Thursday, 22 September 2016

क्या बॉटना चाहते हो?

क्या बॉटना चाहते हो?

 जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बो से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। भगवान को पुष्प चढ़ाओगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी। कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और  रबड़ी पीने को मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के वक्त रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी संवेदनाएँँ मर चुकी है। परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजरिया खराब नहीं था, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बाय प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न तो दीपक और न दियासलाई ढूँढ पाओगे। पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।

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