृतमयी है। अपनी दृष्टि को व्यष्टि से समष्टि की ओर मोड़नी होगी। वे दृष्य विहंगम हैं जो अन्तर्यात्रा में स्पष्ट दिखाई देंगे। वहाँ केवल आनन्द ही आनन्द है। वह यात्रा मुक्तिपथ है। इससे पहले कि कोई बाधा खड़ी हो जाए, चल पड़ो। तुम्हारा प्रथम डग मंजिल की कुल दूरी को एक कदम कम कर देगा।

चल पड़ो इस पार से, अब खुद को समेटो
उस पुरातन गीत में, अब नूतन स्वर जगाओ
खोल दो सब गाँठ मन की, प्रीत की मधुरिम कड़ी है
अंजुरी में पुष्प भर लें, अर्चना की शुभ घड़ी है।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

सुख, दुःख और आनन्द

सुख, दुःख और आनन्द
हमारा प्रत्येक का अपना अपना स्वभाव है, अपनी अपनी आदतें हैं और आपसी व्यवहार के अपने अपने तरीके हैं। यह जरूरी नहीं कि जो एक को अच्छा लगे वह अन्य को भी अच्छा लगे। किन्तु यह बात तो तय है कि व्यक्ति वही चाहता है जो उसको अच्छा लगे यह भी उतना ही सच है कि जरूरी नहीं; उसे वही मिलता रहेगा जो वह चाहता है। मोटे तौर से देखा जाए तो वह वही चाहता है जो उसके अनुकूल है। अच्छा वही लगता है जो अनुकूल है। इस अनुकूलता को आभास करने वाला अंतिम छोर है मन। एक प्रेमी अपने प्रिय की प्रतीक्षा में चिलचिलाती धूप में खड़ा है जो शरीर को कष्टप्रद हो सकता है पर मन को प्रतिकूल नहीं लगता। अर्थात् अनुकूलता और प्रतिकूलता का आभास मन करता है।
मन की अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकूलता ही दुःख है। इन दोनों के बीच तटस्थ खड़ा होना विराग है और बीच में खड़े हो कर  स्वात्मभाव को प्राप्त हो जाना ही आनन्द को प्राप्त हो जाना है।
हमें तीन प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। दुख की, सुख की और आनंद की। सुख की और दुख की अनुभूतियां बाहर से होती हैं। बाहर हम कुछ चाहते हैं, मिल जाए, सुख होता है। बाहर हम कुछ चाहते हैं, न मिल पाए, दुख होता है। बाहर प्रिय को निकट रखना चाहते हैं, सुख होता है; प्रिय से विछोह हो, दुख होता है। अप्रिय से मिलना हो जाए, दुख होता है; प्रिय से बिछुड़ना हो जाए, तो दुख होता है। बाहर जो जगत है उसके संबंध में हमें दो तरह की अनुभूतियां होती हैं–या तो दुख की, या सुख की।
आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती। आनंद को सुख समझना बहुत बड़ी भूल होगी। आनंद और सुख में जमीन आसमान का अंतर है। दुख और सुख दोनों का अभाव आनन्द है; जहां दुख और सुख दोनों नहीं हैं, वैसी चित्तकी परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद की स्थिति है।
आनंद की स्थिति में बाहर से कोई भी उद्वेलन भीतर प्रभावित नहीं करता–न दुख का और न सुख का।
सुख दुख दोनों संवेदनाएँ हैं। दोनों अशांतियाँ हैं। अशान्ति अर्थात् चित्त की विचलित अवस्था। दुख की अशांति अप्रीतिकर है, सुख की अशांति प्रीतिकर है। लेकिन दोनों उद्विग्नताएं हैं, दोनों चित्त की उद्विग्न, उत्तेजित अवस्थाएं हैं। सुख में भी आप उत्तेजित हो जाते हैं। अगर बहुत सुख हो जाए तो मृत्यु तक हो सकती है। अगर आकस्मिक सुख हो जाए तो मृत्यु हो सकती है, इतनी उत्तेजना सुख दे सकता है। दुख भी उत्तेजना है, सुख भी उत्तेजना है। अनुत्तेजना आनंद है। जहां कोई उत्तेजना नहीं, जहां चित्त पर बाहर का कोई प्रभाव नहीं वहाँ आनन्द है। अपने से बाहर संबंधित होना आनन्द की स्थिति निर्मित नहीं होने देगा।
एक सरोवर में लहरों के उठने का अर्थ है हवा के बाहरी थपेड़े बाहर से उसको प्रभावित कर रहे हैं। सरोवर बाहर की किसी चीज से प्रभावित न हो तो वह शांत होगा वैसे ही हमारा चित्त बाहर से प्रभावित होता है तो उत्तेजना की तरंगें उठती हैं सुख की, और दुख की। परन्तु जब हमारा चित्त बाहर से अप्रभावित होता है तब उस स्थिति का नाम आनंद है। आनंद बाहर का अनुभव न होकर अपना स्वयं का अनुभव है। सुख और दुख छीने जा सकते हैं, क्योंकि वे बाहर से प्रभावित हैं वहीं आनंद निःकारण है इसलिए आनंद को छीना नहीं जा सकता।  आनंद आपके अंतर में नित्य विद्यमान है। दुख भी बंधन है, सुख भी बंधन है, आनंद मुक्ति है।
तो आनंद मनुष्य का बाहर से सिमट कर अपने स्व में स्थित होना है। सुख-दुख मिलता है, आनंद मिलता नहीं है। आनंद मौजूद है, केवल जानना होता है। आनंद को पाना नहीं होता, वह केवल अनुसंधान से ज्ञात होता है। स्मरण रहे जो चीज पाई जा सकती है वह खो भी सकती है। आनंद खो नहीं सकता पर जाने बिना खोया हुआ समझते हो। एक दम स्पष्ट है कि आनंद की दो स्थितियां हैं – आनंद के प्रति अज्ञान और आनंद के प्रति ज्ञान। आनंद का ज्ञान न होना निरानंद की स्थिति नहीं हैं। जैसे कि जब हम सोते हैं तब हमें हमारे होने का ज्ञान नहीं होता है पर हम होते हैं और जागते ही होने का भान हो जाता है। यह अन्तर स्टेट ऑफ बीइंग का नहीं है, स्टेट ऑफ नोइंग का है। जो स्टेट आफ बीइंग में उलझा है वह बाहर उलझा है, उसको अपने भीतर जाने की उसे फुर्सत नहीं है। इसलिए आनन्द के लिए अन्तर्यात्रा करनी होगी।
स्मरणीय है कि न दुःख परमानेन्ट है न सुख।
दुख कोई नहीं चाहता है,  हर कोई सुख चाहता है। इस चाह के हटते ही आनन्द का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। कहना बहुत सरल है पर चाह को हटाना दुष्कर है। लेकिन इसका पुख्ता इलाज गीता में है। गीता में इसे समत्व योग कहा है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण-सुख-दुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६/७॥
जिस ने अपने को जीत लिया है और शांति पा ली है, वह परमात्मा मेँ समा गया है. वह सर्दी गरमी, सुख दुःख और मान अपमान आदि द्वंद्वोँ मेँ शांत रहता है।
जो सुख दुःख की चाह से मुक्त हुआ समझो मुक्त हो गया। जो मुक्त हो गया वह आनन्द को प्राप्त हो गया। जो भीतर से कनेक्टेड है जैसे सन्यासी के साथ सफिक्स रूप में आनन्द जुड़ा होता ही है। यह परम्परा से अधिक कॉन्सेप्ट है। 

Thursday, 15 December 2016

जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝

जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝

जामवन्त रामायण का ऐसा पात्र है जो दीर्घजीवी, बुद्धिमान और अत्यन्त शक्ति सम्पन्न है। समुद्रतट पर खड़े नर-वानरों में से कोई भी समुद्र पार नहीं जा पा रहा था तब उसने हनुमान जी की उस क्षमता को पहचाना जिस क्षमता का बोध स्वयं हनुमानजी को भी नहीं था। ऐसी शक्ति उनके भीतर सिन्नहित थी कि वे छलाँग लगा कर समुद्र पार कर सकते हैं। जामवन्त ने उन्हें इस कार्य के लिये तैयार कर दिया।
जैसे बिजली से चलने वाली मोटर के स्टार्टर स्विच को दबाने से मोटर अपनी क्षमता से चलने लग जाती है जबकि बिजली न तो स्टार्टर की अपनी है न ही मोटर की ताकत इस स्विच से आती है। स्विच का काम है बिजली को मोटर से मिलवा देना। इस स्टार्टर का स्टार्टिंग स्विच एक बार दब कर  छूट जाता है तब भी मोटर चलती रहती है। जामवन्त ने भी ऐसा ही किया, हनुमान जी से उनका परिचय उनके भीतर मौजूद शक्ति से करा दिया और फिर अलग हो गए। हनुमान जी को न तो कोई उपदेश दिया न कोई शिक्षा दीक्षा, किया तो बस केवल अन्तर्बोध कराने का उपक्रम ही।
इसी तरह हमारे भीतर मौजूद उस तुरीय अवस्था तक कोई और नहीं ले जा सकता, यहाँ तक कि गुरू भी नहीं। गुरू हमें मन के द्वार तक लाकर और युक्ति बता कर छोड़ देता है। इसके आगे की यात्रा हमें अकेले ही करना है। याने हमारे जीवन में मोटर के स्टार्टिंग स्विच की तरह कोई व्यक्ति चाहिए, एक जामवन्त चाहिए जो हमें अन्तर्बोध करा दे। हमारे भीतर केवल हम ही जा सकते हैं कोई और नहीं लेकिन हमें अपने भीतर कुछ है इसका ज्ञान स्वतः पैदा नहीं होता इसे जनाने कोई आता है तभी हम हमारी खोज यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं इसलिये निश्चित रूप से हमें अपने जीवन में जामवन्त चाहिए। यह व्यक्ति गुरू हो सकता है, आलोचक हो सकता है और शायद हमारा शत्रु भी हो सकता है, विषम परिस्थितियाँ भी उद्दीपक हो सकती हैं।
यदि देखा जाय तो जीवन में कुछ ही सेकण्ड के अन्तराल होते है जैसे स्टार्टर स्विच का काम क्षण भर का होता है। वे क्षण जीवन के टर्निंग पॉइन्ट होते हैं जो हममें अपनी सुप्त पड़ी अन्तर्धारा से अथवा बह रही असीम शक्तियों से साक्षात्कार करा दे। यहाँ से प्रारंभ होती है हमारी अन्तर्यात्रा।

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गया
यहाँ से तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
"अहं ब्रह्मास्मि"

पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई

शायद  मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों से जन्म जन्मान्तरों से

धर्म निरपेक्षता

धर्म निरपेक्षता की परिभाषा आये दिन  बदलती रहती है जो मात्र एक राजनैतिक स्टंट है। धर्म निरपेक्षता के पहले धर्म की पहचान की जानी चाहिए। धर्म केवल उपासना की, पूजा की, सोच की, विचारों की पद्धति पर ठहरा दिया गया है। विश्व को उस धर्म मार्ग की आवश्यकता है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को अमन चैन से रख सके। इन तीनाे की परवाह केवल वेदों ने की है। इनके सिद्धान्तो पर आधारित धर्म मार्ग केवल सनातन धर्म है। बरछी -भालों, एटम बॉम्ब की भाषा बोलने वाले धर्म का अर्थ ही नहीं जानते। वे समझाते हैं कि जो वे कह रहे है वही धर्म की लेटेस्ट लाल किताब है। धर्म के सिद्धातों में कट्टर पांथियों ने यू टर्न बना दिये हैं। विकृति लगभग सभी जगह आई है कहीं ९०प्रतिशत तो कहीं १० प्रतिशत।
इतना जरुर तय है कि ॐ शान्ति अथवा शान्ति शब्द किसी जगह सुनाई देता है तो वह केवल सत्य सनातन धर्म मार्ग लेकिन फ़िजा में इतना शोर घुला है कि 'शान्ति' शब्द सुनाई ही नहीं पड़ता। अब तो यह लगता है कि शान्ति शब्द का घोष भी इस शोर से भी ऊँची आवाज में ही कहना पड़ेगा।
श्री कृष्ण की उठी हुई ऊँगली गीता के उद्बोधन का माध्यम जरूर है परन्तु गीता नहीं सुनी तो वही उँगली सुदर्शन धारण कर सकती है।
एक भीषण सत्य है कि विश्व शान्ति के गीत गाने वाले शक्तिशाली राष्ट्र अमरीका ऐसी परमाणु अप्रसार सन्धि करता है कि उसके भण्डार में तो वह शक्ति भरी रहे पर आपकी खाली रहे।
अजीब बात है क्लास में शान्ति कायम करने के लिए मास्टर टेबल पर बेंत ठोंकता है और बच्चे चुप हो जाते हैं। लेकिन अब ऐसे मास्टर तैयार हो गए हैं कि सारी क्लास में से एक एक बच्चे को पीट-पीट कर दूसरे बच्चों को चुप रहने की सलाहियत दी जाती है।
धर्म की व्याख्या तो बदली नहीं जा सकती लेकिन अधर्म की व्याख्या करने का समय आगया है। धर्म की व्याख्या करने जाएँगे तो अपने लोग ही हमें कटघरे में खड़ा कर देंगे। अधर्म की व्याख्या एक दम सीधी सपाट है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को नुक्सान पहुंचाता है, उनके अस्तित्व के लिए खतरा है वह अधर्म ही है।
इन जीवन मूल्यों के प्रकाश में धर्म, अधर्म और धर्मनिरपेक्षता का भी पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि विधर्मी अपने हित साधन न कर सके।
सिर्फ सेवा के बल पर समाज और राष्द्र की चिन्ता और चिन्तन नहीं हो पाएगा। जमीनी क्रान्ति के पहले वैचारिक क्रान्ति की आवश्यकता है। क्रान्ति केवल "मारकाट" जैसे शब्दों का पर्याय नहीं है अपितु वह एक सुगठित क्रिया कलापों का ही संयोजन है जो किसी भी हालत में अपना मूल मकसद नहीं भूलता।

संकल्प में शिवत्व हो

संकल्प में शिवत्व हो
अगर आपके पास स्केल जैसा कोई साधन न हो तो सरल रेखा खींचना आसान नहीं है। वहीँ यदि पेचीदा (वक्र रेखा) खीचना हो तो वह सरल है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि आपके विचार कभी भी सरल रेखा में नहीं चलते। एक सिरे से सोचना शुरू करते हो तो थोड़ी ही देर में आप पाओगे कि आप विषय से हट कर कहीं ओर निकल गए हो। जैसे कि आपने सोचना है 'कल सुबह घूमने जाऊँगा।' तुरन्त कुछ और समानान्तर प्रवाह चलने लगेंगे; नींद खुलेगी कि नहीं? बरसात तो नहीं हो जाएगी? साथ जाने वाले मित्र आएँगे कि नहीं? आदि आदि।
सरल सी बात भी पेचीदा लगेगी। वस्तुतः सरल को सरल बनाए रखना भी कठिन है जिसका मूल कारण विचारों की पेचीदगी है। विचारों को शुद्ध करने का अर्थ है उनमें मिलावट को रोकना। आपके विशुद्ध उद्देश्यपूर्ण विचारों में भ्रम पैदा करने वाले विचारों का अपमिश्रण होना ही पेचीदगी है। विचारों आना और प्रवाहित होना मनुष्य का नैसर्गिक नियम है। विचार कहाँ से चलेंगे, किधर-किधर जाएंगे, मकाम पर पहुंचेंगे कि नहीं, इस पर आपका कोई नियंत्रण है कि नहीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जो सबको मालूम है।

इसका हल केवल और केवल आपके मन में है। वेद कहता है- तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु। अर्थात् मेरे मन में शुभ-संकल्प हों। जहाँ आपके संकल्प दृढ़ होंगे वहां विकल्प अपने आप क्षीण हो जाएंगे। मन में विकल्पों का होना आज के सन्दर्भों में नकारात्मक विचारों का आधिक्य होना है। स्पष्ट अर्थों में देखा जाए तो विचारों में भ्रम की उपस्थिति ही विकल्पों को जन्म देती है। विकल्प का आधार तर्कों की जमीन पर खड़ा होता है। तर्क बुद्धि का विषय है जो मन से परे है।
संकल्प में शिवत्व है तो डर कैसा? महात्मा गांधी ने संकल्प किया कि मेरा रास्ता अहिंसा और सत्य का होगा। यह संकल्प ही था कि रास्ता तो केवल यही होगा तभी तो विकल्पों का पर्यवसान हुआ होगा। भीतर से विचारों में महात्मा गांधी बन कर देखो, बड़ी कठिनाई में पड़ जाओगे। कई विकल्प तो ऐसे होंगे कि आपका शरीर और मन पक्षाघात के शिकार हो जाएँगे। इसलिए संकल्प शिव हों। विकल्प को रास्ते से हटा दो, जो कठिन लगता है वह भी सरल हो जावेगा।

युवा कौन -

युवा कौन -


थके तन और हारे मन से कोई युवा नहीं हो सकता, चाहे उसकी उम्र कुछ भी क्यों न हो?
दुनिया में जवान-बूढ़े और बूढ़े-जवान देखे जा सकते हैं।
जिसके मन में उत्साह हो, उमंग हो, जो जीवन में कोई लक्ष्य रखता हो बस वही युवा है।
वस्तुतःकुछ कर गुजरने के संकल्पित मन वाला व्यक्ति ही युवा है, जो वर्तमान को बेहतर बनाने के लिये सोचता और करता है वह युवा है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो ''युवा'' आयु की अवस्था नहीं मन की अवस्था है।

युवाओं का सर्वश्रेष्ठ गुण है की वह ऊर्जा से ओत-प्रोत रहता है, वह अपनी ऊर्जा को सुनियोजित करता है। वह विश्व में कुछ अनुठा करना चाहता है। वह भाग्य पर नहीं कर्म पर विश्वास रखता है, परिस्थितियों का दास नहीं उसका निर्माता है, नियंत्रण कर्ता और स्वामी है। मेरा देश विश्व का सर्वाधिक युवाओं से संपन्न है।

मूल स्वभाव

मूल स्वभाव
बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। आग का नैसार्गिक गुण है तपाना और जलाना। क्या केवल आग ही हमारे शरीर को जला सकती है ? ऐसा नही है। पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है।

यह अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है लोकन ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है, ऊर्जा का अशोषण अथवा ऊर्जा का निक्षेप। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी जब वापस अपने मूल स्वरूप में लौटता है तब संचित ऊर्जा बाहर निकल जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अपने भीतर अन्तर्निहित हो या फिर किसी अन्य स्रोत से मिले परन्तु ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता है। ऊर्जा किसी न किसी स्रोत से ही मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है।
स्थितिज और गत्यात्मक ऊर्जा 

"डर का डर"

"डर का डर"
तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्

"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है । जैसे नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि  बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का  अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है। इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत करो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"। भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।