Thursday, 15 December 2016

मूल स्वभाव

मूल स्वभाव
बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। आग का नैसार्गिक गुण है तपाना और जलाना। क्या केवल आग ही हमारे शरीर को जला सकती है ? ऐसा नही है। पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है।

यह अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है लोकन ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है, ऊर्जा का अशोषण अथवा ऊर्जा का निक्षेप। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी जब वापस अपने मूल स्वरूप में लौटता है तब संचित ऊर्जा बाहर निकल जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अपने भीतर अन्तर्निहित हो या फिर किसी अन्य स्रोत से मिले परन्तु ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता है। ऊर्जा किसी न किसी स्रोत से ही मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है।
स्थितिज और गत्यात्मक ऊर्जा 

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