Saturday, 29 October 2016

😋प्रसाद का माधुर्य

 😋प्रसाद का माधुर्य☺

मंदिर के भीतर लड्डू जाता है पर लौट कर प्रसाद आता है। कमाल लड्डू का नहीं, मंदिर का नहीं, मूरत का नहीं, पुजारी का नहीं, कमाल है आपकी श्रद्धा का, विश्वास का आस्था का, मान्यता का और प्रेम का।
श्रद्धा नहीं तो प्रेम नहीं, विश्वास नहीं तो प्रेम टिकता नहीं, आस्था नहीं तो प्रेमी बंधता नहीं और मान्यता नहीं तो लड्डू अंदर जाएगा और टूटा - फूटा लड्डू ही बाहर आवेगा। लड्डू बाहर आकर मीठा तो होगा लेकिन उसमे माधुर्य तभी होगा जब आप उस देवता और उसके देवत्व से प्रेम करोगे। मीठा जबान तक मिठास देगा परन्तु प्रेम आपके मन को मीठा कर देगा। क्या कभी यह महसूस किया कि  प्रसाद हाथ पर आता है और हृदय उस देवता के पास दौड़ जाता है। आप श्रद्धा और प्रेम से भर जाते हो। जिसने लडडू खाया उसने बस कवल लड्डू खाया लेकिन जिसने प्रसाद खाया उसने अपने मन को मीठी खुराक पहुँचा दी। यह जो मन तक पहुंची मिठास है यही "माधुर्य" है। आप कहीं भी खड़े हो मन का माधुर्य आपको अपने देवता के पास ले जाकर खड़ा कर देगा, देवता में प्रेम और बढ़ जावेगा। आपको पहले तो लगेगा कि आप देवता के पास पहुँच गये हो लेकिन फिर तुरन्त यह भी लगेगा कि प्रसाद में देवता का आशीष और स्नेह घुल कर आ गया है और इसके साथ ही वह आपके हृदय को गुदगुदा रहा है। आपका हृदयाकाश एक अप्रतिम आलोक से भर गया है। प्रसाद ने आपको आपके देवता से जोड़ दिया है। यह प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और आस्था के रॉ मटेरियल से बना सेतु है।
इसलिए.....
लडडू की मिठास में मत अटको हृदय को प्रसाद के माधुर्य से भर डालो।

गुरु अमृत की खान

☝गुरु अमृत की खान☝

मैने सुना है - गुरू गाय है। दुधारू गाय। गाय के स्तनों में भरा दूध तब तक बाहर नहीं आता है जब तक उसका बछड़ा दूध पीने नहीं आता।
यह कपाट उसकी स्नेह मयी ममता से ही खुलता है। खुला ही रहता है जब तक बछड़ा तृप्त नहीं हो जाता। माँ पिलाती रहती है बछड़ा पीता चला जाता है। किसी को दूध दिखाई नहीं देता है।
एक तरफ स्रोत है , ममत्व है, देने का ही भाव है। दूसरी दूसरी तरफ ललक है, प्यास है, अनुरक्ति है और ग्रहण करने की चाह है।
मैने तो यह भी सुना है कि अगर गाय का आँचल (मालवा में गाय के स्तनों को आँचल कहते हैं) दूध से भरा हो और बछड़ा उसे न पिए तो उसके आँचल में दर्द होने लगता है? कहना बड़ी बात नहीं होगी कि दुधारू गाय को भी बछड़े की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसके ऊपर यह भी सत्य है कि बछड़े को दूध उसकी माँ ही पिलाएगी। यह रिश्ता है ममत्व का, दाता का, करुणा का, प्यास का, प्रेम का।

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मैने यह भी सुना है कि गुरु बहती गंगा है। बीच में धार बहती है दोनों ओर रेत ही रेत है। सूखी रेत। किसी को प्यास लगी उसने १००-२०० मीटर दूर रेत में गड्ढा बनाया तो वह देखता है कि निर्मल, स्वच्छ नीर छन छन कर गड्ढे में तैयार है। गंगा को पता ही नहीं कौन आया और अपनी प्यास बुझा गया। लेकिन गंगा में जल है तो पोखर में पानी होगा, पोखर तब होगा जब कोई प्यासा होगा और पोखर तब होगा जब प्यास होगी, पोखर तब होगा जब प्यासा उसे खोदने का यत्न करेगा, और प्यास तब बुझेगी जब प्यासा जल पिएगा। "जल अजस्र होगा।" चाहे जितना पिए, पोखर भरता जाएगा। गंगा अपनी धारा ले कर कहीं बहती रहे। प्यासे के लिए वह रेत के भीतर से बह कर आवेगी। किसी को पता नहीं चलेगा गंगा वहाँ कैसे पहुँच गई। यहाँ रिश्ता है गंगा का और प्यासे का। प्यासे के विश्वास का कि पोखर में गंगा आवेगी, उसकी प्यास बुझाएगी। एक तृप्ति तक ले जाएगी।

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मैने यह भी सुना है कि गुरू सितार है। कोई दूसरा सितार कहीं पास में रखा है। दोनों सितारों के तारों में अनुदैर्य का साम्य हो गया। अनुदैर्य याने वे समान फ्रीक्वेन्सी पर ट्यून्ड हैं। पहला सितार बजना प्रारंभ करता है। उसमें से स्वर लहरियाँ निकलती हैं। यह नाद है। यहाँ सप्तक है। सुरम्य तरंगें वातावरण गूँजती है। तरंगें दूसरे सितार तक पहुंचती हैं तब वह दूसरा सितार अपने आप बज उठता है। उसे कोई नहीं बजा रहा पर  अनुगूँज से ही बज उठता है। पहले सितार को पता ही नहीं चला कि दूसरा सितार बज उठा है।
बस वह मुख्य सितार तो बज रहा है, बजता जा रहा है। उसमें नाद है। नाद तो असल में ब्रह्म है। इसलिये यह ब्रह्मनाद ही है। जो बजाए से बजे वह तरंग है लेकिन कबीर कह गया कि जो बिना बजाए बज गया वही अनहद है। यहाँ रिश्ता है सितारों का, उनकी ट्यूनिंग का, नाद का, अनुनाद का, हद से अनहद-नाद का।

🛂रिश्ता🛐
रिश्ता गाय-बछड़े का, रिश्ता गंगा से प्यासे का, रिश्ता सितार-दर-सितार का-- रिश्ता है सद्गुरू से शिष्य का।

"वैदिक मनोविज्ञान"

☺"वैदिक मनोविज्ञान"☺

यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१

भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

१.जाग्रत अवस्था में.....

घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी  रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।

हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
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"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
अगले अंक में.....

वैदिक मनोविज्ञान


🔥वैदिक मनोविज्ञान🔥

अंक २

"ज्योतिषां ज्योतिरेकम्"

बिजली के बल्ब में काँच है, फिलामेंट है। छत पर टँगा है। वह लगा इसलिए है कि जब भी हमें जरूरत हो तब बिजली की बटन दबाएं और हमें रोशनी मिल जाए। यह रोशनी मात्र बटन और बल्ब के कारण से नहीं है अपितु उसमें बहने वाली अद्दष्य विद्युत धारा से है। विद्युत धारा नहीं तो बल्ब में कोई चमक नहीं। इसकी रोशनी में हम वह देख पाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन कमरे में कुछ नहीं दिखने के कारण ये हैं :-

१, चीजें है ही नहीं
२, चीजें हैं देखने वाली आँखें नहीं है
३, चीजें भी हैं, आँखे भी हैं पर अंधेरा है।
४, चीजें हैं, आँखें है, वातावरण में उजेला भी है लेकिन आँखों में देख पाने की क्षमता नहीं है।

मतलब यह कि जिस कमरे में देखना है वहाँ चीजें हों, देखने वाली आँखें हों, प्रकाश हो और देखने वाली आँखों में देखने की क्षमता हो।
इस सबसे ऊपर एक और विचित्र बात वह है जिसे 'वैदिक मनोविज्ञान' ही समझा सकता है। वह यह कि सम्पूर्ण परिदृष्य में से सब कुछ मौजूद होने के बावजूद यदि चीजें दिखाई नहीं देती है तो उसका कारण है "मन"। हाँ,  केवल मन।

दो ढाई साल का बच्चा चलते-चलते जमीन पर गिर जाता है घुटनों से खून बहने लगता है। जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगता है। माँ जमीन ठोंक कर कहती है, देख! चींटी  मर गई। असल में तो वहाँ चींटी है ही नहीं, केवल मन की दिशा का परिवर्तन है। कभी चिड़िया दिखाने लगती है, कहती है, देख! चिड़िया उड़ गई। बालक का मन चींटी और चिड़िया में रम जाता है। रोना रुक जाता है, चाहे खून बहता रहे। मन घुटने से छूट कर चिड़िया और चींटी को देखने में टिक जाता है। त्वचा की संवेदना पीछे छूट जाती है क्योंकि मन अब कुछ और देख रहा है। मन उस संवेदना को प्रकाशित नहीं कर रहा।

संत सूरदास कहते हैं- "ऊधो मन न भए दस-बीस।" मन तो एक ही है, इधर लगा लो चाहे उधर और एक बार में एक तरफ ही जाता है।
यहाँ ठीक वैसा ही कुछ घट जाता है जैसे अन्धेरे में कुछ घट जाए और पता ही न चले। इससे यह भी स्पष्ट है कि मन के प्रकाश में ही समस्त जगत प्रकाशित होता है। मन के इस गुण के अभाव में समस्त जगत अप्रकाशित, अनजान और अज्ञान के अन्धकार से आवृत्त रह जावेगा। जिस प्रकार चीजें वहीं थीं, आँखें वही थी, आँखे सक्षम भी थी, देखने वाला व्यक्ति भी वही था पर मन ने नहीं देखा तो कुछ नहीं दिखा। मन ने संवेदना ग्रहण नहीं की लगा कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। मन ने देखा तो सब दिखा। आँखें मात्र इक्विपमेंट हैं, खिड़कियाँ हैं जहाँ से दृष्य भीतर प्रवेश कर रहे है।
आँखे ही नहीं समस्त इन्द्रियाँ भी मन के अनुशासन में हरकत करती हैं। जहाँ पर मन का प्रकाश होगा वही प्रकाशित होगा। मन के द्वारा सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषय के ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद जीभ नहीं अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को भाते हैं। मन उद्विग्न हो तो चंद्रकिरणें भी चुभन लगती हैं । विषयों की अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
"मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं।"
इसका अर्थ यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ ही कृत कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीवात्मा का दिव्य माध्यम है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो।

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)

इन्द्रिय रूपी अश्व उसी के अनुशासन में रहते हैं। उसी से उनके विषयों को जानने की क्षमता पाते है। इसलिए श्रुति ने मन को "इन्द्रियोँ की लगाम" कहा है। सामान्य अर्थों में मन ही इन्द्रियों और शरीर से सब कुछ करवाता है लेकिन स्पष्ट है लगाम कोई और धारण करता है वह है "जीवात्मा"। श्रुति मन को जड़ परिभाषित करती है। परन्तु बिना लगाम के रथ और घोड़े नहीं चल पाएंगे। इससे मन की महत्ता भी सिद्ध होती है। लेकिन यह भी स्वयंसिद्ध है कि ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ उस परमचेतना से ही अनुप्राणित हैं। "ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।"

एक ओंकार

एक ओंकार☝

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥

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एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं  "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं  हैरान था कि कर तो मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने अपना दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी लेकिन आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।

यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल मैं रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।

दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के मैं चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में मैं ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं अद्वैत हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।

जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
🍃        🌖🌒
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन  इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर देखें।

यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका "साक्षी", बना रहूँगा। यह काल का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है,आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।

मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..

।।हरिः ॐ तत्सत्।।

"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३

"वैदिक मनोविज्ञान"  अंक ३🤔

"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।" ।।यजुर्वेद ३४/१।।

अन्वयार्थ:-
यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु।

भावार्थ:-
जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी दूर दूर तक चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
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🌅"ज्योतिषां ज्योतिरेकं"🌇

ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ, ज्योतियाँ अर्थात् प्रकाशित दीपशिखाएँ, ज्योतियाँ अर्थात् वे शक्तियाँ जिनके आलोक में उपस्थितों का ज्ञान हो।

मिट्टी के दीपक के तीन अवयव हैं; मिट्टी का दीपक, बाती और तेल। इसमें प्रकाश उत्सर्जन की अपूर्व क्षमता है और अभी यह प्रकाश करेगा भी लेकिन बिचारा अकेला कुछ नहीं कर सकता। एक ज्योति आती है इसकी बाती में ज्योति जगाती है और अप्रकट रूप में यहीं मौजूद रहती है तो मिट्टी का अप्रकाशित दिया भी प्रकाश देने लगता है। इस बाती से इसकी आई हुई ज्योति यदि चली गई तो दिया फिर अक्षम हो जावेगा। स्पष्ट है; इसकी ज्योति भी अन्य ज्योति से ज्योतित है।
उक्त तीनों स्थितियों और अर्थों में वे ज्ञान की प्रकाशक ही हैं। ज्ञान उसका जो है। बोध उसका जो अप्रकट था। ज्ञान उसका जो हम जान पाएँ। प्रकट होने पर भी अगर बोध न हो पाए, प्रकट होने पर भी यदि प्रकाशित वस्तु का तात्पर्य ग्रहण न हो पाए या तो प्रकट अथवा अप्रकट में कोई अन्तर नहीं हो तो सभी व्यर्थ है।
अन्धेरे कमरे में यदि टेबल पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो तो दिखेगा कैसे। देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए। चलिये अब प्रकाश के लिए हमने दीप जला कर रख दिया। टेबल पर रखी कोई वस्तु दिखाई देने लगी। यदि यह ज्ञान नहीं हो कि यह वस्तु गुलदस्ता है तो प्रकाशित हो जाने पर भी उसका लाभ नहीं हानि ही है।
वस्तुतः चीजों का प्रकाश तो एक ज्योति ने कर दिया परन्तु अभी एक और ज्योति अर्थात् ज्ञान की आवश्यकता है जो उसके मूल स्वरूप का ज्ञान दे सके। वस्तु को गुलदस्ते के रूप में हमारे भीतर डिस्टिंग्विश कर सके। रस्सी को रस्सी और साँप को साँप समझा सके तथा इनमें से किसी की आपस की भ्रान्ति न आ सके अर्थात् हम रस्सी को साँप न समझ लें।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ज्योति जो बाहरी है वह अपूर्ण अथवा अपर्याप्त है जिससे वह पूर्ण ज्ञान करा सके। इसे एक परम ज्योति की आवश्यकता है, इसे एक "शाश्वत" ज्ञान की बेकिंग या सपोर्ट चाहिए।
यह ज्योति मन ही है। मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी तो है ही पर उनके विषयों को उनका ज्ञान कराने वाला भी केवल यही है। कान सूँघ नहीं सकता, आँख सुन नहीं सकती आदि आदि। आँख को उसके विषय "देखने" की समझ केवल मन से ही आई है। आँखें देखती रहे तो भी सब अनदेखा रह जाएगा यदि उसे मन ने नहीं देखा। सुना सब अनसुना रह जाएगा यदि मन ने नहीं सुना। इसकी क्वालिटी और तात्पर्य भी मन ही निकालता है; जैसे आम आदमी के पाँव को छूने और गुरू के पाँव को छूने का भेद भी मन ही जानता है। छूने का ज्ञान त्वचा से हुआ पर उसे मन ही समझ कर ग्रहण करता है। इस गुणात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
"वैदिक मनोविज्ञान" विश्व का सर्वश्रेष्ठ मनोविज्ञान है जो पाश्चात्य मनोविज्ञान से भिन्न है। उनका मनोविझान व्यवहार पर आधारित है जबकि "वैदिक मनोविज्ञान" आदमी के अन्तःकरण के संश्लेषण पर आधारित है।

श्रुति कहती है; "ज्योतिषां ज्योतिरेकं"।

"गहरे पानी पैठ

  🌊"गहरे पानी पैठ"🌞

पाँच लोग समुद्र किनारे पहली बार गए। सबने समुद्र को देखा, और जो जो जानना चाहा वह वह अपने स्तर पर जाना भी। लौट कर वे सब अपने गाँव चले आए। गाँव के मुखिया ने बारी बारी से एक के बाद एक व्यक्ति से पूछा कि हम लोगों ने समुद्र कभी नहीं देखा। आप लोगों ने समुद्र देखा है उसके बारे में बताओ।

☝पहला आदमी आया उसने कहा किनारे रेत में खड़ा होकर देखा समुद्र और कुछ नहीं केवल एक शोर है। वहाँ कुछ देर ठहरा और मैं भाग कर दूर चला आया। मैं डर गया कि अगर मैं वहाँ कुछ देर और ठहरता तो मेरे कान फट जाते। मैं तो कहता हूँ आप लोग वहाँ कभी मत जाना। पहला आदमी यह बता कर चला गया।

☝दूसरे से पूछा तो उसने कहा उठती-गिरती लहरों के अलावा समुद्र कुछ नहीं। एक लहर उठती है,  किनारे की और दौड़ती है और वहाँ आकर मर जाती है। फिर पीछे से दूसरी आती है वह भी वही करती है। अन्तहीन सिलसिला चलता है।  किनारे पर लहरों का शोर ही शोर है। मैं घबरा कर दूर चला आया। अब मैं वहाँ कभी नहीं जाऊँगा।

☝तीसरा आया उसने कहा जहाँ तक नजरें जाती है बस पानी ही पानी है यानी बहुत सारा इकट्ठा पानी ही समुद्र है। वहाँ लहरें हैं, लहरों का शोर है, दूर-दूर तक केवल पानी ही पानी है। लगता है इससे तो धरती अच्छी है जहाँ देखने को कुछ और भी है, लोग भी है। समुद्र तो एक निस्सीम निर्जन है। इसीलए मैं तो यही कहता हूँ कि समुद्र शोर भरा उजाड़ है जहाँ पाने को कुछ भी नहीं है।

☝चौथा कहने लगा मैने किनारे पर आई लहर के पानी को चख कर देखा तो मुझे लगा कि बहुत सारा खारा पानी ही समुद्र है। किनारे पर खड़ा मैं देख रहा हूँ। शोर मचाती हुई लहरें आती हैं और मुझे धरती की ओर ढकेलती है। मैं डरता हूँ कि मुझे लहरें बहा न ले जावें। मैं चिन्तित हूँ कि समुद्र में जाने के बाद मैं शायद वापस लौट नहीं पाऊँ और वहीं मैं समाधिस्थ हो जाऊँ। मुझे धरती ही अच्छी लगती है। डर के मारे में वहाँ से दूर भागा।

😔पाँचवें ने कहा मैने देखा कि किनारे पर एक पनडुब्बी खड़ी है। पनडुब्बी वाले से निवेदन किया कि वह मुझे समुद्र की सैर करा दे। उसने मुझे हौले से पनडुब्बी में बिठाया और लहरों को चीरता हुआ लहरों के शोर के उस पार ले चला।
(यह पनडुब्बी वाला ही मेरे उस गुरु की तरह ही है और वह भी सुषुप्ति तक पहुँचा कर अदृष्य सा हो गया)
मैंने भीतर जाकर देखा वह बड़ा ही विलक्षण था, अद्भुत और अपूर्व था। वहाँ एक गहन शान्ति थी। कई जीव मौजूद है जो इधर उधर घूम रहे हैं। उनके लिए कई प्रकार की वनस्पतियाँ है। जैसी नीरवता और शान्ति यहाँ है वैसी समुद्रके बाहर नहीं, धरती पर भी नहीं। यहाँ अगर कुछ चलता भी है तो सब मन्थर गति से है। विशाल आकाश है। धरती पर यह पूरा खुला नहीं दिखाई देता है, वहाँ कई बाधाएँ है। मैं जहाँ जहाँ देखता हूँ वहाँ वहाँ उस विराट की असीम सत्ता का स्पष्ट बोध होता है। थोड़ा आगे और चलता हूँ तो  लगता है यहाँ केवल मेरा मैं और मेरा परमात्मा ही है।

थोड़ी देर उस जगह और ठहरा तो लगा कि यहाँ केवल हूँ, मेरा वह "मैं" पीछे छूट गया और चूँकि मेरे अतिरिक्त शेष भी अशेष है इसलिए जो अशेष है वही "पूर्ण" है। वहाँ केवल यही प्रतीति शेष रही कि यही कैवल्य है।
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मैं जो यहाँ हूँ वही बाहर था। तत्व मैं ही तो हूँ। "तत्वमसि।"

🌍🌓🌊इस रूपक में धरती और वह ग्राम बाह्य जगत है। पाँच लोग वे विभिन्न प्रकार के लोग हैं जो समुद्र याने अन्तःकरण को अपनी अपनी वृतियों और दृष्टिकोण से आँकते हैं। कुछ लोग लहर और उसके शोर अर्थात् मन और विचारों के पार नहीं जा पाते हैं। हवा के थपेड़े न हो तो लहरें होगी ही नहीं इसीलिये अर्जुन कहते हैं कि मन "वायोरिव सुदुष्करं" है। कुछ लोग स्वाद अर्थात् इन्द्रियों के विषयों में उलझ कर जगत में अटके रह जाते हैं। किनारे पर ही खड़े रह जाते हैं।
समुद्र ही अन्तःकरण है।  जिसके सबसे ऊपरी तह मन है। उठने वाले विचार  तो लहरें ही हैं। धरती (जगत) "जाग्रत" अवस्था है। समुद्र के भीतर "स्वप्न" की भाँति ही जगत का प्रतिबिम्ब मौजूद है। वही भी अनुभूतियाँ हैं। आगे बढ़ने पर गहन शांति है। यही सुषुप्ति है जहाँ केवल साक्षी मौजूद है। साक्षी आत्मा ही है  इसलिए अब आगे की अवस्था तुरीय है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिश्यते।।

अहंकार और प्रेम

  😟अहंकार और प्रेम😟

        प्रेम का सर्वप्रथम आघात अहंकार पर ही होता है। यदि अहंकार नहीं टूटा तो प्रेम टूट जाएगा। दोनों में से एक का टूटना तय है। एक बात और है, दोनों टूटी फूटी अवस्था में भी एक साथ नहीं रह सकते। जब भी मौका मिलेगा दोनों में से कोई भी खड़ा हो जाएगा और खड़े होते ही एक अन्तर्द्वन्द्व शुरु हो जाएगा। इसलिए कोई यह न समझ ले कि जब मैं एक को बचा कर तिजोरी में रख लूँ और दूसरे से काम चलाऊँ और फिर दूसरे को रख कर पहले को काम ले लूँ। ऐसा किया तो धोखा खुद खाओगे। अंहकार अगर टूट कर खड़ा हुआ तो उसकी ताकत पहले से भी अधिक बढ़ जावेगी।
इसलिए सावधान! प्रेम करना चाहते हो तो अंहकार को छोड़ना ही होगा और हाँ, प्रेम यदि अहंकार पर चोट करता है तो उसका स्वागत करना होगा। एक बार प्रेम ने ठीक से जगह बना ली तो सब आसान होने लगेगा। प्रेम पसर गया तो अहंकार वहाँ से अपने आप विदा हो जाएगा। प्रेम का पहला लक्षण प्रकट होगा तब यह पाओगे कि हृदय के बीच की दूरियाँ कम होने लगी है।
बड़े मजे की बात है - एक व्यक्ति जिसे हम बिल्कुल नहीं जानते, जिसके बारे में हमको कुछ नहीं पता वह एकदम से अजनबी है; उसके सामने सहज रूप में ही हम अहंकार प्रदर्शित करने का नहीं सोचते। उसे सम्मान देते हैं और सम्मान देने का अर्थ यही है कि अभी हमारा अहंकार उसके समक्ष ठीक से जागा नहीं है। संभवत: हम उसे "आप" कह कर भी संबोधित कर रहे हैं। अभी वह हमसे न दूर है न पास है। जैसे जैसे आपस की जानकारियाँ बढ़ती है वैसे वैसे अहंकार धरातल पर उतरने लगता है। लेकिन प्रेम का अवतरण होगा तभी कुछ ठीक हो पाएगा।
जैसे दूध में नींबू की एक बूँद भी अगर गिर गई तो दूध का फटना तय है वैसे ही यदि प्रेम प्रसंग में अहंकार का लेश भी पड़ा तो प्रेम का मिटना तय है। अहंकार कभी हो कर नहीं करते बल्कि यह नैसर्गिक है जो कि एक वृत्ति की दशा में भीतर ही बैठा हुअा है। यह देश काल और परिस्थिति की अनुकूलता में प्रस्फुटित हो पड़ता है। प्रेम बढ़ने की गति बहुत मंथर होती है जबकि अहंकार मल्टीप्लाय बहुत जल्दी होता है।
एक किसान एक बंदर से बहुत परेशान था वह आकर उसके खेत की फसल रोज खराब कर देता था। रोज भगाता पर वह न भागता, लौट कर फिर आ जाता था। एक दिन उसको एक तरकीब सूझी। उसने बन्दर को पकड़ कर उसकी पूँछ में खाली टीन का डब्बा बाँध दिया। बंदर को बड़ा अजीब लगा। थोड़ी देर उसने कोई परवाह नहीं की पर जैसे ही दूसरी डाली पर छलांग लगाई, डिब्बा बजा। उसे लगा डिब्बे की आवाज और डिब्बा उसका पीछा कर रही है। इससे जान छुड़ाने के लिए वह जंगल की ओर भागा। फिर क्या था जैसे जेसे तेज भागता वैसे वैसे डिब्बा और अधिक जोर से बजता। बन्दर भागते जब दूर झाड़ी में पहुँचा तो डिब्बा वहाँ फँस गया तब तुरंत डिब्बा बजना बन्द हो गया। बन्दर समझ गया कि मेरे भागने के कारण ही यह पारिणाम हुआ है। अहंकार भी हमारे पल्लू से बँधा है। इसको लेकर भागे तो यह कम नहीं होगा। रोकना है तो ठहरो और उसका निषेध करो।
अहंकार और प्रेम हमारे हृदय के (एक) ही खेत में उगने वाली उपज हैं। "अहंकार खरपतवार है और प्रेम मुख्य खेती है। अगर प्रेम नहीं बोया तो अहंकार का खरपतवार बिना उगाए ही उग जायगा।"

अंधेरे का अध्यास

🤔अंधेरे का अध्यास🤔

अन्धकार को सब कोसते हैं, प्रकाश की कामना सब करते हैं। क्या अन्धकार इतना बुरा है, अवांछित है, अनपेक्षित है? अन्धकार कोई स्वीकार नहीं करता।
वेद कहता है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" अर्थात् अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ। स्पष्ट है; अन्धकार को पहले स्वीकारता है, उसकी उपस्थिति को पूर्व में मौजूद होना भी पूरी तरह मानता है तभी तो वह उससे प्रकाश की ओर जाने को कहता है। प्रकाश आता है तो अन्धकार उसे जगह देता है। अन्धकार आता नहीं है पर प्रकाश ने कुछ समय तक के लिए उसकी जगह ऑकूपाय कर ली है। इसलिए कहना चाहिए कि अन्धकार उतना ही महत्व पूर्ण है जितना कि प्रकाश है। इसके बावजूद भी हम अंधकार से डरते क्यों हैं?
चौबीसों घण्टे प्रकाश रहा तो सो कब पाओगे। सिर्फ दो दिन पूरी तरह जाग कर देखो विक्षिप्तता के निकट पहुंच जाओगे। प्रकाश जीवन चलाने के लिए जरूरी है तो अंधकार जीवन बचाने के लिए जरूरी है। हमने पहले अंधकार को नहीं समझा और सीधा प्रकाश को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। एक यथार्थ यह है कि हम प्रकाश में प्रकाश को नहीं आस पास मौजूद अन्य वस्तुओं को देखते हैं जबकि अंधेरे में हम केवल अन्धकार को ही देखते हैं इस तरह कि जैसे अंधकार दर्शनीय हो। अनुभव कर के देखो अंधकार में आप प्रज्ञाचक्षु हो जाते हो, आपकी इंद्रियोँ की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। आपके कान दिशाओं का बारीकी से जानने लगते हैं। यह आभास तो होता है कि अंधेरे में हम कुछ नहीं देख रहे हैं जबकि हमारी आँखें खुली रहती है अौर खुली आँखों से तो हम देखते ही हैं; अर्थात् हम अंधेरे को देखते ही हैं।
प्रकाश हमें वस्तुस्थिति का बोध भले ही करा दे पर जरूरी नहीं कि वह शान्ति उपलब्ध करा दे अलबत्ता अंधकार में आस पास का खालीपन हमें हल्का महसूस करा सकता है। अंतरिक्ष स्वयं अंधकार से परिपूर्ण है इसलिये वहाँ यात्री जब विचरण करता है तो गहन शान्ति के सागर में तैरता है। एस्ट्रॉनाट बताते हैं कि अंतरिक्ष के अन्धमहासागर में जो शान्ति उपलब्ध है उसकी कल्पना भी धरती पर किया जाना संभव नहीं। अगर वहाँ कुछ चमकता दीख पड़ता है तो वे हैं दूरस्थ आकाशीय पिंड। लगता है कोई टिमटिमाते दिये अनन्त और गहन काले सागर में तैर रहे हैं।
हमें समझाया गया है कि प्रकाश जीवन है और अन्धकार तो मृत्यु है। परन्तु यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई एक पहलू वाला सिक्का हमें बताना चाहता हो, जैसे व्यक्ति को केवल सुख, आनन्द और जीवन ही मिलेगा। जो केवल जीवन माँगना चाहता है वह मृत्यु से बहुत डरता है लेकिन जो मृत्यु से पूर्णतः परिचित है वह जीवन जीने का आनन्द प्राप्त कर लेता है। जो प्रेम को पाना चाहता है वह एक पीड़ा को निमन्त्रण दे रहा है। इसके बगैर उसे प्रेम मिलेगा भी नहीं। जो माँ धरती पर एक जीवन लाना चाहती है वह एक प्रसव पीड़ा को निमंत्रण दे रही है। इसके बिना उसका अवतरण नहीं हो पाएगा। बरसात चाहिए तो एक तपन से गुजरना होगा। बादल बिना बिजली की प्रताड़ना के बरस नहीं पाएँगे।इसलिए प्रकाश को पाना चाहते हो तो अन्धकार को पहले स्वीकार करना होगा, उसकी सत्ता के बोध में सदैव रहना होगा। वह अभिषाप नहीं है। वह यथार्थ भी है और प्रकाश से अभिन्न भी है। अज्ञान और अन्धकार दोनों अनादि हैं। ज्ञान और प्रकाश परवर्ती है। प्राणी मात्र जीवन को प्राप्त करने के पूर्व अर्थात् जन्म के पूर्व लम्बी अवधि तक अन्धकार के महासागर में तैरता रहा है। यह कदापि संभव नहीं है कि उसका अस्तित्व सीधा प्रकाश में प्रकट हो जावे। वस्तुत: अन्धकार को प्रकृति के उपादानों से पृथक् मत समझो।

मनोवृत्ति और चित्तवृत्ति

🤔मनोवृत्ति और चित्तवृत्ति 🤗

मन के सत्य को गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरितमानस में गाया है-
‘गो गोचर जहाँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥’
अर्थात् इन्द्रियाँ, इन्द्रियों की पहुँच और जहाँ- जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, तुम उस सब को माया जानना, मिथ्या समझना।
मन की परेशानी, मन से उलझन, मनोवेगों को सम्हाल पाना साधकों का सबसे जटिल लगता है। आइए इस उलझन को सुलझाने के लिए सबसे पहले यह जान लें कि आखिर मन अपने आप में है क्या? यह हमारे भीतर बैठा हुआ क्या कर रहा है? आमतौर पर सब यही सोचते रहते हैं कि मन सिर में पड़ी या रखी हुई कोई भौतिक चीज है लेकिन जिसने भी मन को अन्दर से पहचान लिया है, वह ऐसी बातें नहीं स्वीकारेगा। आज का विज्ञान भी ऐसी बातों को मानने से इन्कार करता है।
कोई चलता हुआ आदमी बैठ जाय, तो बैठने पर उसका चलना कहाँ भाग गया? चलना तो एक क्रिया है। इसलिए कोई किसी के बैठने पर यह नहीं पूछा करता कि तुमने अपना चलना कहाँ छुपा कर रख दिया? मैं चाहूँ, तो फिर से चल सकता हूँ, बार- बार चल सकता हूँ। चाहने पर चलना रोक भी सकता हूँ। बस, कुछ इसी तरह मन भी एक तरह का क्रियाकलाप चलता रहता है। मन या ‘माइण्ड’ शब्द से किसी तत्त्व या पदार्थ के होने का भ्रम नहीं होना चाहिए। हालाँकि  पाश्चात्य दर्शन के अनुसार "माइण्ड" सिर में स्थित है और हमारे दर्शन के अनुसार "मन" हमारे हृदयस्थल में स्थित है ऐसा माना जाता है। फिर भी व्याहारिक दृष्टि से देखें तो कार्य संपादन लगभग एक सा परिलक्षित होता है। इस मन की क्रियाशीलता थमे तो मन का अवसान हो और साधक "योगी" बने।
यदि मन की क्रियाशीलता के साथ अपनी आसक्ति समाप्त हो जाए, तो मन को ऊर्जा मिलना बन्द हो जाती है। अपने आप तो मन बस थोड़ी देर बहेगा। जब पिछला संवेग चुक जावेगा तब मन अपने आप ही रुक जाएगा। "मन" की वृत्तियों में सबसे प्रमुख है उसकी गतिशीलता। दुनिया में यदि कोई सबसे गतिमान है तो वह है मन। निमेष भर में वह धरती से चाँद, चाँद से सूरज अौर न जाने कहाँ कहाँ गति कर सकता है। मजे की बात यह है कि जबरजस्ती रोका गया तो मुश्किल से रुकेगा। इस कोाशिश में उसे और नए नए विषय मिलते चले जाते हैं, कड़ियों से कडियाँ जुड़ती चली जाती है फलतः मन की स्थिरता और समरसता समाप्त हो जाती है। लेकिन सतत अभ्यास से यह साध्य हो जाता है।

जीह देहरी द्वार

  💥जीह देहरी द्वार 💥

जब हम सोते है तो थोड़ा सा जागते हैं और जब जागते हैं तो थोड़ा सा सोते हैं। कहने सुनने में यह अजीब लगेगा पर ऐसा है। जब शरीर को जरा सी असुविधा होती है तो हम सोते सोते करवट ले लेते हैं, सर्दी लगने लगती है तो बिस्तर पर पड़ा कम्बल ओढ़ लेते हैं। जागते हैं तब पता चलता है कि हम जब सोए थे तब कंबल बिस्तर पर केवल फैला सा पड़ा था जाने कब और कैसे हमने उसे ओढ़ लिया। सोने लगे तब की शारीरिक स्थिति कुछ होती है जब उठते है तब कुछ और पाते है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर  भीड़ में सोते हुए आदमी को उसका साथी आवाज देता है तो वह सुन कर उठ बैठता है, उसे महसूस होता है कि मुझे ही पुकारा जा रहा है। ठीक इसी तरह ही आदमी जागते हुए भी सोता है। परिवार का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है उसे तुरन्त सहायता पहुँचाने की गरज से दोड़ते हुए आदमी को कोई परिचित जोर से भी पुकारे तो वह सुनता नहीं है। वह जाग कर भी सोए हुए आदमी सा व्यवहार करता है। वह सड़क पर शरीर से है पर मन से तो अस्पताल में ही है, ठीक उस तरह जैसे नींद में बिस्तर पर सोया आदमी भेड़ाघाट के झरने और उसके शोर को देख सुन रहा हो।
जागने और सोने का कोई एक सन्धि स्थल जरूर है जिसके इस पार जागना और उस पार सोना है। दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो जागना-सोना एक सापेक्ष स्थिति है या कहा जाना चाहिए कि जिस जगह है उसी जगह पर पूरी तरह मौजूद होना जागना है और उसी जगह न रहते हुए कहीं और विचरण करना सोना है। बहुत अच्छे से समझा जाए तो जागने-सोने की इस प्रक्रिया में मन ही जिम्मेदार है। जहाँ शरीर है वहीं मन है, वर्तमान है,  तो समझो जागे हुए हो और अलग अलग हो तो समझो "सोए हुए" से कुछ अलग नहीं हो। जब सो कर स्वप्न देख रहे हो तो आपका कोई बस नहीं पर बिना सोए मन भटका रहे हो तो जाग कर भी सोए ही हो, गफलत में हो। "संकल्पना" और "स्वप्न" को एक ही समझने की भूल मत कर बैठना। "संकल्पना" मानव और केवल मानव को ईश्वर प्रदत गुण है जो मनुष्येतर प्राणी में नहीं। यही तर्क अौर ज्ञान की उपलब्धि में सहायक होती है। लेकिन नियंत्रण के अभाव में ध्वंसात्मक हो सकती है। स्वप्न यथार्थ तो है पर सत्य नहीं है। जागते ही स्वप्न का यथार्थ घुटने टेक देता है। छोटे और तात्कालिक अर्थों में स्वप्न जल्दी ही "अनित्य" मालूम हो जाते हैं पर यह जगत पता नहीं चल पाता है कि यह भी एक बड़ा "अनित्य" है। वस्तुत: जाग्रत अवस्था और स्वप्नावस्था दोनों ही मन के परिक्षेत्र है। संसार मनोमय है। मन फैलता है तो जगत फैलता है, मन सिकुड़ता है तो जगत का प्रभाव भी सिकड़ता है। मन का बहुत सारा नियन्त्रण तो उसे वर्त्तमान में रखने से ही हो सकता है। दूसरी सीढ़ी है उसका परिक्षेत्र सीमित करने की। तीसरी सीढ़ी है इसे मौन करने की। मौन कर लिया तो हम सुषुप्ति के बिल्कुल निकट होंगे, ध्यान की उपलब्धि के निकट, धारणा के उस पार। यहाँ आनन्द का साम्राज्य है। दुःखों और सुखों से परे आनन्दानुभूति। जिस मन को लोग भला बुरा कहते रहते हैं वह न लगे तो अन्तर्यात्रा असम्भव है। यह अतःकरण का गेटकीपर है(जीह देहरी द्वार)। इस संधि पर दीप जला तो भीतर-बाहर का उजास होगा।
  "मन तू जोत सरूप है, अपना मूल पछाण।"

"इस मन के उजास में जागते रहाे- भीतर जागते रहो, बाहर जागते रहाे।" 

जीवन एक उत्सव है

😊जीवन एक उत्सव है😊

     जरा सोच कर देखें-- "हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है इसलिए मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है। मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण और भव्य होने चाहिए।"
यह विचार आते ही  आपके भीतर ही भीतर एक क्रान्ति का जन्म होगा, ऐसी क्रान्ति जो जीवन को सकारात्मकता से भर देगी। आपको लगेगा कि आप आज और अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और कोई अभी कोई आपको झकझोर कर खड़ा करके चला गया। आपको तुरन्त यह भी महसूस हो जाएगा कि अपने  आपको जगाने वाले आप स्वयं हैं। आपके सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा।
उपनिषद् इसको कहता है आप में "जिजीविषा" अर्थात् जीने की चाह हो। यही जिजीविषा मुर्दे में भी जान फूँक सकती है। शरशैया पर पड़े भीष्म जिजीविषा से ही अपनी मृत्यु पर नियंत्रण पा सके थे। हम कई बार देखते हैं कि डॉ जवाब दे देते हैं कि मरीज को अब उपचार के दम पर बचाया नहीं जा सकता लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से कई व्यक्ति पुनर्जीवित हो जाते हैं। सोचिये यदि जिजीविषा व्यक्ति को मृत्यु के मुख से लौटा सकती है तो जीवन के सामान्य दिनों में तो विलक्षण और अद्भुत कार्य की संभावनाओं को भला कौन रोक सकता है। यह विचारों की ही सामर्थ्य कि शिथिल पड़े शरीर और मन ऊर्जा से भर उठते हैं। यह ऊर्जा इम्पोर्टेड नहीं है, आपकी अपनी है, आवश्यकता है उसे पहचानने की, आवश्यकता है अपने भीतर भरे ऊर्जा भण्डार के दोहन की। सिर्फ प्रयोग करके देखिये, वह दिन है आज और वह समय है अभी। संकल्प करने वाले व्यक्ति हैं आप और संकल्प जहाँ ठहरेगा वह है आपका मन। कर्मक्षेत्र है जीवन और कर्मठता है आपकी भक्ति। कर्म में रुचि तभी होगी जब मन आशाओं और उमंगों से भरा होगा। उत्साह और उमंग है तो जीवन उत्सव है। हमें उत्सव चाहिए या मातमपुर्सी हमारी अपनी चॉइस है। दोनो सदैव उपलब्ध है। उत्सव चाहने से आवेगा। आपके कर्मक्षेत्र में आपने अपनी सफलता के बीज नहीं बोए तो उसमें निराशा और हताशा की उपज खुद उग जाएगी। आज की उपलब्धि वह पहली सीढ़ी है जहाँ से आगे आपके जीवन की अगली सीढ़ी जुड़ी हुई है। इसलिये आज को जीवन के उत्सव का प्रथम दिवस बनाइये। जीवन आनन्द और उत्साह से भर जाएगा।