🤔मनोवृत्ति और चित्तवृत्ति 🤗
मन के सत्य को गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरितमानस में गाया है-
‘गो गोचर जहाँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥’
अर्थात् इन्द्रियाँ, इन्द्रियों की पहुँच और जहाँ- जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, तुम उस सब को माया जानना, मिथ्या समझना।
मन की परेशानी, मन से उलझन, मनोवेगों को सम्हाल पाना साधकों का सबसे जटिल लगता है। आइए इस उलझन को सुलझाने के लिए सबसे पहले यह जान लें कि आखिर मन अपने आप में है क्या? यह हमारे भीतर बैठा हुआ क्या कर रहा है? आमतौर पर सब यही सोचते रहते हैं कि मन सिर में पड़ी या रखी हुई कोई भौतिक चीज है लेकिन जिसने भी मन को अन्दर से पहचान लिया है, वह ऐसी बातें नहीं स्वीकारेगा। आज का विज्ञान भी ऐसी बातों को मानने से इन्कार करता है।
कोई चलता हुआ आदमी बैठ जाय, तो बैठने पर उसका चलना कहाँ भाग गया? चलना तो एक क्रिया है। इसलिए कोई किसी के बैठने पर यह नहीं पूछा करता कि तुमने अपना चलना कहाँ छुपा कर रख दिया? मैं चाहूँ, तो फिर से चल सकता हूँ, बार- बार चल सकता हूँ। चाहने पर चलना रोक भी सकता हूँ। बस, कुछ इसी तरह मन भी एक तरह का क्रियाकलाप चलता रहता है। मन या ‘माइण्ड’ शब्द से किसी तत्त्व या पदार्थ के होने का भ्रम नहीं होना चाहिए। हालाँकि पाश्चात्य दर्शन के अनुसार "माइण्ड" सिर में स्थित है और हमारे दर्शन के अनुसार "मन" हमारे हृदयस्थल में स्थित है ऐसा माना जाता है। फिर भी व्याहारिक दृष्टि से देखें तो कार्य संपादन लगभग एक सा परिलक्षित होता है। इस मन की क्रियाशीलता थमे तो मन का अवसान हो और साधक "योगी" बने।
यदि मन की क्रियाशीलता के साथ अपनी आसक्ति समाप्त हो जाए, तो मन को ऊर्जा मिलना बन्द हो जाती है। अपने आप तो मन बस थोड़ी देर बहेगा। जब पिछला संवेग चुक जावेगा तब मन अपने आप ही रुक जाएगा। "मन" की वृत्तियों में सबसे प्रमुख है उसकी गतिशीलता। दुनिया में यदि कोई सबसे गतिमान है तो वह है मन। निमेष भर में वह धरती से चाँद, चाँद से सूरज अौर न जाने कहाँ कहाँ गति कर सकता है। मजे की बात यह है कि जबरजस्ती रोका गया तो मुश्किल से रुकेगा। इस कोाशिश में उसे और नए नए विषय मिलते चले जाते हैं, कड़ियों से कडियाँ जुड़ती चली जाती है फलतः मन की स्थिरता और समरसता समाप्त हो जाती है। लेकिन सतत अभ्यास से यह साध्य हो जाता है।
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