"स्वप्न और उसकी प्रतीति"
'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं। वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।
स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो जाती हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है। स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ? वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा।
'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं। वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।
स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो जाती हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है। स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ? वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा।
No comments:
Post a Comment