Thursday, 22 September 2016

मूल की ओर जाओ

बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता परंतु आग ही नहीं पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है। अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है और ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी वापस अपने मूल स्वरूप में लौटने पर उसी ऊर्जा स्खलन हो जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अन्तर्निहित हो अथवा किसी स्रोत से मिले पर ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता, ऊर्जा किसी स्रोत से मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना लेले।

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