सुख, दुःख और आनन्द
हमारा प्रत्येक का अपना अपना स्वभाव है, अपनी अपनी आदतें हैं और आपसी व्यवहार के अपने अपने तरीके हैं। यह जरूरी नहीं कि जो एक को अच्छा लगे वह अन्य को भी अच्छा लगे। किन्तु यह बात तो तय है कि व्यक्ति वही चाहता है जो उसको अच्छा लगे यह भी उतना ही सच है कि जरूरी नहीं; उसे वही मिलता रहेगा जो वह चाहता है। मोटे तौर से देखा जाए तो वह वही चाहता है जो उसके अनुकूल है। अच्छा वही लगता है जो अनुकूल है। इस अनुकूलता को आभास करने वाला अंतिम छोर है मन। एक प्रेमी अपने प्रिय की प्रतीक्षा में चिलचिलाती धूप में खड़ा है जो शरीर को कष्टप्रद हो सकता है पर मन को प्रतिकूल नहीं लगता। अर्थात् अनुकूलता और प्रतिकूलता का आभास मन करता है।
मन की अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकूलता ही दुःख है। इन दोनों के बीच तटस्थ खड़ा होना विराग है और बीच में खड़े हो कर स्वात्मभाव को प्राप्त हो जाना ही आनन्द को प्राप्त हो जाना है।
हमें तीन प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। दुख की, सुख की और आनंद की। सुख की और दुख की अनुभूतियां बाहर से होती हैं। बाहर हम कुछ चाहते हैं, मिल जाए, सुख होता है। बाहर हम कुछ चाहते हैं, न मिल पाए, दुख होता है। बाहर प्रिय को निकट रखना चाहते हैं, सुख होता है; प्रिय से विछोह हो, दुख होता है। अप्रिय से मिलना हो जाए, दुख होता है; प्रिय से बिछुड़ना हो जाए, तो दुख होता है। बाहर जो जगत है उसके संबंध में हमें दो तरह की अनुभूतियां होती हैं–या तो दुख की, या सुख की।
आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती। आनंद को सुख समझना बहुत बड़ी भूल होगी। आनंद और सुख में जमीन आसमान का अंतर है। दुख और सुख दोनों का अभाव आनन्द है; जहां दुख और सुख दोनों नहीं हैं, वैसी चित्तकी परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद की स्थिति है।
आनंद की स्थिति में बाहर से कोई भी उद्वेलन भीतर प्रभावित नहीं करता–न दुख का और न सुख का।
सुख दुख दोनों संवेदनाएँ हैं। दोनों अशांतियाँ हैं। अशान्ति अर्थात् चित्त की विचलित अवस्था। दुख की अशांति अप्रीतिकर है, सुख की अशांति प्रीतिकर है। लेकिन दोनों उद्विग्नताएं हैं, दोनों चित्त की उद्विग्न, उत्तेजित अवस्थाएं हैं। सुख में भी आप उत्तेजित हो जाते हैं। अगर बहुत सुख हो जाए तो मृत्यु तक हो सकती है। अगर आकस्मिक सुख हो जाए तो मृत्यु हो सकती है, इतनी उत्तेजना सुख दे सकता है। दुख भी उत्तेजना है, सुख भी उत्तेजना है। अनुत्तेजना आनंद है। जहां कोई उत्तेजना नहीं, जहां चित्त पर बाहर का कोई प्रभाव नहीं वहाँ आनन्द है। अपने से बाहर संबंधित होना आनन्द की स्थिति निर्मित नहीं होने देगा।
एक सरोवर में लहरों के उठने का अर्थ है हवा के बाहरी थपेड़े बाहर से उसको प्रभावित कर रहे हैं। सरोवर बाहर की किसी चीज से प्रभावित न हो तो वह शांत होगा वैसे ही हमारा चित्त बाहर से प्रभावित होता है तो उत्तेजना की तरंगें उठती हैं सुख की, और दुख की। परन्तु जब हमारा चित्त बाहर से अप्रभावित होता है तब उस स्थिति का नाम आनंद है। आनंद बाहर का अनुभव न होकर अपना स्वयं का अनुभव है। सुख और दुख छीने जा सकते हैं, क्योंकि वे बाहर से प्रभावित हैं वहीं आनंद निःकारण है इसलिए आनंद को छीना नहीं जा सकता। आनंद आपके अंतर में नित्य विद्यमान है। दुख भी बंधन है, सुख भी बंधन है, आनंद मुक्ति है।
तो आनंद मनुष्य का बाहर से सिमट कर अपने स्व में स्थित होना है। सुख-दुख मिलता है, आनंद मिलता नहीं है। आनंद मौजूद है, केवल जानना होता है। आनंद को पाना नहीं होता, वह केवल अनुसंधान से ज्ञात होता है। स्मरण रहे जो चीज पाई जा सकती है वह खो भी सकती है। आनंद खो नहीं सकता पर जाने बिना खोया हुआ समझते हो। एक दम स्पष्ट है कि आनंद की दो स्थितियां हैं – आनंद के प्रति अज्ञान और आनंद के प्रति ज्ञान। आनंद का ज्ञान न होना निरानंद की स्थिति नहीं हैं। जैसे कि जब हम सोते हैं तब हमें हमारे होने का ज्ञान नहीं होता है पर हम होते हैं और जागते ही होने का भान हो जाता है। यह अन्तर स्टेट ऑफ बीइंग का नहीं है, स्टेट ऑफ नोइंग का है। जो स्टेट आफ बीइंग में उलझा है वह बाहर उलझा है, उसको अपने भीतर जाने की उसे फुर्सत नहीं है। इसलिए आनन्द के लिए अन्तर्यात्रा करनी होगी।
स्मरणीय है कि न दुःख परमानेन्ट है न सुख।
दुख कोई नहीं चाहता है, हर कोई सुख चाहता है। इस चाह के हटते ही आनन्द का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। कहना बहुत सरल है पर चाह को हटाना दुष्कर है। लेकिन इसका पुख्ता इलाज गीता में है। गीता में इसे समत्व योग कहा है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण-सुख-दुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६/७॥
जिस ने अपने को जीत लिया है और शांति पा ली है, वह परमात्मा मेँ समा गया है. वह सर्दी गरमी, सुख दुःख और मान अपमान आदि द्वंद्वोँ मेँ शांत रहता है।
जो सुख दुःख की चाह से मुक्त हुआ समझो मुक्त हो गया। जो मुक्त हो गया वह आनन्द को प्राप्त हो गया। जो भीतर से कनेक्टेड है जैसे सन्यासी के साथ सफिक्स रूप में आनन्द जुड़ा होता ही है। यह परम्परा से अधिक कॉन्सेप्ट है।
हमारा प्रत्येक का अपना अपना स्वभाव है, अपनी अपनी आदतें हैं और आपसी व्यवहार के अपने अपने तरीके हैं। यह जरूरी नहीं कि जो एक को अच्छा लगे वह अन्य को भी अच्छा लगे। किन्तु यह बात तो तय है कि व्यक्ति वही चाहता है जो उसको अच्छा लगे यह भी उतना ही सच है कि जरूरी नहीं; उसे वही मिलता रहेगा जो वह चाहता है। मोटे तौर से देखा जाए तो वह वही चाहता है जो उसके अनुकूल है। अच्छा वही लगता है जो अनुकूल है। इस अनुकूलता को आभास करने वाला अंतिम छोर है मन। एक प्रेमी अपने प्रिय की प्रतीक्षा में चिलचिलाती धूप में खड़ा है जो शरीर को कष्टप्रद हो सकता है पर मन को प्रतिकूल नहीं लगता। अर्थात् अनुकूलता और प्रतिकूलता का आभास मन करता है।
मन की अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकूलता ही दुःख है। इन दोनों के बीच तटस्थ खड़ा होना विराग है और बीच में खड़े हो कर स्वात्मभाव को प्राप्त हो जाना ही आनन्द को प्राप्त हो जाना है।
हमें तीन प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। दुख की, सुख की और आनंद की। सुख की और दुख की अनुभूतियां बाहर से होती हैं। बाहर हम कुछ चाहते हैं, मिल जाए, सुख होता है। बाहर हम कुछ चाहते हैं, न मिल पाए, दुख होता है। बाहर प्रिय को निकट रखना चाहते हैं, सुख होता है; प्रिय से विछोह हो, दुख होता है। अप्रिय से मिलना हो जाए, दुख होता है; प्रिय से बिछुड़ना हो जाए, तो दुख होता है। बाहर जो जगत है उसके संबंध में हमें दो तरह की अनुभूतियां होती हैं–या तो दुख की, या सुख की।
आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती। आनंद को सुख समझना बहुत बड़ी भूल होगी। आनंद और सुख में जमीन आसमान का अंतर है। दुख और सुख दोनों का अभाव आनन्द है; जहां दुख और सुख दोनों नहीं हैं, वैसी चित्तकी परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद की स्थिति है।
आनंद की स्थिति में बाहर से कोई भी उद्वेलन भीतर प्रभावित नहीं करता–न दुख का और न सुख का।
सुख दुख दोनों संवेदनाएँ हैं। दोनों अशांतियाँ हैं। अशान्ति अर्थात् चित्त की विचलित अवस्था। दुख की अशांति अप्रीतिकर है, सुख की अशांति प्रीतिकर है। लेकिन दोनों उद्विग्नताएं हैं, दोनों चित्त की उद्विग्न, उत्तेजित अवस्थाएं हैं। सुख में भी आप उत्तेजित हो जाते हैं। अगर बहुत सुख हो जाए तो मृत्यु तक हो सकती है। अगर आकस्मिक सुख हो जाए तो मृत्यु हो सकती है, इतनी उत्तेजना सुख दे सकता है। दुख भी उत्तेजना है, सुख भी उत्तेजना है। अनुत्तेजना आनंद है। जहां कोई उत्तेजना नहीं, जहां चित्त पर बाहर का कोई प्रभाव नहीं वहाँ आनन्द है। अपने से बाहर संबंधित होना आनन्द की स्थिति निर्मित नहीं होने देगा।
एक सरोवर में लहरों के उठने का अर्थ है हवा के बाहरी थपेड़े बाहर से उसको प्रभावित कर रहे हैं। सरोवर बाहर की किसी चीज से प्रभावित न हो तो वह शांत होगा वैसे ही हमारा चित्त बाहर से प्रभावित होता है तो उत्तेजना की तरंगें उठती हैं सुख की, और दुख की। परन्तु जब हमारा चित्त बाहर से अप्रभावित होता है तब उस स्थिति का नाम आनंद है। आनंद बाहर का अनुभव न होकर अपना स्वयं का अनुभव है। सुख और दुख छीने जा सकते हैं, क्योंकि वे बाहर से प्रभावित हैं वहीं आनंद निःकारण है इसलिए आनंद को छीना नहीं जा सकता। आनंद आपके अंतर में नित्य विद्यमान है। दुख भी बंधन है, सुख भी बंधन है, आनंद मुक्ति है।
तो आनंद मनुष्य का बाहर से सिमट कर अपने स्व में स्थित होना है। सुख-दुख मिलता है, आनंद मिलता नहीं है। आनंद मौजूद है, केवल जानना होता है। आनंद को पाना नहीं होता, वह केवल अनुसंधान से ज्ञात होता है। स्मरण रहे जो चीज पाई जा सकती है वह खो भी सकती है। आनंद खो नहीं सकता पर जाने बिना खोया हुआ समझते हो। एक दम स्पष्ट है कि आनंद की दो स्थितियां हैं – आनंद के प्रति अज्ञान और आनंद के प्रति ज्ञान। आनंद का ज्ञान न होना निरानंद की स्थिति नहीं हैं। जैसे कि जब हम सोते हैं तब हमें हमारे होने का ज्ञान नहीं होता है पर हम होते हैं और जागते ही होने का भान हो जाता है। यह अन्तर स्टेट ऑफ बीइंग का नहीं है, स्टेट ऑफ नोइंग का है। जो स्टेट आफ बीइंग में उलझा है वह बाहर उलझा है, उसको अपने भीतर जाने की उसे फुर्सत नहीं है। इसलिए आनन्द के लिए अन्तर्यात्रा करनी होगी।
स्मरणीय है कि न दुःख परमानेन्ट है न सुख।
दुख कोई नहीं चाहता है, हर कोई सुख चाहता है। इस चाह के हटते ही आनन्द का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। कहना बहुत सरल है पर चाह को हटाना दुष्कर है। लेकिन इसका पुख्ता इलाज गीता में है। गीता में इसे समत्व योग कहा है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण-सुख-दुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६/७॥
जिस ने अपने को जीत लिया है और शांति पा ली है, वह परमात्मा मेँ समा गया है. वह सर्दी गरमी, सुख दुःख और मान अपमान आदि द्वंद्वोँ मेँ शांत रहता है।
जो सुख दुःख की चाह से मुक्त हुआ समझो मुक्त हो गया। जो मुक्त हो गया वह आनन्द को प्राप्त हो गया। जो भीतर से कनेक्टेड है जैसे सन्यासी के साथ सफिक्स रूप में आनन्द जुड़ा होता ही है। यह परम्परा से अधिक कॉन्सेप्ट है।