Saturday, 29 October 2016

😋प्रसाद का माधुर्य

 😋प्रसाद का माधुर्य☺

मंदिर के भीतर लड्डू जाता है पर लौट कर प्रसाद आता है। कमाल लड्डू का नहीं, मंदिर का नहीं, मूरत का नहीं, पुजारी का नहीं, कमाल है आपकी श्रद्धा का, विश्वास का आस्था का, मान्यता का और प्रेम का।
श्रद्धा नहीं तो प्रेम नहीं, विश्वास नहीं तो प्रेम टिकता नहीं, आस्था नहीं तो प्रेमी बंधता नहीं और मान्यता नहीं तो लड्डू अंदर जाएगा और टूटा - फूटा लड्डू ही बाहर आवेगा। लड्डू बाहर आकर मीठा तो होगा लेकिन उसमे माधुर्य तभी होगा जब आप उस देवता और उसके देवत्व से प्रेम करोगे। मीठा जबान तक मिठास देगा परन्तु प्रेम आपके मन को मीठा कर देगा। क्या कभी यह महसूस किया कि  प्रसाद हाथ पर आता है और हृदय उस देवता के पास दौड़ जाता है। आप श्रद्धा और प्रेम से भर जाते हो। जिसने लडडू खाया उसने बस कवल लड्डू खाया लेकिन जिसने प्रसाद खाया उसने अपने मन को मीठी खुराक पहुँचा दी। यह जो मन तक पहुंची मिठास है यही "माधुर्य" है। आप कहीं भी खड़े हो मन का माधुर्य आपको अपने देवता के पास ले जाकर खड़ा कर देगा, देवता में प्रेम और बढ़ जावेगा। आपको पहले तो लगेगा कि आप देवता के पास पहुँच गये हो लेकिन फिर तुरन्त यह भी लगेगा कि प्रसाद में देवता का आशीष और स्नेह घुल कर आ गया है और इसके साथ ही वह आपके हृदय को गुदगुदा रहा है। आपका हृदयाकाश एक अप्रतिम आलोक से भर गया है। प्रसाद ने आपको आपके देवता से जोड़ दिया है। यह प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और आस्था के रॉ मटेरियल से बना सेतु है।
इसलिए.....
लडडू की मिठास में मत अटको हृदय को प्रसाद के माधुर्य से भर डालो।

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