Saturday, 29 October 2016

जीह देहरी द्वार

  💥जीह देहरी द्वार 💥

जब हम सोते है तो थोड़ा सा जागते हैं और जब जागते हैं तो थोड़ा सा सोते हैं। कहने सुनने में यह अजीब लगेगा पर ऐसा है। जब शरीर को जरा सी असुविधा होती है तो हम सोते सोते करवट ले लेते हैं, सर्दी लगने लगती है तो बिस्तर पर पड़ा कम्बल ओढ़ लेते हैं। जागते हैं तब पता चलता है कि हम जब सोए थे तब कंबल बिस्तर पर केवल फैला सा पड़ा था जाने कब और कैसे हमने उसे ओढ़ लिया। सोने लगे तब की शारीरिक स्थिति कुछ होती है जब उठते है तब कुछ और पाते है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर  भीड़ में सोते हुए आदमी को उसका साथी आवाज देता है तो वह सुन कर उठ बैठता है, उसे महसूस होता है कि मुझे ही पुकारा जा रहा है। ठीक इसी तरह ही आदमी जागते हुए भी सोता है। परिवार का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है उसे तुरन्त सहायता पहुँचाने की गरज से दोड़ते हुए आदमी को कोई परिचित जोर से भी पुकारे तो वह सुनता नहीं है। वह जाग कर भी सोए हुए आदमी सा व्यवहार करता है। वह सड़क पर शरीर से है पर मन से तो अस्पताल में ही है, ठीक उस तरह जैसे नींद में बिस्तर पर सोया आदमी भेड़ाघाट के झरने और उसके शोर को देख सुन रहा हो।
जागने और सोने का कोई एक सन्धि स्थल जरूर है जिसके इस पार जागना और उस पार सोना है। दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो जागना-सोना एक सापेक्ष स्थिति है या कहा जाना चाहिए कि जिस जगह है उसी जगह पर पूरी तरह मौजूद होना जागना है और उसी जगह न रहते हुए कहीं और विचरण करना सोना है। बहुत अच्छे से समझा जाए तो जागने-सोने की इस प्रक्रिया में मन ही जिम्मेदार है। जहाँ शरीर है वहीं मन है, वर्तमान है,  तो समझो जागे हुए हो और अलग अलग हो तो समझो "सोए हुए" से कुछ अलग नहीं हो। जब सो कर स्वप्न देख रहे हो तो आपका कोई बस नहीं पर बिना सोए मन भटका रहे हो तो जाग कर भी सोए ही हो, गफलत में हो। "संकल्पना" और "स्वप्न" को एक ही समझने की भूल मत कर बैठना। "संकल्पना" मानव और केवल मानव को ईश्वर प्रदत गुण है जो मनुष्येतर प्राणी में नहीं। यही तर्क अौर ज्ञान की उपलब्धि में सहायक होती है। लेकिन नियंत्रण के अभाव में ध्वंसात्मक हो सकती है। स्वप्न यथार्थ तो है पर सत्य नहीं है। जागते ही स्वप्न का यथार्थ घुटने टेक देता है। छोटे और तात्कालिक अर्थों में स्वप्न जल्दी ही "अनित्य" मालूम हो जाते हैं पर यह जगत पता नहीं चल पाता है कि यह भी एक बड़ा "अनित्य" है। वस्तुत: जाग्रत अवस्था और स्वप्नावस्था दोनों ही मन के परिक्षेत्र है। संसार मनोमय है। मन फैलता है तो जगत फैलता है, मन सिकुड़ता है तो जगत का प्रभाव भी सिकड़ता है। मन का बहुत सारा नियन्त्रण तो उसे वर्त्तमान में रखने से ही हो सकता है। दूसरी सीढ़ी है उसका परिक्षेत्र सीमित करने की। तीसरी सीढ़ी है इसे मौन करने की। मौन कर लिया तो हम सुषुप्ति के बिल्कुल निकट होंगे, ध्यान की उपलब्धि के निकट, धारणा के उस पार। यहाँ आनन्द का साम्राज्य है। दुःखों और सुखों से परे आनन्दानुभूति। जिस मन को लोग भला बुरा कहते रहते हैं वह न लगे तो अन्तर्यात्रा असम्भव है। यह अतःकरण का गेटकीपर है(जीह देहरी द्वार)। इस संधि पर दीप जला तो भीतर-बाहर का उजास होगा।
  "मन तू जोत सरूप है, अपना मूल पछाण।"

"इस मन के उजास में जागते रहाे- भीतर जागते रहो, बाहर जागते रहाे।" 

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