Thursday, 15 December 2016

धर्म निरपेक्षता

धर्म निरपेक्षता की परिभाषा आये दिन  बदलती रहती है जो मात्र एक राजनैतिक स्टंट है। धर्म निरपेक्षता के पहले धर्म की पहचान की जानी चाहिए। धर्म केवल उपासना की, पूजा की, सोच की, विचारों की पद्धति पर ठहरा दिया गया है। विश्व को उस धर्म मार्ग की आवश्यकता है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को अमन चैन से रख सके। इन तीनाे की परवाह केवल वेदों ने की है। इनके सिद्धान्तो पर आधारित धर्म मार्ग केवल सनातन धर्म है। बरछी -भालों, एटम बॉम्ब की भाषा बोलने वाले धर्म का अर्थ ही नहीं जानते। वे समझाते हैं कि जो वे कह रहे है वही धर्म की लेटेस्ट लाल किताब है। धर्म के सिद्धातों में कट्टर पांथियों ने यू टर्न बना दिये हैं। विकृति लगभग सभी जगह आई है कहीं ९०प्रतिशत तो कहीं १० प्रतिशत।
इतना जरुर तय है कि ॐ शान्ति अथवा शान्ति शब्द किसी जगह सुनाई देता है तो वह केवल सत्य सनातन धर्म मार्ग लेकिन फ़िजा में इतना शोर घुला है कि 'शान्ति' शब्द सुनाई ही नहीं पड़ता। अब तो यह लगता है कि शान्ति शब्द का घोष भी इस शोर से भी ऊँची आवाज में ही कहना पड़ेगा।
श्री कृष्ण की उठी हुई ऊँगली गीता के उद्बोधन का माध्यम जरूर है परन्तु गीता नहीं सुनी तो वही उँगली सुदर्शन धारण कर सकती है।
एक भीषण सत्य है कि विश्व शान्ति के गीत गाने वाले शक्तिशाली राष्ट्र अमरीका ऐसी परमाणु अप्रसार सन्धि करता है कि उसके भण्डार में तो वह शक्ति भरी रहे पर आपकी खाली रहे।
अजीब बात है क्लास में शान्ति कायम करने के लिए मास्टर टेबल पर बेंत ठोंकता है और बच्चे चुप हो जाते हैं। लेकिन अब ऐसे मास्टर तैयार हो गए हैं कि सारी क्लास में से एक एक बच्चे को पीट-पीट कर दूसरे बच्चों को चुप रहने की सलाहियत दी जाती है।
धर्म की व्याख्या तो बदली नहीं जा सकती लेकिन अधर्म की व्याख्या करने का समय आगया है। धर्म की व्याख्या करने जाएँगे तो अपने लोग ही हमें कटघरे में खड़ा कर देंगे। अधर्म की व्याख्या एक दम सीधी सपाट है जो मनुष्य, प्राणी और प्रकृति को नुक्सान पहुंचाता है, उनके अस्तित्व के लिए खतरा है वह अधर्म ही है।
इन जीवन मूल्यों के प्रकाश में धर्म, अधर्म और धर्मनिरपेक्षता का भी पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि विधर्मी अपने हित साधन न कर सके।
सिर्फ सेवा के बल पर समाज और राष्द्र की चिन्ता और चिन्तन नहीं हो पाएगा। जमीनी क्रान्ति के पहले वैचारिक क्रान्ति की आवश्यकता है। क्रान्ति केवल "मारकाट" जैसे शब्दों का पर्याय नहीं है अपितु वह एक सुगठित क्रिया कलापों का ही संयोजन है जो किसी भी हालत में अपना मूल मकसद नहीं भूलता।

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