Saturday, 29 October 2016

वैदिक मनोविज्ञान


🔥वैदिक मनोविज्ञान🔥

अंक २

"ज्योतिषां ज्योतिरेकम्"

बिजली के बल्ब में काँच है, फिलामेंट है। छत पर टँगा है। वह लगा इसलिए है कि जब भी हमें जरूरत हो तब बिजली की बटन दबाएं और हमें रोशनी मिल जाए। यह रोशनी मात्र बटन और बल्ब के कारण से नहीं है अपितु उसमें बहने वाली अद्दष्य विद्युत धारा से है। विद्युत धारा नहीं तो बल्ब में कोई चमक नहीं। इसकी रोशनी में हम वह देख पाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन कमरे में कुछ नहीं दिखने के कारण ये हैं :-

१, चीजें है ही नहीं
२, चीजें हैं देखने वाली आँखें नहीं है
३, चीजें भी हैं, आँखे भी हैं पर अंधेरा है।
४, चीजें हैं, आँखें है, वातावरण में उजेला भी है लेकिन आँखों में देख पाने की क्षमता नहीं है।

मतलब यह कि जिस कमरे में देखना है वहाँ चीजें हों, देखने वाली आँखें हों, प्रकाश हो और देखने वाली आँखों में देखने की क्षमता हो।
इस सबसे ऊपर एक और विचित्र बात वह है जिसे 'वैदिक मनोविज्ञान' ही समझा सकता है। वह यह कि सम्पूर्ण परिदृष्य में से सब कुछ मौजूद होने के बावजूद यदि चीजें दिखाई नहीं देती है तो उसका कारण है "मन"। हाँ,  केवल मन।

दो ढाई साल का बच्चा चलते-चलते जमीन पर गिर जाता है घुटनों से खून बहने लगता है। जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगता है। माँ जमीन ठोंक कर कहती है, देख! चींटी  मर गई। असल में तो वहाँ चींटी है ही नहीं, केवल मन की दिशा का परिवर्तन है। कभी चिड़िया दिखाने लगती है, कहती है, देख! चिड़िया उड़ गई। बालक का मन चींटी और चिड़िया में रम जाता है। रोना रुक जाता है, चाहे खून बहता रहे। मन घुटने से छूट कर चिड़िया और चींटी को देखने में टिक जाता है। त्वचा की संवेदना पीछे छूट जाती है क्योंकि मन अब कुछ और देख रहा है। मन उस संवेदना को प्रकाशित नहीं कर रहा।

संत सूरदास कहते हैं- "ऊधो मन न भए दस-बीस।" मन तो एक ही है, इधर लगा लो चाहे उधर और एक बार में एक तरफ ही जाता है।
यहाँ ठीक वैसा ही कुछ घट जाता है जैसे अन्धेरे में कुछ घट जाए और पता ही न चले। इससे यह भी स्पष्ट है कि मन के प्रकाश में ही समस्त जगत प्रकाशित होता है। मन के इस गुण के अभाव में समस्त जगत अप्रकाशित, अनजान और अज्ञान के अन्धकार से आवृत्त रह जावेगा। जिस प्रकार चीजें वहीं थीं, आँखें वही थी, आँखे सक्षम भी थी, देखने वाला व्यक्ति भी वही था पर मन ने नहीं देखा तो कुछ नहीं दिखा। मन ने संवेदना ग्रहण नहीं की लगा कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। मन ने देखा तो सब दिखा। आँखें मात्र इक्विपमेंट हैं, खिड़कियाँ हैं जहाँ से दृष्य भीतर प्रवेश कर रहे है।
आँखे ही नहीं समस्त इन्द्रियाँ भी मन के अनुशासन में हरकत करती हैं। जहाँ पर मन का प्रकाश होगा वही प्रकाशित होगा। मन के द्वारा सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषय के ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद जीभ नहीं अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को भाते हैं। मन उद्विग्न हो तो चंद्रकिरणें भी चुभन लगती हैं । विषयों की अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
"मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं।"
इसका अर्थ यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ ही कृत कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीवात्मा का दिव्य माध्यम है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो।

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)

इन्द्रिय रूपी अश्व उसी के अनुशासन में रहते हैं। उसी से उनके विषयों को जानने की क्षमता पाते है। इसलिए श्रुति ने मन को "इन्द्रियोँ की लगाम" कहा है। सामान्य अर्थों में मन ही इन्द्रियों और शरीर से सब कुछ करवाता है लेकिन स्पष्ट है लगाम कोई और धारण करता है वह है "जीवात्मा"। श्रुति मन को जड़ परिभाषित करती है। परन्तु बिना लगाम के रथ और घोड़े नहीं चल पाएंगे। इससे मन की महत्ता भी सिद्ध होती है। लेकिन यह भी स्वयंसिद्ध है कि ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ उस परमचेतना से ही अनुप्राणित हैं। "ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।"

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