😊जीवन एक उत्सव है😊
जरा सोच कर देखें-- "हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है इसलिए मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है। मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण और भव्य होने चाहिए।"
यह विचार आते ही आपके भीतर ही भीतर एक क्रान्ति का जन्म होगा, ऐसी क्रान्ति जो जीवन को सकारात्मकता से भर देगी। आपको लगेगा कि आप आज और अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और कोई अभी कोई आपको झकझोर कर खड़ा करके चला गया। आपको तुरन्त यह भी महसूस हो जाएगा कि अपने आपको जगाने वाले आप स्वयं हैं। आपके सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा।
उपनिषद् इसको कहता है आप में "जिजीविषा" अर्थात् जीने की चाह हो। यही जिजीविषा मुर्दे में भी जान फूँक सकती है। शरशैया पर पड़े भीष्म जिजीविषा से ही अपनी मृत्यु पर नियंत्रण पा सके थे। हम कई बार देखते हैं कि डॉ जवाब दे देते हैं कि मरीज को अब उपचार के दम पर बचाया नहीं जा सकता लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से कई व्यक्ति पुनर्जीवित हो जाते हैं। सोचिये यदि जिजीविषा व्यक्ति को मृत्यु के मुख से लौटा सकती है तो जीवन के सामान्य दिनों में तो विलक्षण और अद्भुत कार्य की संभावनाओं को भला कौन रोक सकता है। यह विचारों की ही सामर्थ्य कि शिथिल पड़े शरीर और मन ऊर्जा से भर उठते हैं। यह ऊर्जा इम्पोर्टेड नहीं है, आपकी अपनी है, आवश्यकता है उसे पहचानने की, आवश्यकता है अपने भीतर भरे ऊर्जा भण्डार के दोहन की। सिर्फ प्रयोग करके देखिये, वह दिन है आज और वह समय है अभी। संकल्प करने वाले व्यक्ति हैं आप और संकल्प जहाँ ठहरेगा वह है आपका मन। कर्मक्षेत्र है जीवन और कर्मठता है आपकी भक्ति। कर्म में रुचि तभी होगी जब मन आशाओं और उमंगों से भरा होगा। उत्साह और उमंग है तो जीवन उत्सव है। हमें उत्सव चाहिए या मातमपुर्सी हमारी अपनी चॉइस है। दोनो सदैव उपलब्ध है। उत्सव चाहने से आवेगा। आपके कर्मक्षेत्र में आपने अपनी सफलता के बीज नहीं बोए तो उसमें निराशा और हताशा की उपज खुद उग जाएगी। आज की उपलब्धि वह पहली सीढ़ी है जहाँ से आगे आपके जीवन की अगली सीढ़ी जुड़ी हुई है। इसलिये आज को जीवन के उत्सव का प्रथम दिवस बनाइये। जीवन आनन्द और उत्साह से भर जाएगा।
जरा सोच कर देखें-- "हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है इसलिए मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है। मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण और भव्य होने चाहिए।"
यह विचार आते ही आपके भीतर ही भीतर एक क्रान्ति का जन्म होगा, ऐसी क्रान्ति जो जीवन को सकारात्मकता से भर देगी। आपको लगेगा कि आप आज और अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और कोई अभी कोई आपको झकझोर कर खड़ा करके चला गया। आपको तुरन्त यह भी महसूस हो जाएगा कि अपने आपको जगाने वाले आप स्वयं हैं। आपके सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा।
उपनिषद् इसको कहता है आप में "जिजीविषा" अर्थात् जीने की चाह हो। यही जिजीविषा मुर्दे में भी जान फूँक सकती है। शरशैया पर पड़े भीष्म जिजीविषा से ही अपनी मृत्यु पर नियंत्रण पा सके थे। हम कई बार देखते हैं कि डॉ जवाब दे देते हैं कि मरीज को अब उपचार के दम पर बचाया नहीं जा सकता लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से कई व्यक्ति पुनर्जीवित हो जाते हैं। सोचिये यदि जिजीविषा व्यक्ति को मृत्यु के मुख से लौटा सकती है तो जीवन के सामान्य दिनों में तो विलक्षण और अद्भुत कार्य की संभावनाओं को भला कौन रोक सकता है। यह विचारों की ही सामर्थ्य कि शिथिल पड़े शरीर और मन ऊर्जा से भर उठते हैं। यह ऊर्जा इम्पोर्टेड नहीं है, आपकी अपनी है, आवश्यकता है उसे पहचानने की, आवश्यकता है अपने भीतर भरे ऊर्जा भण्डार के दोहन की। सिर्फ प्रयोग करके देखिये, वह दिन है आज और वह समय है अभी। संकल्प करने वाले व्यक्ति हैं आप और संकल्प जहाँ ठहरेगा वह है आपका मन। कर्मक्षेत्र है जीवन और कर्मठता है आपकी भक्ति। कर्म में रुचि तभी होगी जब मन आशाओं और उमंगों से भरा होगा। उत्साह और उमंग है तो जीवन उत्सव है। हमें उत्सव चाहिए या मातमपुर्सी हमारी अपनी चॉइस है। दोनो सदैव उपलब्ध है। उत्सव चाहने से आवेगा। आपके कर्मक्षेत्र में आपने अपनी सफलता के बीज नहीं बोए तो उसमें निराशा और हताशा की उपज खुद उग जाएगी। आज की उपलब्धि वह पहली सीढ़ी है जहाँ से आगे आपके जीवन की अगली सीढ़ी जुड़ी हुई है। इसलिये आज को जीवन के उत्सव का प्रथम दिवस बनाइये। जीवन आनन्द और उत्साह से भर जाएगा।
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