"डर का डर"
तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्
"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है । जैसे नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है। इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत करो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"। भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।
तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्
"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है । जैसे नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है। इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत करो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"। भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।
No comments:
Post a Comment