Saturday, 29 October 2016

"गहरे पानी पैठ

  🌊"गहरे पानी पैठ"🌞

पाँच लोग समुद्र किनारे पहली बार गए। सबने समुद्र को देखा, और जो जो जानना चाहा वह वह अपने स्तर पर जाना भी। लौट कर वे सब अपने गाँव चले आए। गाँव के मुखिया ने बारी बारी से एक के बाद एक व्यक्ति से पूछा कि हम लोगों ने समुद्र कभी नहीं देखा। आप लोगों ने समुद्र देखा है उसके बारे में बताओ।

☝पहला आदमी आया उसने कहा किनारे रेत में खड़ा होकर देखा समुद्र और कुछ नहीं केवल एक शोर है। वहाँ कुछ देर ठहरा और मैं भाग कर दूर चला आया। मैं डर गया कि अगर मैं वहाँ कुछ देर और ठहरता तो मेरे कान फट जाते। मैं तो कहता हूँ आप लोग वहाँ कभी मत जाना। पहला आदमी यह बता कर चला गया।

☝दूसरे से पूछा तो उसने कहा उठती-गिरती लहरों के अलावा समुद्र कुछ नहीं। एक लहर उठती है,  किनारे की और दौड़ती है और वहाँ आकर मर जाती है। फिर पीछे से दूसरी आती है वह भी वही करती है। अन्तहीन सिलसिला चलता है।  किनारे पर लहरों का शोर ही शोर है। मैं घबरा कर दूर चला आया। अब मैं वहाँ कभी नहीं जाऊँगा।

☝तीसरा आया उसने कहा जहाँ तक नजरें जाती है बस पानी ही पानी है यानी बहुत सारा इकट्ठा पानी ही समुद्र है। वहाँ लहरें हैं, लहरों का शोर है, दूर-दूर तक केवल पानी ही पानी है। लगता है इससे तो धरती अच्छी है जहाँ देखने को कुछ और भी है, लोग भी है। समुद्र तो एक निस्सीम निर्जन है। इसीलए मैं तो यही कहता हूँ कि समुद्र शोर भरा उजाड़ है जहाँ पाने को कुछ भी नहीं है।

☝चौथा कहने लगा मैने किनारे पर आई लहर के पानी को चख कर देखा तो मुझे लगा कि बहुत सारा खारा पानी ही समुद्र है। किनारे पर खड़ा मैं देख रहा हूँ। शोर मचाती हुई लहरें आती हैं और मुझे धरती की ओर ढकेलती है। मैं डरता हूँ कि मुझे लहरें बहा न ले जावें। मैं चिन्तित हूँ कि समुद्र में जाने के बाद मैं शायद वापस लौट नहीं पाऊँ और वहीं मैं समाधिस्थ हो जाऊँ। मुझे धरती ही अच्छी लगती है। डर के मारे में वहाँ से दूर भागा।

😔पाँचवें ने कहा मैने देखा कि किनारे पर एक पनडुब्बी खड़ी है। पनडुब्बी वाले से निवेदन किया कि वह मुझे समुद्र की सैर करा दे। उसने मुझे हौले से पनडुब्बी में बिठाया और लहरों को चीरता हुआ लहरों के शोर के उस पार ले चला।
(यह पनडुब्बी वाला ही मेरे उस गुरु की तरह ही है और वह भी सुषुप्ति तक पहुँचा कर अदृष्य सा हो गया)
मैंने भीतर जाकर देखा वह बड़ा ही विलक्षण था, अद्भुत और अपूर्व था। वहाँ एक गहन शान्ति थी। कई जीव मौजूद है जो इधर उधर घूम रहे हैं। उनके लिए कई प्रकार की वनस्पतियाँ है। जैसी नीरवता और शान्ति यहाँ है वैसी समुद्रके बाहर नहीं, धरती पर भी नहीं। यहाँ अगर कुछ चलता भी है तो सब मन्थर गति से है। विशाल आकाश है। धरती पर यह पूरा खुला नहीं दिखाई देता है, वहाँ कई बाधाएँ है। मैं जहाँ जहाँ देखता हूँ वहाँ वहाँ उस विराट की असीम सत्ता का स्पष्ट बोध होता है। थोड़ा आगे और चलता हूँ तो  लगता है यहाँ केवल मेरा मैं और मेरा परमात्मा ही है।

थोड़ी देर उस जगह और ठहरा तो लगा कि यहाँ केवल हूँ, मेरा वह "मैं" पीछे छूट गया और चूँकि मेरे अतिरिक्त शेष भी अशेष है इसलिए जो अशेष है वही "पूर्ण" है। वहाँ केवल यही प्रतीति शेष रही कि यही कैवल्य है।
🕉
मैं जो यहाँ हूँ वही बाहर था। तत्व मैं ही तो हूँ। "तत्वमसि।"

🌍🌓🌊इस रूपक में धरती और वह ग्राम बाह्य जगत है। पाँच लोग वे विभिन्न प्रकार के लोग हैं जो समुद्र याने अन्तःकरण को अपनी अपनी वृतियों और दृष्टिकोण से आँकते हैं। कुछ लोग लहर और उसके शोर अर्थात् मन और विचारों के पार नहीं जा पाते हैं। हवा के थपेड़े न हो तो लहरें होगी ही नहीं इसीलिये अर्जुन कहते हैं कि मन "वायोरिव सुदुष्करं" है। कुछ लोग स्वाद अर्थात् इन्द्रियों के विषयों में उलझ कर जगत में अटके रह जाते हैं। किनारे पर ही खड़े रह जाते हैं।
समुद्र ही अन्तःकरण है।  जिसके सबसे ऊपरी तह मन है। उठने वाले विचार  तो लहरें ही हैं। धरती (जगत) "जाग्रत" अवस्था है। समुद्र के भीतर "स्वप्न" की भाँति ही जगत का प्रतिबिम्ब मौजूद है। वही भी अनुभूतियाँ हैं। आगे बढ़ने पर गहन शांति है। यही सुषुप्ति है जहाँ केवल साक्षी मौजूद है। साक्षी आत्मा ही है  इसलिए अब आगे की अवस्था तुरीय है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिश्यते।।

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