Thursday, 15 December 2016

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥

एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं  "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं  हैरान था कि कर मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी पर आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।
यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल मैं रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।
दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में मैं ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं अद्वैत हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।

जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन  इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर देखें।

यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका साक्षी बना रहूँगा। यह काल का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है,आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।

मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..

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