Thursday, 15 December 2016

संकल्प में शिवत्व हो

संकल्प में शिवत्व हो
अगर आपके पास स्केल जैसा कोई साधन न हो तो सरल रेखा खींचना आसान नहीं है। वहीँ यदि पेचीदा (वक्र रेखा) खीचना हो तो वह सरल है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि आपके विचार कभी भी सरल रेखा में नहीं चलते। एक सिरे से सोचना शुरू करते हो तो थोड़ी ही देर में आप पाओगे कि आप विषय से हट कर कहीं ओर निकल गए हो। जैसे कि आपने सोचना है 'कल सुबह घूमने जाऊँगा।' तुरन्त कुछ और समानान्तर प्रवाह चलने लगेंगे; नींद खुलेगी कि नहीं? बरसात तो नहीं हो जाएगी? साथ जाने वाले मित्र आएँगे कि नहीं? आदि आदि।
सरल सी बात भी पेचीदा लगेगी। वस्तुतः सरल को सरल बनाए रखना भी कठिन है जिसका मूल कारण विचारों की पेचीदगी है। विचारों को शुद्ध करने का अर्थ है उनमें मिलावट को रोकना। आपके विशुद्ध उद्देश्यपूर्ण विचारों में भ्रम पैदा करने वाले विचारों का अपमिश्रण होना ही पेचीदगी है। विचारों आना और प्रवाहित होना मनुष्य का नैसर्गिक नियम है। विचार कहाँ से चलेंगे, किधर-किधर जाएंगे, मकाम पर पहुंचेंगे कि नहीं, इस पर आपका कोई नियंत्रण है कि नहीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जो सबको मालूम है।

इसका हल केवल और केवल आपके मन में है। वेद कहता है- तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु। अर्थात् मेरे मन में शुभ-संकल्प हों। जहाँ आपके संकल्प दृढ़ होंगे वहां विकल्प अपने आप क्षीण हो जाएंगे। मन में विकल्पों का होना आज के सन्दर्भों में नकारात्मक विचारों का आधिक्य होना है। स्पष्ट अर्थों में देखा जाए तो विचारों में भ्रम की उपस्थिति ही विकल्पों को जन्म देती है। विकल्प का आधार तर्कों की जमीन पर खड़ा होता है। तर्क बुद्धि का विषय है जो मन से परे है।
संकल्प में शिवत्व है तो डर कैसा? महात्मा गांधी ने संकल्प किया कि मेरा रास्ता अहिंसा और सत्य का होगा। यह संकल्प ही था कि रास्ता तो केवल यही होगा तभी तो विकल्पों का पर्यवसान हुआ होगा। भीतर से विचारों में महात्मा गांधी बन कर देखो, बड़ी कठिनाई में पड़ जाओगे। कई विकल्प तो ऐसे होंगे कि आपका शरीर और मन पक्षाघात के शिकार हो जाएँगे। इसलिए संकल्प शिव हों। विकल्प को रास्ते से हटा दो, जो कठिन लगता है वह भी सरल हो जावेगा।

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