Saturday, 24 September 2016

तू सबका ही शिल्पकार है

अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिम-आच्छदित शैल-शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर l
        इन सबका तू शिल्पकार है l 
       तेरी महिमा अमित अपार है l l

हहर-हहर कर झरते निर्झर
कल-कल बहती सरिता अविरल
हरित-वसन धरि वसुधा सुन्दर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

बिंदु, बिंदु से सिन्धु बनाता
कुंद-इंदु से रस सरसाता
पुष्प-पुष्प में गंध समाता
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

अग-जग, अचर-जीव सृष्टि में
रवि-शशि आतप और वृष्टि में
अविरल है क्रम सृजन-क्षरण का
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l

विश्व सकल तेरा है मंदिर
कण-कण तेरा विलास है
सत्य सनातन मेरे प्रभुवर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l
              रामनारायण सोनी 

Thursday, 22 September 2016

मंत्र-शब्द-मन

♻मंत्र-शब्द-मन ♻

निवेदन....

मंत्र में अचित्य शक्ति होती है। हमारा सारा जगत् शब्दमय है। शब्द को ब्रह्म माना गया है।

मन के तीन कार्य हैं-
~स्मृति, कल्पना एवं चिन्तन~
मन प्रतीत की स्मृति करता है, भविष्य की कल्पना करता है और वर्तमान का चिन्तन करता है।
       ...किन्तु शब्द के बिना न स्मृति होती हैं, न कल्पना होती है और न चिन्तन होता है। सारी स्मृतियां, सारी कल्पनाएं और सारे चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
हम किसी की स्मृति करते हैं तब तत्काल शब्द की एक आकृति बन जाती है। जैसे भगवान श्रीराम के श्रीविग्रह की स्मृति को स्थायित्व शब्दों से पुनः सजीव हो जाती है।
उस आकृति के आधार पर हम स्मृत वस्तु को जान लेते हैं। इसी तरह कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का बिम्ब ही सहायक होता है।
यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो मन चंचल हो नहीं सकता। मन शब्द का आधार ले कर टिक सकता है। नाम जप इसका प्रमाण है।
मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है।
सोचने का अर्थ है-भीतर बोलना। सोचना और बोलना दो नहीं है। सोचने के समय में भी हम बोलते हैं और बोलने के समय में भी हम सोचते हैं।
यदि हम साधना के द्वारा निर्विकल्प या निर्विचार अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें शब्द को समझकर उसके चक्रव्यूह को तोड़ना होगा।
यह सारा जगत तरंगों से आंदोलित हैं। विचारों की तरंगे, कर्म की तरंगे, भाषा और शब्द की तरंगे पूरे आकाश में व्याप्त है, सर्वत्र। शक्तिशाली शब्दों का समुच्चय ही मंत्र है। शब्द में असीम शक्ति होती है जो मंत्र बन कर विस्तार पाती है।

योग से तन-मन का स्वास्थ्य

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अपने जीवन में सौंदर्य

अपने जीवन में सौंदर्य देखना चाहते हो तो आओ जरा मेरे साथ चल कर देखो।

हम में से हर एक के जीवन में यादों का विशाल भंडार भरा पड़ा है।
कुछ मधुर तो कुछ कड़वे,
कुछ आनन्द पूर्ण कुछ पीड़ा दायक,
कुछ अवसाद भरे तो कुछ प्रेरणास्पद।

कुछ ऐसे पल भी हैं कि जिनके कारण हमारा जीवन सँवर गया,  वहीँ कुछ ऐसे पल भी थे कि जो हाथ से फिसल गए और जिनके कारण सुनहरे अवसर का लाभ नहीं ले पाए।

अपनी याददाश्त को टटोल कर जैसा आप देखना चाहते हो वैसे-वैसे चुन कर देख लो, जो जो देखोगे उस-उस के अनुरूप अभी अनुभतियाँ सजग हो जाएगी। चुनाव आपका ही है कि आप इनमें से क्या पसंद करते हैं।

 बेहतर ता यही होगा कि आप सुखानुभूति वाले पल चुनें। वे आपको गुदगुदाऐगे। आप और भी आनन्दित महसूस करेंगे। 

शब्द और मन

शब्द और मन

हमारा सारा जगत् शब्दमय है। शब्द अक्षर से निर्मित है। अक्षर  ही ब्रह्म है।

😌मन के तीन कार्य हैं-
स्मृति😴 कल्पना 😔एवं चिन्तन🤔।

☝मन उसकी स्मृति करता है जो घटित हो चुका  है,  भविष्य की कल्पना करता है जो अभी आया ही नही है, और वर्तमान का चिन्तन करता है।
शब्द के बिना स्मृति ही नहीं होती हैं, 'बादल' शब्द स्मृति में होगा तभी आकाश में कभी देखे गए बादल  स्मृति में आएँगे। बादल शब्द कहते ही किसी को वास्तविक बादलों की स्मृति होगी। उसी प्रकार शब्द के बिना न कल्पना होती है और न  ही चिन्तन होता है। शब्द एक तरह से अलग-अलग चीजों के कोड है इसलिये सारी कल्पनाएं और सारा चिन्तन शब्द के माध्यम से ही चलता हैं। कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का  ही आश्रय होता है।
यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो जगत में किसी की कोई पहचान नहीं रह जाएगी।

सहज योगी अच्छे से जानते हैं कि
मन की चंचलता वास्तव में ध्वनि की, शब्द की या भाषा की चंचलता है। मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है।
सोचने का अर्थ है-भीतर बोलना। सोचना और बोलना दो नहीं है। सोचने के समय में भी हम बोलते हैं और बोलने के समय में भी हम सोचते हैं।
यदि हम साधना के द्वारा निर्विकल्प या निर्विचार अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें शब्द को समझकर उसके चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। उससे बाहर आना होगा। यह सारा जगत सब और तरंगों से भरा पड़ा है। विचारों की तरंगे, कर्म की तरंगे, शब्द की तरंगें। शब्द में असीम शक्ति होती है। साधना से शब्द स्वयं ही नेपथ्य मे चले जाते हैं और सहज योग मे तो एक दम सरलता से संभव हो जाता है। निर्विकार होना निर्विचार होने की पहली सीढी है। यह सीढी पार करते ही शब्द स्मृतियों को अपने आप शिथिल कर देता है। इसलिये शब्द  की साधना ब्रह्म की उपासना  है। शायद इसीलिये सहज होना ब्रह्म के सरलता से निकट जाना है।

मन की वृत्तियाँ

मन की वृत्तियाँ

मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ सदैव काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किसे रोका जाय, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। यदि सही दिशा में जा रहा है तो उसे प्रोत्साहन दिया जाय और यदि दिशा गलत है, तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाना चाहिए। यही हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाना ही जरूरी है।

शुभ संकल्प वाला मन आशावादी, दूरदर्शी और पुरुषार्थी होता है। वहीं सदा निराश रहने वाला मन कठिनाइयों की बात सोच-सोचकर खिन्न रहने वाला रहता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में असमर्थता महसूस करता है। ऐसा नहीं है कि मन बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर यह संभव है। इसका सुधार जाना ही जीवन का वास्तविक सुधार है।
जिनने अपने भीतर आशा और उत्साह का वातावरण बना लिया है उज्ज्वल भविष्य का उदीयमान सूर्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।असफलताएँ, बाधाएँ और कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और आगे बढऩे की चेतावनी देने आती हैं वे हमारी शत्रु नहीं हैं।
शुभ संकल्प युक्त मन वाले व्यक्ति छोटी-छोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं, क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र साबित होते हैं।

मनुष्य की शक्तियाँ महान हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती है। बार-बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन हो पाता है। जिस व्यक्ति ने स्वयं को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है, उनकी जीवन साधना सफल हुई है।

क्या बॉटना चाहते हो?

क्या बॉटना चाहते हो?

 जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बो से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। भगवान को पुष्प चढ़ाओगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी। कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और  रबड़ी पीने को मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के वक्त रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी संवेदनाएँँ मर चुकी है। परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजरिया खराब नहीं था, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बाय प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न तो दीपक और न दियासलाई ढूँढ पाओगे। पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।

बड़ी समस्या, छोटे-छोटे हल

बड़ी समस्या, छोटे-छोटे हल

घर का दरवाजा घर से छोटा, दरवाजे पर लगने वाला ताला दरवाजे से छोटा और इस ताले से भी छोटी होती है इसकी कुंजी। कहाँ विशाल घर और कहाँ छोटी सी कुंजी। घर की सुरक्षा की पहली और अंतिम जिम्मेदारी कुंजी की ही है। कुंजी पूरा घर खोल सकती है। कुंजी न हो तो घर कैसे बन्द हो और कैसे खुले। एक बात और है कि घर पर ताला लागा हो और कुंजी न हो तो अपना मकान भी अपने काम का नहीं।
कुंजी की खास बात यह है कि वह एक बारीक से छिद्र से ताले के भीतर प्रवेश करती है और वहीं अपना काम करती है, वहाँ जाकर ताले के भीतरी भाग में संपूर्ण चक्कर लगाती है। उसे इस प्रकार बनाया गया है कि ताले के भीतरी पुर्जों में सधी हुई मात्रा में काम करती है।
देखो!  जितना ख्याल मकान का रहे उतना ही कुंजी का भी रहे।
जिस तरह मकान को खोलने के लिए छोटी सी कुंजी कमाल का काम करती है उसी तरह बड़ी बड़ी समस्याओं का हल छोटी छोटी बातों से, छोटे छोटे सुविचारों से संभव है। वे हमारे भीतर जा कर कुंजी की तरह काम करते है। इस प्रकार आवश्यकता है सम्यक सोच की,आवश्यकता है सम्यक दृष्टि की, सम्यक प्रकार से समस्या के समाधान में विचारों का उपयोग करने की।

परम चेतना

"परम चेतना"
एक आदमी हरि प्रसाद चौरसिया के घर इस नीयत से चोरी करने घुस गया कि इनकी बॉंसुरी से मधुर संगीत झरता है। वहॉ से उसने चार-पाँच बँसुरियाँ चुरा ली और एक संगीत संध्या में बजाने पहुँच गया। उस बिचारे को पता नहीं था कि वाँसुरी में स्वर उस बाँस से नहीं अपितु वादक के हृदय से प्रारंभ हो कर बॉंसुरी के छिद्रों से बाहर निकलते हैं। वस्तुतः बाँसुरी उन स्वरों की अभिव्यक्ति का साधन है जो हृदय की भूमि पर लहलहा रहे हैं। वेद कहता है --
"ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्टितम्...।"
हे दयामय ! मुझे वरदान दो कि वाणी मेरे मन में प्रक्तिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। साधक को पहले वाणी को हृदय में प्रतिष्ठित करना होगा, फिर मन और वाणी का तादात्म्य पाना होगा और तब लय प्राप्त होगी। लय तो योग है ही। जो हृदय मे बैठ जाएगी वही बाहर आवेगी। वाणी तो स्पन्दन है, स्पन्दन ही सुर है, सुर ही हवा पर सवार होते है। यह जगत वाणी के विस्तार का स्थान है।
एक बात और इसके भी ऊपर है वह यह कि इसके मूल कारण में परम चैतन्य है। बिना चेतना का हरिप्रसाद चौरसिया कोई बाँसुरी नहीं बजा सकेगा।
मेरे जीवन की बॉसुरी भी आत्मा की चेतना ही से बज रही है। जितनी भी बाँसुरियाँ है सब की सब उसी चेतना ही से तो बज रही है। बाँसुरी का प्राण रंध्र चेतना की फूँक पाता है फिर वह सात निर्गम द्वारो से जगत में प्रवेश करती है। जो स्वर जगत सुनता है उसका मूल कारण तो चेतना की फूँक ही है। हमें लगता है इसे चौरसिया जी ही बजा रहे है। असल में तो ...."निमित्त मात्रं शरीराणि।"

लघु चिन्तन

आज का लघु चिन्तन
धरती पर ये प्राणी  हमें कुछ सिखाते हैं:---

१, हमारी सुबह और शाम कैसी हो, बरगद के झुरमुट में चहचहाते पंछियों से सीखें।
२, उल्लू को हम चाहे जितना कोसें, वह अन्धकार में भी जीवन ढूँढ लेता है।
३, चमगादड़ भले ही उल्टी लटकती रहती है पर वह कमाल का राडार है।
४, कोई सामूहिकता, चक्रव्यूहात्मक आक्रमण और सशक्त टीम वर्क सीखना चाहे तो जंगली कुत्तों से सीखे।
५, गाय की जुगाली से एकाग्रता और चिन्तन
सीखें।
६, मोर और लार्क से आनन्द को उत्सव बनाना सीखें।
७, शेर से ''स्वयमेव  मृगेन्द्रता'' सीखें।
८, कोयल सा वाणी का माधुर्य और भला कहाँ।
९, बकरी से सीखें काँटों के बीच से भी अपना भोजन चुन लेना।
१०, मधुमक्खी से सीखें कड़वे-मीठे फूलों से मधुर-मधु बनाना।
११, गिद्ध से सीखें दूरदृष्टि और पैनी दृष्टि रखना।
१२, चकोर से सीखें लक्ष्य साधना और धारणा में स्थित होना।
१३, कंगारू से सीखें अपनी सन्तान को संग और सुरक्षित रखना।
१४, तोते से सीखें शुभवाक्यों को कंठस्थ करना

आदमी समय को रोकने के लिये घण्टाघर की सुई पर लटक भी जाए तो न तो वक्त रुकेगा न वक्त की बरबादी।

डर का डर

"डर का डर"

"तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्।
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्।।"

"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है। डर हर प्राणी का नैसर्गिक स्वभाव है।
नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि  बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का  अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो छुपने की कहीं जगह न हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है।
इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत घोलो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"।
भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम  रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं।
वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।

स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो पाती  हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है।
स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में  दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ?  वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा।

या मौला खर्च बढ़ा


मेरे जीवन की एक छोटी सी घटना

मैं चश्मे के काँच लगने की प्रतीक्षा में बैठा था, कटारिया औप्टीशियन के ८० वर्षीय मालिक से मैने पूछा एक वाक्य में अपने जीवन का अनुभूत आदर्श सन्देश बताइये।

वे तपाक से बोले-
मैं सुबह उठते ही बोलता हूँ ---

🙏या मौला! खर्च बढ़ा...

🤔🤔🤔
मैं आश्चर्य में उनकी ओर देखने लगा। इस पर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हर व्यक्ति की ऐसी ही प्रतिक्रिया उन्हे देखने को मिलती थी।
....
.....




उन्होंने पूछा -  कारण जानना नहीं चाहोगे?

मैने हाँ इसलिये नहीं कहा कि मैं तो खर्च कम करना चाहता हूँ,
और
ना इसलिये नहीं बोला कि शायद इसके पीछे अदृष्य जरूर कुछ होगा ही।

परन्तु

उन्होने कहा.....
....
.....
......

मैं उस खर्च को बढ़ाने की कह रहा हूँ  जिससे मैं
.......अपने परिवार के हर बड़े छोटे सदस्य का परिपालन कर सकूँ....
मेहमान की अच्छी आवभगत कर सकूँ....
असहाय की मदद कर सकूँ......
जितना बन पड़े सत्कार्यों में दान कर सकूँ....

और चूँकि.....

""अब खर्च मैंने मौला से माँगा है तो कहाँ से आएगा, इसकी फिक्र मौला ही करेंगे।""

मेरा चश्मा तैयार हो गया। मालिक मुस्कुराते हुए दुकान से निकला और स्कूटर पर बैठ कर लन्च पर चला गया।

मैं अवाक् रह गया कि---

उनमें कर्म की प्रतिष्ठा, अपनी जिम्मेदारी, परमार्थ का संकल्प और ईश्वर पर अटल विश्वास का अद्भुत समन्वय था।

सौन्दर्य जीवन का

उपासना, स्वप्न और बीज एक जैसे है। सामान्यतया तो ऐसा लगता है कि इनमें कुछ नहीं है लेकिन इनमे सब कुछ करने की क्षमता है।

उपासना, सपने और बीज। इन तीनों में एक विचित्र सा साम्य है। प्रत्यक्ष रूप में तो ऐसा लगता है कि ये तीनों ही अपने आप में कुछ नहीं लेकिन इनके गर्भ में असीम वैभव भरा पड़ा है। उपासना से आनन्द, सपने से जीवन और बीज से आगे सृष्टि का सृजन होता है। जिस तरह वटवृक्ष के एक बीज के भीतर एक वटवृक्ष और फिर उस एक वटवृक्ष के द्वारा पुनः अनगिनत बीजों का सृजन संभव है। उसी तरह एक उपासना में और सपने में अनंत सृजन की सम्भावना भरी पड़ी है। उपासना के अपने ढंग हो सकते हैं, सपनों के अपने आकार हो सकते हैं और बीज की अपनी बहुगुणन क्षमता हो सकती है परंतु एक बात तो तय है कि ये तीनों ही अपने भीतर वैभव की विशाल सम्पदा संजोए है। बगैर उपासना के परम की आराधना, बगैर सपनों के सार्थक जीवन और बगैर बीज के अग्रिम भविष्य के बीजों का होना अकल्पनीय है। आवश्यकता है इस क्षमता को पहचानने की, आवश्यकता है इनके महत्व को अनावृत्त करने की, आवश्यकता है इसके आचरण में लाने की।


अपने जीवन में सौंदर्य देखना चाहते हो तो आओ जरा मेरे साथ चल कर देखो।

हम में से हर एक के जीवन में यादों का विशाल भंडार भरा पड़ा है।
कुछ मधुर तो कुछ कड़वे,
कुछ आनन्द पूर्ण कुछ पीड़ा दायक,
कुछ अवसाद भरे तो कुछ प्रेरणास्पद।

कुछ ऐसे पल भी हैं कि जिनके कारण हमारा जीवन सँवर गया,  वहीँ कुछ ऐसे पल भी थे कि जो हाथ से फिसल गए और जिनके कारण सुनहरे अवसर का लाभ नहीं ले पाए।

अपनी याददाश्त को टटोल कर जैसा आप देखना चाहते हो वैसे-वैसे चुन कर देख लो, जो जो देखोगे उस-उस के अनुरूप अभी अनुभतियाँ सजग हो जाएगी। चुनाव आपका ही है कि आप इनमें से क्या पसंद करते हैं।

बेहतर ता यही होगा कि आप सुखानुभूति वाले पल चुनें। वे आपको गुदगुदाऐगे। आप और भी आनन्दित महसूस करेंगे। 

मूल की ओर जाओ

बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता परंतु आग ही नहीं पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है। अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है और ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी वापस अपने मूल स्वरूप में लौटने पर उसी ऊर्जा स्खलन हो जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अन्तर्निहित हो अथवा किसी स्रोत से मिले पर ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता, ऊर्जा किसी स्रोत से मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना लेले।

जीवन का उत्सव

जीवन का उत्सव

      हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है । मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है । मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण होने चाहिए ।

"कीर्तिर्यस्य स जीवति।"

कायर व कमजोर होकर नहीं अपितु स्वाभिमान व आत्मज्ञान के साथ जीवन को जीना कला है। भगवान ने महान् कार्य करने हेतु हमारा सृजन किया है।
इसलिए न बहुत भागो! न बहुत भोगो !!  हड़बड़ा कर भागने वाले कायर, कमजोर लोग हैं तथा भोगी तो अविवेकी ही होते हैं। भागम-भाग तो दुनियाँ में सदा से मची है। हम भी इससे न बच पाएँगे। यहाँ हर कोई चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में से किसी न किसी को या सब को पाने के लिए भाग रहा है, लेकिन इस भागने में खुद को नहीं भूलना है।
रात विश्रान्ति के लिए, दिन भर का श्रम दूर करने के लिए थी। रात अनचाहे, अचीते स्वप्नों से भरी हो सकती है
अतः अब जागो !
जागो! जागने पर ही सवेरा ज्ञात हो पाएगा। बिना जागे सवेरा न देख पाओगे। जागते ही ऊषा की रक्तिम रश्मियाँ हमारा स्वागत करेगी। और जागने पर मन चाहे स्वप्न देख पाओगे। भुवन भास्कर परमात्मा का अव्यय स्वरूप है। अव्यय याने जो खर्च करे पर उसके पास खूटे ना। वह  इस रूप में करोड़ों साल से ऊर्जा खर्च कर रहा है पर खुटी नहीं। आज भी वह ऊर्जा लेकर आया है। घर बैठे पा लो। जीवन एक उत्सव है। यह जीवन परमात्मा का सबसे बड़ा उपहार है। यह देह देवालय, शिवालय व भगवान का मन्दिर है। यह शरीर अयोध्या है। इसमें अपने राम का, अपने इष्ट का एहसास करो।

"जीवन में सत्कर्म के फूलों की खेती होगी तो सौंदर्य और सुगन्ध एक साथ आवेगी।"

गुरु अमृत की खान

गुरु अमृत की खान

मैने सुना है - गुरू गाय है। दुधारू गाय। गाय के स्तनों में भरा दूध तब तक बाहर नहीं आता है जब तक उसका बछड़ा दूध पीने नहीं आता।
यह कपाट उसकी स्नेह मयी ममता से ही खुलता है। खुला ही रहता है जब तक बछड़ा तृप्त नहीं हो जाता। माँ पिलाती रहती है बछड़ा पीता चला जाता है। किसी को दूध दिखाई नहीं देता है।
एक तरफ स्रोत है , ममत्व है, देने का ही भाव है। दूसरी दूसरी तरफ ललक है, प्यास है, अनुरक्ति है और ग्रहण करने की चाह है।
मैने तो यह भी सुना है कि अगर गाय का आँचल (मालवा में गाय के स्तनों को आँचल कहते हैं) दूध से भरा हो और बछड़ा उसे न पिए तो उसके आँचल में दर्द होने लगता है? कहना बड़ी बात नहीं होगी कि दुधारू गाय को भी बछड़े की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसके ऊपर यह भी सत्य है कि बछड़े को दूध उसकी माँ ही पिलाएगी। यह रिश्ता है ममत्व का, दाता का, करुणा का, प्यास का, प्रेम का।

🌌
मैने यह भी सुना है कि गुरु बहती गंगा है। बीच में धार बहती है दोनों ओर रेत ही रेत है। सूखी रेत। किसी को प्यास लगी उसने १००-२०० मीटर दूर रेत में गड्ढा बनाया तो वह देखता है कि निर्मल, स्वच्छ नीर छन छन कर गड्ढे में तैयार है। गंगा को पता ही नहीं कौन आया और अपनी प्यास बुझा गया। लेकिन गंगा में जल है तो पोखर में पानी होगा, पोखर तब होगा जब कोई प्यासा होगा और पोखर तब होगा जब प्यास होगी, पोखर तब होगा जब प्यासा उसे खोदने का यत्न करेगा, और प्यास तब बुझेगी जब प्यासा जल पिएगा। "जल अजस्र होगा।" चाहे जितना पिए, पोखर भरता जाएगा। गंगा अपनी धारा ले कर कहीं बहती रहे। प्यासे के लिए वह रेत के भीतर से बह कर आवेगी। किसी को पता नहीं चलेगा गंगा वहाँ कैसे पहुँच गई। यहाँ रिश्ता है गंगा का और प्यासे का। प्यासे के विश्वास का कि पोखर में गंगा आवेगी, उसकी प्यास बुझाएगी। एक तृप्ति तक ले जाएगी।


मैने यह भी सुना है कि गुरू सितार है। कोई दूसरा सितार कहीं पास में रखा है। दोनों सितारों के तारों में अनुदैर्य का साम्य हो गया। अनुदैर्य याने वे समान फ्रीक्वेन्सी पर ट्यून्ड हैं। पहला सितार बजना प्रारंभ करता है। उसमें से स्वर लहरियाँ निकलती हैं। यह नाद है। यहाँ सप्तक है। सुरम्य तरंगें वातावरण गूँजती है। तरंगें दूसरे सितार तक पहुंचती हैं तब वह दूसरा सितार अपने आप बज उठता है। उसे कोई नहीं बजा रहा पर  अनुगूँज से ही बज उठता है। पहले सितार को पता ही नहीं चला कि दूसरा सितार बज उठा है।
बस वह मुख्य सितार तो बज रहा है, बजता जा रहा है। उसमें नाद है। नाद तो असल में ब्रह्म है। इसलिये यह ब्रह्मनाद ही है। जो बजाए से बजे वह तरंग है लेकिन कबीर कह गया कि जो बिना बजाए बज गया वही अनहद है। यहाँ रिश्ता है सितारों का, उनकी ट्यूनिंग का, नाद का, अनुनाद का, हद से अनहद-नाद का।

🛂रिश्ता🛐
रिश्ता गाय-बछड़े का, रिश्ता गंगा से प्यासे का, रिश्ता सितार-दर-सितार का-- रिश्ता है सद्गुरू से शिष्य का।
🙏🙏🙏🙏
वन्दन सहित....

वैदिक मनोविज्ञान अंक २


वैदिक मनोविज्ञान

अंक २

"ज्योतिषां ज्योतिरेकम्"

बिजली के बल्ब में काँच है, फिलामेंट है। छत पर टँगा है। वह लगा इसलिए है कि जब भी हमें जरूरत हो तब बिजली की बटन दबाएं और हमें रोशनी मिल जाए। यह रोशनी मात्र बटन और बल्ब के कारण से नहीं है अपितु उसमें बहने वाली अद्दष्य विद्युत धारा से है। विद्युत धारा नहीं तो बल्ब में कोई चमक नहीं। इसकी रोशनी में हम वह देख पाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन कमरे में कुछ नहीं दिखने के कारण ये हैं :-

१, चीजें है ही नहीं
२, चीजें हैं देखने वाली आँखें नहीं है
३, चीजें भी हैं, आँखे भी हैं पर अंधेरा है।
४, चीजें हैं, आँखें है, वातावरण में उजेला भी है लेकिन आँखों में देख पाने की क्षमता नहीं है।

मतलब यह कि जिस कमरे में देखना है वहाँ चीजें हों, देखने वाली आँखें हों, प्रकाश हो और देखने वाली आँखों में देखने की क्षमता हो।
इस सबसे ऊपर एक और विचित्र बात वह है जिसे 'वैदिक मनोविज्ञान' ही समझा सकता है। वह यह कि सम्पूर्ण परिदृष्य में से सब कुछ मौजूद होने के बावजूद यदि चीजें दिखाई नहीं देती है तो उसका कारण है "मन"। हाँ,  केवल मन।

दो ढाई साल का बच्चा चलते-चलते जमीन पर गिर जाता है घुटनों से खून बहने लगता है। जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगता है। माँ जमीन ठोंक कर कहती है, देख! चींटी  मर गई। असल में तो वहाँ चींटी है ही नहीं, केवल मन की दिशा का परिवर्तन है। कभी चिड़िया दिखाने लगती है, कहती है, देख! चिड़िया उड़ गई। बालक का मन चींटी और चिड़िया में रम जाता है। रोना रुक जाता है, चाहे खून बहता रहे। मन घुटने से छूट कर चिड़िया और चींटी को देखने में टिक जाता है। त्वचा की संवेदना पीछे छूट जाती है क्योंकि मन अब कुछ और देख रहा है। मन उस संवेदना को प्रकाशित नहीं कर रहा।

संत सूरदास कहते हैं- "ऊधो मन न भए दस-बीस।" मन तो एक ही है, इधर लगा लो चाहे उधर और एक बार में एक तरफ ही जाता है।
यहाँ ठीक वैसा ही कुछ घट जाता है जैसे अन्धेरे में कुछ घट जाए और पता ही न चले। इससे यह भी स्पष्ट है कि मन के प्रकाश में ही समस्त जगत प्रकाशित होता है। मन के इस गुण के अभाव में समस्त जगत अप्रकाशित, अनजान और अज्ञान के अन्धकार से आवृत्त रह जावेगा। जिस प्रकार चीजें वहीं थीं, आँखें वही थी, आँखे सक्षम भी थी, देखने वाला व्यक्ति भी वही था पर मन ने नहीं देखा तो कुछ नहीं दिखा। मन ने संवेदना ग्रहण नहीं की लगा कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। मन ने देखा तो सब दिखा। आँखें मात्र इक्विपमेंट हैं, खिड़कियाँ हैं जहाँ से दृष्य भीतर प्रवेश कर रहे है।
आँखे ही नहीं समस्त इन्द्रियाँ भी मन के अनुशासन में हरकत करती हैं। जहाँ पर मन का प्रकाश होगा वही प्रकाशित होगा। मन के द्वारा सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषय के ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद जीभ नहीं अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को भाते हैं। मन उद्विग्न हो तो चंद्रकिरणें भी चुभन लगती हैं । विषयों की अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
"मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं।"
इसका अर्थ यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ ही कृत कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीवात्मा का दिव्य माध्यम है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो।

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)

इन्द्रिय रूपी अश्व उसी के अनुशासन में रहते हैं। उसी से उनके विषयों को जानने की क्षमता पाते है। इसलिए श्रुति ने मन को "इन्द्रियोँ की लगाम" कहा है। सामान्य अर्थों में मन ही इन्द्रियों और शरीर से सब कुछ करवाता है लेकिन स्पष्ट है लगाम कोई और धारण करता है वह है "जीवात्मा"। श्रुति मन को जड़ परिभाषित करती है। परन्तु बिना लगाम के रथ और घोड़े नहीं चल पाएंगे। इससे मन की महत्ता भी सिद्ध होती है। लेकिन यह भी स्वयंसिद्ध है कि ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ उस परमचेतना से ही अनुप्राणित हैं। "ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।"

"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३

"वैदिक मनोविज्ञान"  अंक ३

"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।" ।।यजुर्वेद ३४/१।।

अन्वयार्थ:-
यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु।

भावार्थ:-
जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी दूर दूर तक चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
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"वैदिक मनोविज्ञान"       अंक ३

"ज्योतिषां ज्योतिरेकं"

ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ, ज्योतियाँ अर्थात् प्रकाशित दीपशिखाएँ, ज्योतियाँ अर्थात् वे शक्तियाँ जिनके आलोक में उपस्थितों का ज्ञान हो।

मिट्टी के दीपक के तीन अवयव हैं; मिट्टी का दीपक, बाती और तेल। इसमें प्रकाश उत्सर्जन की अपूर्व क्षमता है और अभी यह प्रकाश करेगा भी लेकिन बिचारा अकेला कुछ नहीं कर सकता। एक ज्योति आती है इसकी बाती में ज्योति जगाती है और अप्रकट रूप में यहीं मौजूद रहती है तो मिट्टी का अप्रकाशित दिया भी प्रकाश देने लगता है। इस बाती से इसकी आई हुई ज्योति यदि चली गई तो दिया फिर अक्षम हो जावेगा। स्पष्ट है; इसकी ज्योति भी अन्य ज्योति से ज्योतित है।
उक्त तीनों स्थितियों और अर्थों में वे ज्ञान की प्रकाशक ही हैं। ज्ञान उसका जो है। बोध उसका जो अप्रकट था। ज्ञान उसका जो हम जान पाएँ। प्रकट होने पर भी अगर बोध न हो पाए, प्रकट होने पर भी यदि प्रकाशित वस्तु का तात्पर्य ग्रहण न हो पाए या तो प्रकट अथवा अप्रकट में कोई अन्तर नहीं हो तो सभी व्यर्थ है।
अन्धेरे कमरे में यदि टेबल पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो तो दिखेगा कैसे। देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए। चलिये अब प्रकाश के लिए हमने दीप जला कर रख दिया। टेबल पर रखी कोई वस्तु दिखाई देने लगी। यदि यह ज्ञान नहीं हो कि यह वस्तु गुलदस्ता है तो प्रकाशित हो जाने पर भी उसका लाभ नहीं हानि ही है।
वस्तुतः चीजों का प्रकाश तो एक ज्योति ने कर दिया परन्तु अभी एक और ज्योति अर्थात् ज्ञान की आवश्यकता है जो उसके मूल स्वरूप का ज्ञान दे सके। वस्तु को गुलदस्ते के रूप में हमारे भीतर डिस्टिंग्विश कर सके। रस्सी को रस्सी और साँप को साँप समझा सके तथा इनमें से किसी की आपस की भ्रान्ति न आ सके अर्थात् हम रस्सी को साँप न समझ लें।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ज्योति जो बाहरी है वह अपूर्ण अथवा अपर्याप्त है जिससे वह पूर्ण ज्ञान करा सके। इसे एक परम ज्योति की आवश्यकता है, इसे एक "शाश्वत" ज्ञान की बेकिंग या सपोर्ट चाहिए।
यह ज्योति मन ही है। मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी तो है ही पर उनके विषयों को उनका ज्ञान कराने वाला भी केवल यही है। कान सूँघ नहीं सकता, आँख सुन नहीं सकती आदि आदि। आँख को उसके विषय "देखने" की समझ केवल मन से ही आई है। आँखें देखती रहे तो भी सब अनदेखा रह जाएगा यदि उसे मन ने नहीं देखा। सुना सब अनसुना रह जाएगा यदि मन ने नहीं सुना। इसकी क्वालिटी और तात्पर्य भी मन ही निकालता है; जैसे आम आदमी के पाँव को छूने और गुरू के पाँव को छूने का भेद भी मन ही जानता है। छूने का ज्ञान त्वचा से हुआ पर उसे मन ही समझ कर ग्रहण करता है। इस गुणात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
"वैदिक मनोविज्ञान" विश्व का सर्वश्रेष्ठ मनोविज्ञान है जो पाश्चात्य मनोविज्ञान से भिन्न है। उनका मनोविझान व्यवहार पर आधारित है जबकि "वैदिक मनोविज्ञान" आदमी के अन्तःकरण के संश्लेषण पर आधारित है।

श्रुति कहती है; "ज्योतिषां ज्योतिरेकं"।