☺"वैदिक मनोविज्ञान"☺
यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१
भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।
१.जाग्रत अवस्था में.....
घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।
हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
*************
"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
अगले अंक में.....
यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१
भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।
१.जाग्रत अवस्था में.....
घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।
हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
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"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
अगले अंक में.....
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