Thursday, 15 December 2016

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

एक खिलौने से एक बच्चा खेल रहा था। खिलौना बड़ा अजीब था, एक विदूषक की शक्ल-सूरत का, लंबा धड़ पर पैर नहीं थे। बस धड़ का निचला भाग बे पैंदे के लौटे जैसा। बच्चे ने उसे दाहिनी तरफ दबा कर जमीन पर  टिका दिया। लेकिन जैसे ही दबाव हटा विदूषक खड़ा हो गया जैसे मुँह चिढ़ा रहा हो कि कुछ भी प्रयास कर लो मैं फिर खड़ा हो जाऊँगा। चाहे जिस दिशा में चाहे जितना झुकाता वह वापस खड़ा हो जाता। बच्चे ने विदूषक के कान में जाकर पूछा कि जब तक मैं प्रयास करता हूँ तुम वैसे ही रहते हो और छोड़ते ही मेरा सारा प्रयास विफल हो जाता है, आखिर ऐसा क्यों? वह बोलता तो कुछ है ही नहीं बस करता ही करता है। असल में कम्पनी ने ही उसे ऐसा बनाया है। उसमें यह चंचलता भर दी है। विज्ञान में इसे ग्रेविटी टॉय कहते हैं। ग्रेविटी एक नैसर्गिक सिद्धान्त है। आदमी का नहीं प्रकृति का बनाया हुआ है। हमारा स्वभाव भी इसी तरह का है। इसे योग अथवा अध्यात्म में वृत्ति कहते हैं। जिस चित्त की वहाँ बात होती है वह यह विदूषक जैसा ही है। हम उसकी वृत्ति के निरोध करने में रत रहते हैं लेकिन प्रयास हटते ही वह पुनः अपनी वृत्ति में लौटने का प्रयास करता है। यह चित्त अन्तःकरण की क्रियाशील तीसरी और अन्तिम इकाई है। अन्तिम होने से सारी क्रियाएं यहाँ से सुपर कमाण्डो जैसी होती है। इसके बाद की इकाई बस कन्ट्रोल रूम है जिसे माण्डूक्य उपनिषद् ने स्पष्ट करके बताया है जिसे अहंकार कहा है। यह खुद तो कुछ करता नहीं है लेकिन इसके कहे आदेश के बिना कोई क्रिया अथवा कर्म असंभव है। ....


पतन्जलि योग सूत्र के समाधिपाद के तीसवें सूत्र में चित्त के दोषों में से नवाँ दोष बताया है-"अनवस्थितत्व"। मतलब चित्त का यह स्वभाव है कि आप उसकी स्थिति बदलने का प्रयास करते हैं तो भी वह वहाँ अवस्थित नहीं रहता, टिकता नहीं क्योंकि यह किसी अन्य स्थिति में रुक पाने का स्वभाव नहीं है।

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