मेरे जीवन की एक छोटी सी घटना
मैं चश्मे के काँच लगने की प्रतीक्षा में बैठा था, कटारिया औप्टीशियन के ८० वर्षीय मालिक से मैने पूछा एक वाक्य में अपने जीवन का अनुभूत आदर्श सन्देश बताइये।
वे तपाक से बोले-
मैं सुबह उठते ही बोलता हूँ ---
🙏या मौला! खर्च बढ़ा...
🤔🤔🤔
मैं आश्चर्य में उनकी ओर देखने लगा। इस पर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हर व्यक्ति की ऐसी ही प्रतिक्रिया उन्हे देखने को मिलती थी।
....
.....
उन्होंने पूछा - कारण जानना नहीं चाहोगे?
मैने हाँ इसलिये नहीं कहा कि मैं तो खर्च कम करना चाहता हूँ,
और
ना इसलिये नहीं बोला कि शायद इसके पीछे अदृष्य जरूर कुछ होगा ही।
परन्तु
उन्होने कहा.....
....
.....
......
मैं उस खर्च को बढ़ाने की कह रहा हूँ जिससे मैं
.......अपने परिवार के हर बड़े छोटे सदस्य का परिपालन कर सकूँ....
मेहमान की अच्छी आवभगत कर सकूँ....
असहाय की मदद कर सकूँ......
जितना बन पड़े सत्कार्यों में दान कर सकूँ....
और चूँकि.....
""अब खर्च मैंने मौला से माँगा है तो कहाँ से आएगा, इसकी फिक्र मौला ही करेंगे।""
मेरा चश्मा तैयार हो गया। मालिक मुस्कुराते हुए दुकान से निकला और स्कूटर पर बैठ कर लन्च पर चला गया।
मैं अवाक् रह गया कि---
उनमें कर्म की प्रतिष्ठा, अपनी जिम्मेदारी, परमार्थ का संकल्प और ईश्वर पर अटल विश्वास का अद्भुत समन्वय था।
No comments:
Post a Comment