शब्द और मन
हमारा सारा जगत् शब्दमय है। शब्द अक्षर से निर्मित है। अक्षर ही ब्रह्म है।
😌मन के तीन कार्य हैं-
स्मृति😴 कल्पना 😔एवं चिन्तन🤔।
☝मन उसकी स्मृति करता है जो घटित हो चुका है, भविष्य की कल्पना करता है जो अभी आया ही नही है, और वर्तमान का चिन्तन करता है।
शब्द के बिना स्मृति ही नहीं होती हैं, 'बादल' शब्द स्मृति में होगा तभी आकाश में कभी देखे गए बादल स्मृति में आएँगे। बादल शब्द कहते ही किसी को वास्तविक बादलों की स्मृति होगी। उसी प्रकार शब्द के बिना न कल्पना होती है और न ही चिन्तन होता है। शब्द एक तरह से अलग-अलग चीजों के कोड है इसलिये सारी कल्पनाएं और सारा चिन्तन शब्द के माध्यम से ही चलता हैं। कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का ही आश्रय होता है।
यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो जगत में किसी की कोई पहचान नहीं रह जाएगी।
सहज योगी अच्छे से जानते हैं कि
मन की चंचलता वास्तव में ध्वनि की, शब्द की या भाषा की चंचलता है। मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है।
सोचने का अर्थ है-भीतर बोलना। सोचना और बोलना दो नहीं है। सोचने के समय में भी हम बोलते हैं और बोलने के समय में भी हम सोचते हैं।
यदि हम साधना के द्वारा निर्विकल्प या निर्विचार अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें शब्द को समझकर उसके चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। उससे बाहर आना होगा। यह सारा जगत सब और तरंगों से भरा पड़ा है। विचारों की तरंगे, कर्म की तरंगे, शब्द की तरंगें। शब्द में असीम शक्ति होती है। साधना से शब्द स्वयं ही नेपथ्य मे चले जाते हैं और सहज योग मे तो एक दम सरलता से संभव हो जाता है। निर्विकार होना निर्विचार होने की पहली सीढी है। यह सीढी पार करते ही शब्द स्मृतियों को अपने आप शिथिल कर देता है। इसलिये शब्द की साधना ब्रह्म की उपासना है। शायद इसीलिये सहज होना ब्रह्म के सरलता से निकट जाना है।
हमारा सारा जगत् शब्दमय है। शब्द अक्षर से निर्मित है। अक्षर ही ब्रह्म है।
😌मन के तीन कार्य हैं-
स्मृति😴 कल्पना 😔एवं चिन्तन🤔।
☝मन उसकी स्मृति करता है जो घटित हो चुका है, भविष्य की कल्पना करता है जो अभी आया ही नही है, और वर्तमान का चिन्तन करता है।
शब्द के बिना स्मृति ही नहीं होती हैं, 'बादल' शब्द स्मृति में होगा तभी आकाश में कभी देखे गए बादल स्मृति में आएँगे। बादल शब्द कहते ही किसी को वास्तविक बादलों की स्मृति होगी। उसी प्रकार शब्द के बिना न कल्पना होती है और न ही चिन्तन होता है। शब्द एक तरह से अलग-अलग चीजों के कोड है इसलिये सारी कल्पनाएं और सारा चिन्तन शब्द के माध्यम से ही चलता हैं। कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का ही आश्रय होता है।
यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो जगत में किसी की कोई पहचान नहीं रह जाएगी।
सहज योगी अच्छे से जानते हैं कि
मन की चंचलता वास्तव में ध्वनि की, शब्द की या भाषा की चंचलता है। मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है।
सोचने का अर्थ है-भीतर बोलना। सोचना और बोलना दो नहीं है। सोचने के समय में भी हम बोलते हैं और बोलने के समय में भी हम सोचते हैं।
यदि हम साधना के द्वारा निर्विकल्प या निर्विचार अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें शब्द को समझकर उसके चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। उससे बाहर आना होगा। यह सारा जगत सब और तरंगों से भरा पड़ा है। विचारों की तरंगे, कर्म की तरंगे, शब्द की तरंगें। शब्द में असीम शक्ति होती है। साधना से शब्द स्वयं ही नेपथ्य मे चले जाते हैं और सहज योग मे तो एक दम सरलता से संभव हो जाता है। निर्विकार होना निर्विचार होने की पहली सीढी है। यह सीढी पार करते ही शब्द स्मृतियों को अपने आप शिथिल कर देता है। इसलिये शब्द की साधना ब्रह्म की उपासना है। शायद इसीलिये सहज होना ब्रह्म के सरलता से निकट जाना है।
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