"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३
"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।" ।।यजुर्वेद ३४/१।।
अन्वयार्थ:-
यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु।
भावार्थ:-
जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी दूर दूर तक चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
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"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३
"ज्योतिषां ज्योतिरेकं"
ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ, ज्योतियाँ अर्थात् प्रकाशित दीपशिखाएँ, ज्योतियाँ अर्थात् वे शक्तियाँ जिनके आलोक में उपस्थितों का ज्ञान हो।
मिट्टी के दीपक के तीन अवयव हैं; मिट्टी का दीपक, बाती और तेल। इसमें प्रकाश उत्सर्जन की अपूर्व क्षमता है और अभी यह प्रकाश करेगा भी लेकिन बिचारा अकेला कुछ नहीं कर सकता। एक ज्योति आती है इसकी बाती में ज्योति जगाती है और अप्रकट रूप में यहीं मौजूद रहती है तो मिट्टी का अप्रकाशित दिया भी प्रकाश देने लगता है। इस बाती से इसकी आई हुई ज्योति यदि चली गई तो दिया फिर अक्षम हो जावेगा। स्पष्ट है; इसकी ज्योति भी अन्य ज्योति से ज्योतित है।
उक्त तीनों स्थितियों और अर्थों में वे ज्ञान की प्रकाशक ही हैं। ज्ञान उसका जो है। बोध उसका जो अप्रकट था। ज्ञान उसका जो हम जान पाएँ। प्रकट होने पर भी अगर बोध न हो पाए, प्रकट होने पर भी यदि प्रकाशित वस्तु का तात्पर्य ग्रहण न हो पाए या तो प्रकट अथवा अप्रकट में कोई अन्तर नहीं हो तो सभी व्यर्थ है।
अन्धेरे कमरे में यदि टेबल पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो तो दिखेगा कैसे। देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए। चलिये अब प्रकाश के लिए हमने दीप जला कर रख दिया। टेबल पर रखी कोई वस्तु दिखाई देने लगी। यदि यह ज्ञान नहीं हो कि यह वस्तु गुलदस्ता है तो प्रकाशित हो जाने पर भी उसका लाभ नहीं हानि ही है।
वस्तुतः चीजों का प्रकाश तो एक ज्योति ने कर दिया परन्तु अभी एक और ज्योति अर्थात् ज्ञान की आवश्यकता है जो उसके मूल स्वरूप का ज्ञान दे सके। वस्तु को गुलदस्ते के रूप में हमारे भीतर डिस्टिंग्विश कर सके। रस्सी को रस्सी और साँप को साँप समझा सके तथा इनमें से किसी की आपस की भ्रान्ति न आ सके अर्थात् हम रस्सी को साँप न समझ लें।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ज्योति जो बाहरी है वह अपूर्ण अथवा अपर्याप्त है जिससे वह पूर्ण ज्ञान करा सके। इसे एक परम ज्योति की आवश्यकता है, इसे एक "शाश्वत" ज्ञान की बेकिंग या सपोर्ट चाहिए।
यह ज्योति मन ही है। मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी तो है ही पर उनके विषयों को उनका ज्ञान कराने वाला भी केवल यही है। कान सूँघ नहीं सकता, आँख सुन नहीं सकती आदि आदि। आँख को उसके विषय "देखने" की समझ केवल मन से ही आई है। आँखें देखती रहे तो भी सब अनदेखा रह जाएगा यदि उसे मन ने नहीं देखा। सुना सब अनसुना रह जाएगा यदि मन ने नहीं सुना। इसकी क्वालिटी और तात्पर्य भी मन ही निकालता है; जैसे आम आदमी के पाँव को छूने और गुरू के पाँव को छूने का भेद भी मन ही जानता है। छूने का ज्ञान त्वचा से हुआ पर उसे मन ही समझ कर ग्रहण करता है। इस गुणात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
"वैदिक मनोविज्ञान" विश्व का सर्वश्रेष्ठ मनोविज्ञान है जो पाश्चात्य मनोविज्ञान से भिन्न है। उनका मनोविझान व्यवहार पर आधारित है जबकि "वैदिक मनोविज्ञान" आदमी के अन्तःकरण के संश्लेषण पर आधारित है।
श्रुति कहती है; "ज्योतिषां ज्योतिरेकं"।
"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।" ।।यजुर्वेद ३४/१।।
अन्वयार्थ:-
यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु।
भावार्थ:-
जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी दूर दूर तक चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
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"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३
"ज्योतिषां ज्योतिरेकं"
ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ, ज्योतियाँ अर्थात् प्रकाशित दीपशिखाएँ, ज्योतियाँ अर्थात् वे शक्तियाँ जिनके आलोक में उपस्थितों का ज्ञान हो।
मिट्टी के दीपक के तीन अवयव हैं; मिट्टी का दीपक, बाती और तेल। इसमें प्रकाश उत्सर्जन की अपूर्व क्षमता है और अभी यह प्रकाश करेगा भी लेकिन बिचारा अकेला कुछ नहीं कर सकता। एक ज्योति आती है इसकी बाती में ज्योति जगाती है और अप्रकट रूप में यहीं मौजूद रहती है तो मिट्टी का अप्रकाशित दिया भी प्रकाश देने लगता है। इस बाती से इसकी आई हुई ज्योति यदि चली गई तो दिया फिर अक्षम हो जावेगा। स्पष्ट है; इसकी ज्योति भी अन्य ज्योति से ज्योतित है।
उक्त तीनों स्थितियों और अर्थों में वे ज्ञान की प्रकाशक ही हैं। ज्ञान उसका जो है। बोध उसका जो अप्रकट था। ज्ञान उसका जो हम जान पाएँ। प्रकट होने पर भी अगर बोध न हो पाए, प्रकट होने पर भी यदि प्रकाशित वस्तु का तात्पर्य ग्रहण न हो पाए या तो प्रकट अथवा अप्रकट में कोई अन्तर नहीं हो तो सभी व्यर्थ है।
अन्धेरे कमरे में यदि टेबल पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो तो दिखेगा कैसे। देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए। चलिये अब प्रकाश के लिए हमने दीप जला कर रख दिया। टेबल पर रखी कोई वस्तु दिखाई देने लगी। यदि यह ज्ञान नहीं हो कि यह वस्तु गुलदस्ता है तो प्रकाशित हो जाने पर भी उसका लाभ नहीं हानि ही है।
वस्तुतः चीजों का प्रकाश तो एक ज्योति ने कर दिया परन्तु अभी एक और ज्योति अर्थात् ज्ञान की आवश्यकता है जो उसके मूल स्वरूप का ज्ञान दे सके। वस्तु को गुलदस्ते के रूप में हमारे भीतर डिस्टिंग्विश कर सके। रस्सी को रस्सी और साँप को साँप समझा सके तथा इनमें से किसी की आपस की भ्रान्ति न आ सके अर्थात् हम रस्सी को साँप न समझ लें।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ज्योति जो बाहरी है वह अपूर्ण अथवा अपर्याप्त है जिससे वह पूर्ण ज्ञान करा सके। इसे एक परम ज्योति की आवश्यकता है, इसे एक "शाश्वत" ज्ञान की बेकिंग या सपोर्ट चाहिए।
यह ज्योति मन ही है। मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी तो है ही पर उनके विषयों को उनका ज्ञान कराने वाला भी केवल यही है। कान सूँघ नहीं सकता, आँख सुन नहीं सकती आदि आदि। आँख को उसके विषय "देखने" की समझ केवल मन से ही आई है। आँखें देखती रहे तो भी सब अनदेखा रह जाएगा यदि उसे मन ने नहीं देखा। सुना सब अनसुना रह जाएगा यदि मन ने नहीं सुना। इसकी क्वालिटी और तात्पर्य भी मन ही निकालता है; जैसे आम आदमी के पाँव को छूने और गुरू के पाँव को छूने का भेद भी मन ही जानता है। छूने का ज्ञान त्वचा से हुआ पर उसे मन ही समझ कर ग्रहण करता है। इस गुणात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
"वैदिक मनोविज्ञान" विश्व का सर्वश्रेष्ठ मनोविज्ञान है जो पाश्चात्य मनोविज्ञान से भिन्न है। उनका मनोविझान व्यवहार पर आधारित है जबकि "वैदिक मनोविज्ञान" आदमी के अन्तःकरण के संश्लेषण पर आधारित है।
श्रुति कहती है; "ज्योतिषां ज्योतिरेकं"।
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