Saturday, 29 October 2016

अहंकार और प्रेम

  😟अहंकार और प्रेम😟

        प्रेम का सर्वप्रथम आघात अहंकार पर ही होता है। यदि अहंकार नहीं टूटा तो प्रेम टूट जाएगा। दोनों में से एक का टूटना तय है। एक बात और है, दोनों टूटी फूटी अवस्था में भी एक साथ नहीं रह सकते। जब भी मौका मिलेगा दोनों में से कोई भी खड़ा हो जाएगा और खड़े होते ही एक अन्तर्द्वन्द्व शुरु हो जाएगा। इसलिए कोई यह न समझ ले कि जब मैं एक को बचा कर तिजोरी में रख लूँ और दूसरे से काम चलाऊँ और फिर दूसरे को रख कर पहले को काम ले लूँ। ऐसा किया तो धोखा खुद खाओगे। अंहकार अगर टूट कर खड़ा हुआ तो उसकी ताकत पहले से भी अधिक बढ़ जावेगी।
इसलिए सावधान! प्रेम करना चाहते हो तो अंहकार को छोड़ना ही होगा और हाँ, प्रेम यदि अहंकार पर चोट करता है तो उसका स्वागत करना होगा। एक बार प्रेम ने ठीक से जगह बना ली तो सब आसान होने लगेगा। प्रेम पसर गया तो अहंकार वहाँ से अपने आप विदा हो जाएगा। प्रेम का पहला लक्षण प्रकट होगा तब यह पाओगे कि हृदय के बीच की दूरियाँ कम होने लगी है।
बड़े मजे की बात है - एक व्यक्ति जिसे हम बिल्कुल नहीं जानते, जिसके बारे में हमको कुछ नहीं पता वह एकदम से अजनबी है; उसके सामने सहज रूप में ही हम अहंकार प्रदर्शित करने का नहीं सोचते। उसे सम्मान देते हैं और सम्मान देने का अर्थ यही है कि अभी हमारा अहंकार उसके समक्ष ठीक से जागा नहीं है। संभवत: हम उसे "आप" कह कर भी संबोधित कर रहे हैं। अभी वह हमसे न दूर है न पास है। जैसे जैसे आपस की जानकारियाँ बढ़ती है वैसे वैसे अहंकार धरातल पर उतरने लगता है। लेकिन प्रेम का अवतरण होगा तभी कुछ ठीक हो पाएगा।
जैसे दूध में नींबू की एक बूँद भी अगर गिर गई तो दूध का फटना तय है वैसे ही यदि प्रेम प्रसंग में अहंकार का लेश भी पड़ा तो प्रेम का मिटना तय है। अहंकार कभी हो कर नहीं करते बल्कि यह नैसर्गिक है जो कि एक वृत्ति की दशा में भीतर ही बैठा हुअा है। यह देश काल और परिस्थिति की अनुकूलता में प्रस्फुटित हो पड़ता है। प्रेम बढ़ने की गति बहुत मंथर होती है जबकि अहंकार मल्टीप्लाय बहुत जल्दी होता है।
एक किसान एक बंदर से बहुत परेशान था वह आकर उसके खेत की फसल रोज खराब कर देता था। रोज भगाता पर वह न भागता, लौट कर फिर आ जाता था। एक दिन उसको एक तरकीब सूझी। उसने बन्दर को पकड़ कर उसकी पूँछ में खाली टीन का डब्बा बाँध दिया। बंदर को बड़ा अजीब लगा। थोड़ी देर उसने कोई परवाह नहीं की पर जैसे ही दूसरी डाली पर छलांग लगाई, डिब्बा बजा। उसे लगा डिब्बे की आवाज और डिब्बा उसका पीछा कर रही है। इससे जान छुड़ाने के लिए वह जंगल की ओर भागा। फिर क्या था जैसे जेसे तेज भागता वैसे वैसे डिब्बा और अधिक जोर से बजता। बन्दर भागते जब दूर झाड़ी में पहुँचा तो डिब्बा वहाँ फँस गया तब तुरंत डिब्बा बजना बन्द हो गया। बन्दर समझ गया कि मेरे भागने के कारण ही यह पारिणाम हुआ है। अहंकार भी हमारे पल्लू से बँधा है। इसको लेकर भागे तो यह कम नहीं होगा। रोकना है तो ठहरो और उसका निषेध करो।
अहंकार और प्रेम हमारे हृदय के (एक) ही खेत में उगने वाली उपज हैं। "अहंकार खरपतवार है और प्रेम मुख्य खेती है। अगर प्रेम नहीं बोया तो अहंकार का खरपतवार बिना उगाए ही उग जायगा।"

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