Thursday, 15 December 2016

जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝

जीवन में एक जामवन्त चाहिए☝

जामवन्त रामायण का ऐसा पात्र है जो दीर्घजीवी, बुद्धिमान और अत्यन्त शक्ति सम्पन्न है। समुद्रतट पर खड़े नर-वानरों में से कोई भी समुद्र पार नहीं जा पा रहा था तब उसने हनुमान जी की उस क्षमता को पहचाना जिस क्षमता का बोध स्वयं हनुमानजी को भी नहीं था। ऐसी शक्ति उनके भीतर सिन्नहित थी कि वे छलाँग लगा कर समुद्र पार कर सकते हैं। जामवन्त ने उन्हें इस कार्य के लिये तैयार कर दिया।
जैसे बिजली से चलने वाली मोटर के स्टार्टर स्विच को दबाने से मोटर अपनी क्षमता से चलने लग जाती है जबकि बिजली न तो स्टार्टर की अपनी है न ही मोटर की ताकत इस स्विच से आती है। स्विच का काम है बिजली को मोटर से मिलवा देना। इस स्टार्टर का स्टार्टिंग स्विच एक बार दब कर  छूट जाता है तब भी मोटर चलती रहती है। जामवन्त ने भी ऐसा ही किया, हनुमान जी से उनका परिचय उनके भीतर मौजूद शक्ति से करा दिया और फिर अलग हो गए। हनुमान जी को न तो कोई उपदेश दिया न कोई शिक्षा दीक्षा, किया तो बस केवल अन्तर्बोध कराने का उपक्रम ही।
इसी तरह हमारे भीतर मौजूद उस तुरीय अवस्था तक कोई और नहीं ले जा सकता, यहाँ तक कि गुरू भी नहीं। गुरू हमें मन के द्वार तक लाकर और युक्ति बता कर छोड़ देता है। इसके आगे की यात्रा हमें अकेले ही करना है। याने हमारे जीवन में मोटर के स्टार्टिंग स्विच की तरह कोई व्यक्ति चाहिए, एक जामवन्त चाहिए जो हमें अन्तर्बोध करा दे। हमारे भीतर केवल हम ही जा सकते हैं कोई और नहीं लेकिन हमें अपने भीतर कुछ है इसका ज्ञान स्वतः पैदा नहीं होता इसे जनाने कोई आता है तभी हम हमारी खोज यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं इसलिये निश्चित रूप से हमें अपने जीवन में जामवन्त चाहिए। यह व्यक्ति गुरू हो सकता है, आलोचक हो सकता है और शायद हमारा शत्रु भी हो सकता है, विषम परिस्थितियाँ भी उद्दीपक हो सकती हैं।
यदि देखा जाय तो जीवन में कुछ ही सेकण्ड के अन्तराल होते है जैसे स्टार्टर स्विच का काम क्षण भर का होता है। वे क्षण जीवन के टर्निंग पॉइन्ट होते हैं जो हममें अपनी सुप्त पड़ी अन्तर्धारा से अथवा बह रही असीम शक्तियों से साक्षात्कार करा दे। यहाँ से प्रारंभ होती है हमारी अन्तर्यात्रा।

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गया
यहाँ से तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
"अहं ब्रह्मास्मि"

पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई

शायद  मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों से जन्म जन्मान्तरों से

धर्म निरपेक्षता

धर्म निरपेक्षता की परिभाषा आये दिन  बदलती रहती है जो मात्र एक राजनैतिक स्टंट है। धर्म निरपेक्षता के पहले धर्म की पहचान की जानी चाहिए। धर्म केवल उपासना की, पूजा की, सोच की, विचारों की पद्धति पर ठहरा दिया गया है। विश्व को उस धर्म मार्ग की आवश्यकता है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को अमन चैन से रख सके। इन तीनाे की परवाह केवल वेदों ने की है। इनके सिद्धान्तो पर आधारित धर्म मार्ग केवल सनातन धर्म है। बरछी -भालों, एटम बॉम्ब की भाषा बोलने वाले धर्म का अर्थ ही नहीं जानते। वे समझाते हैं कि जो वे कह रहे है वही धर्म की लेटेस्ट लाल किताब है। धर्म के सिद्धातों में कट्टर पांथियों ने यू टर्न बना दिये हैं। विकृति लगभग सभी जगह आई है कहीं ९०प्रतिशत तो कहीं १० प्रतिशत।
इतना जरुर तय है कि ॐ शान्ति अथवा शान्ति शब्द किसी जगह सुनाई देता है तो वह केवल सत्य सनातन धर्म मार्ग लेकिन फ़िजा में इतना शोर घुला है कि 'शान्ति' शब्द सुनाई ही नहीं पड़ता। अब तो यह लगता है कि शान्ति शब्द का घोष भी इस शोर से भी ऊँची आवाज में ही कहना पड़ेगा।
श्री कृष्ण की उठी हुई ऊँगली गीता के उद्बोधन का माध्यम जरूर है परन्तु गीता नहीं सुनी तो वही उँगली सुदर्शन धारण कर सकती है।
एक भीषण सत्य है कि विश्व शान्ति के गीत गाने वाले शक्तिशाली राष्ट्र अमरीका ऐसी परमाणु अप्रसार सन्धि करता है कि उसके भण्डार में तो वह शक्ति भरी रहे पर आपकी खाली रहे।
अजीब बात है क्लास में शान्ति कायम करने के लिए मास्टर टेबल पर बेंत ठोंकता है और बच्चे चुप हो जाते हैं। लेकिन अब ऐसे मास्टर तैयार हो गए हैं कि सारी क्लास में से एक एक बच्चे को पीट-पीट कर दूसरे बच्चों को चुप रहने की सलाहियत दी जाती है।
धर्म की व्याख्या तो बदली नहीं जा सकती लेकिन अधर्म की व्याख्या करने का समय आगया है। धर्म की व्याख्या करने जाएँगे तो अपने लोग ही हमें कटघरे में खड़ा कर देंगे। अधर्म की व्याख्या एक दम सीधी सपाट है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को नुक्सान पहुंचाता है, उनके अस्तित्व के लिए खतरा है वह अधर्म ही है।
इन जीवन मूल्यों के प्रकाश में धर्म, अधर्म और धर्मनिरपेक्षता का भी पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि विधर्मी अपने हित साधन न कर सके।
सिर्फ सेवा के बल पर समाज और राष्द्र की चिन्ता और चिन्तन नहीं हो पाएगा। जमीनी क्रान्ति के पहले वैचारिक क्रान्ति की आवश्यकता है। क्रान्ति केवल "मारकाट" जैसे शब्दों का पर्याय नहीं है अपितु वह एक सुगठित क्रिया कलापों का ही संयोजन है जो किसी भी हालत में अपना मूल मकसद नहीं भूलता।

संकल्प में शिवत्व हो

संकल्प में शिवत्व हो
अगर आपके पास स्केल जैसा कोई साधन न हो तो सरल रेखा खींचना आसान नहीं है। वहीँ यदि पेचीदा (वक्र रेखा) खीचना हो तो वह सरल है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि आपके विचार कभी भी सरल रेखा में नहीं चलते। एक सिरे से सोचना शुरू करते हो तो थोड़ी ही देर में आप पाओगे कि आप विषय से हट कर कहीं ओर निकल गए हो। जैसे कि आपने सोचना है 'कल सुबह घूमने जाऊँगा।' तुरन्त कुछ और समानान्तर प्रवाह चलने लगेंगे; नींद खुलेगी कि नहीं? बरसात तो नहीं हो जाएगी? साथ जाने वाले मित्र आएँगे कि नहीं? आदि आदि।
सरल सी बात भी पेचीदा लगेगी। वस्तुतः सरल को सरल बनाए रखना भी कठिन है जिसका मूल कारण विचारों की पेचीदगी है। विचारों को शुद्ध करने का अर्थ है उनमें मिलावट को रोकना। आपके विशुद्ध उद्देश्यपूर्ण विचारों में भ्रम पैदा करने वाले विचारों का अपमिश्रण होना ही पेचीदगी है। विचारों आना और प्रवाहित होना मनुष्य का नैसर्गिक नियम है। विचार कहाँ से चलेंगे, किधर-किधर जाएंगे, मकाम पर पहुंचेंगे कि नहीं, इस पर आपका कोई नियंत्रण है कि नहीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जो सबको मालूम है।

इसका हल केवल और केवल आपके मन में है। वेद कहता है- तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु। अर्थात् मेरे मन में शुभ-संकल्प हों। जहाँ आपके संकल्प दृढ़ होंगे वहां विकल्प अपने आप क्षीण हो जाएंगे। मन में विकल्पों का होना आज के सन्दर्भों में नकारात्मक विचारों का आधिक्य होना है। स्पष्ट अर्थों में देखा जाए तो विचारों में भ्रम की उपस्थिति ही विकल्पों को जन्म देती है। विकल्प का आधार तर्कों की जमीन पर खड़ा होता है। तर्क बुद्धि का विषय है जो मन से परे है।
संकल्प में शिवत्व है तो डर कैसा? महात्मा गांधी ने संकल्प किया कि मेरा रास्ता अहिंसा और सत्य का होगा। यह संकल्प ही था कि रास्ता तो केवल यही होगा तभी तो विकल्पों का पर्यवसान हुआ होगा। भीतर से विचारों में महात्मा गांधी बन कर देखो, बड़ी कठिनाई में पड़ जाओगे। कई विकल्प तो ऐसे होंगे कि आपका शरीर और मन पक्षाघात के शिकार हो जाएँगे। इसलिए संकल्प शिव हों। विकल्प को रास्ते से हटा दो, जो कठिन लगता है वह भी सरल हो जावेगा।

युवा कौन -

युवा कौन -


थके तन और हारे मन से कोई युवा नहीं हो सकता, चाहे उसकी उम्र कुछ भी क्यों न हो?
दुनिया में जवान-बूढ़े और बूढ़े-जवान देखे जा सकते हैं।
जिसके मन में उत्साह हो, उमंग हो, जो जीवन में कोई लक्ष्य रखता हो बस वही युवा है।
वस्तुतःकुछ कर गुजरने के संकल्पित मन वाला व्यक्ति ही युवा है, जो वर्तमान को बेहतर बनाने के लिये सोचता और करता है वह युवा है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो ''युवा'' आयु की अवस्था नहीं मन की अवस्था है।

युवाओं का सर्वश्रेष्ठ गुण है की वह ऊर्जा से ओत-प्रोत रहता है, वह अपनी ऊर्जा को सुनियोजित करता है। वह विश्व में कुछ अनुठा करना चाहता है। वह भाग्य पर नहीं कर्म पर विश्वास रखता है, परिस्थितियों का दास नहीं उसका निर्माता है, नियंत्रण कर्ता और स्वामी है। मेरा देश विश्व का सर्वाधिक युवाओं से संपन्न है।

मूल स्वभाव

मूल स्वभाव
बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। आग का नैसार्गिक गुण है तपाना और जलाना। क्या केवल आग ही हमारे शरीर को जला सकती है ? ऐसा नही है। पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है।

यह अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है लोकन ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है, ऊर्जा का अशोषण अथवा ऊर्जा का निक्षेप। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी जब वापस अपने मूल स्वरूप में लौटता है तब संचित ऊर्जा बाहर निकल जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अपने भीतर अन्तर्निहित हो या फिर किसी अन्य स्रोत से मिले परन्तु ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता है। ऊर्जा किसी न किसी स्रोत से ही मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है।
स्थितिज और गत्यात्मक ऊर्जा 

"डर का डर"

"डर का डर"
तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्

"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है । जैसे नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि  बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का  अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है। इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत करो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"। भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम  रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं। वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।

स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो जाती  हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है। स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में  दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ?  वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा। 

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥

एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं  "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं  हैरान था कि कर मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी पर आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।
यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल मैं रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।
दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में मैं ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं अद्वैत हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।

जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन  इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर देखें।

यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका साक्षी बना रहूँगा। यह काल का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है,आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।

मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

एक खिलौने से एक बच्चा खेल रहा था। खिलौना बड़ा अजीब था, एक विदूषक की शक्ल-सूरत का, लंबा धड़ पर पैर नहीं थे। बस धड़ का निचला भाग बे पैंदे के लौटे जैसा। बच्चे ने उसे दाहिनी तरफ दबा कर जमीन पर  टिका दिया। लेकिन जैसे ही दबाव हटा विदूषक खड़ा हो गया जैसे मुँह चिढ़ा रहा हो कि कुछ भी प्रयास कर लो मैं फिर खड़ा हो जाऊँगा। चाहे जिस दिशा में चाहे जितना झुकाता वह वापस खड़ा हो जाता। बच्चे ने विदूषक के कान में जाकर पूछा कि जब तक मैं प्रयास करता हूँ तुम वैसे ही रहते हो और छोड़ते ही मेरा सारा प्रयास विफल हो जाता है, आखिर ऐसा क्यों? वह बोलता तो कुछ है ही नहीं बस करता ही करता है। असल में कम्पनी ने ही उसे ऐसा बनाया है। उसमें यह चंचलता भर दी है। विज्ञान में इसे ग्रेविटी टॉय कहते हैं। ग्रेविटी एक नैसर्गिक सिद्धान्त है। आदमी का नहीं प्रकृति का बनाया हुआ है। हमारा स्वभाव भी इसी तरह का है। इसे योग अथवा अध्यात्म में वृत्ति कहते हैं। जिस चित्त की वहाँ बात होती है वह यह विदूषक जैसा ही है। हम उसकी वृत्ति के निरोध करने में रत रहते हैं लेकिन प्रयास हटते ही वह पुनः अपनी वृत्ति में लौटने का प्रयास करता है। यह चित्त अन्तःकरण की क्रियाशील तीसरी और अन्तिम इकाई है। अन्तिम होने से सारी क्रियाएं यहाँ से सुपर कमाण्डो जैसी होती है। इसके बाद की इकाई बस कन्ट्रोल रूम है जिसे माण्डूक्य उपनिषद् ने स्पष्ट करके बताया है जिसे अहंकार कहा है। यह खुद तो कुछ करता नहीं है लेकिन इसके कहे आदेश के बिना कोई क्रिया अथवा कर्म असंभव है। ....


पतन्जलि योग सूत्र के समाधिपाद के तीसवें सूत्र में चित्त के दोषों में से नवाँ दोष बताया है-"अनवस्थितत्व"। मतलब चित्त का यह स्वभाव है कि आप उसकी स्थिति बदलने का प्रयास करते हैं तो भी वह वहाँ अवस्थित नहीं रहता, टिकता नहीं क्योंकि यह किसी अन्य स्थिति में रुक पाने का स्वभाव नहीं है।