(औपनिषदैय चिन्तन)
👁नज़र क्या? नज़रिया क्या?💐
जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। शायद यह तुम जानते भी नहीं हो। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बों से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। उनकी आँखों को क्यों अपनी रुलाई से भरते हो। सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। अरे, भगवान को पुष्प चढ़ाओगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी। हमें देखना नहीं आता, देखो तो "सर्वं खल्विदं ब्रह्म"।
बड़ी अजीब बात है; कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और रबड़ी पीने को मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के बारी आई तो रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी संवेदनाएँँ तो मर चुकी है। परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है। हर समय अनुकूलता नहीं मिलेगी। इसलिए, "जमाने वालों किताबे गम में कोई तराना ढूँढो।" गुलमोहर को देखो पतझड़ में भी रंगों से लकदक है।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजर खराब नहीं थी, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बेड-बाय प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे मुख्य फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न दीपक ढूँढ पाओगे न ही दियासलाई । अंधेरे में न खुद को खुद दिखोगे और न किसी अौर को। दीपक जलाओ; रोशनी देख कर अंधेरे में से निकल कुछ और लोग भी तुम्हारे संग होंगे। "तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। चलोगे न ?
खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।। चलोगे न ?
"मृत्योर्माऽमृतं गमय।"
पुरूषार्थ का प्रथम पदार्थ धर्म है, प्रेम का प्रथम सोपान समर्पण है और परम-प्रिय वह परमात्मा है। धर्म के पथ पर निकलो, परमात्मा के पावन चरणों में समर्पित हो जाओ। देखो वह तुम्हारा भजन कर रहा है।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४/११
योगेश्वर कृष्ण कह रहे हैं कि जो मनुष्य जिस तरह से मेरा अर्चन करते हैं, मुझसे प्रेम करते और आनंदित होते हैं, मैं भी उन्हें उसी तरह अपनाता हूँ, उनका स्मरण करता हूँ और आनंदित होता हूँ। उस की ओर जाने का मार्ग अमृतमयी है। अपनी दृष्टि को व्यष्टि से समष्टि की ओर मोड़नी होगी। वे दृष्य विहंगम हैं जो अन्तर्यात्रा में स्पष्ट दिखाई देंगे। वहाँ केवल आनन्द ही आनन्द है। वह यात्रा मुक्तिपथ है। इससे पहले कि कोई बाधा खड़ी हो जाए, चल पड़ो। तुम्हारा प्रथम डग मंजिल की कुल दूरी को एक कदम कम कर देगा।
चल पड़ो इस पार से, अब खुद को समेटो
उस पुरातन गीत में, अब नूतन स्वर जगाओ
खोल दो सब गाँठ मन की, प्रीत की मधुरिम कड़ी है
अंजुरी में पुष्प भर लें, अर्चना की शुभ घड़ी है।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
👁नज़र क्या? नज़रिया क्या?💐
जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। शायद यह तुम जानते भी नहीं हो। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बों से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। उनकी आँखों को क्यों अपनी रुलाई से भरते हो। सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। अरे, भगवान को पुष्प चढ़ाओगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी। हमें देखना नहीं आता, देखो तो "सर्वं खल्विदं ब्रह्म"।
बड़ी अजीब बात है; कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और रबड़ी पीने को मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के बारी आई तो रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी संवेदनाएँँ तो मर चुकी है। परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है। हर समय अनुकूलता नहीं मिलेगी। इसलिए, "जमाने वालों किताबे गम में कोई तराना ढूँढो।" गुलमोहर को देखो पतझड़ में भी रंगों से लकदक है।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजर खराब नहीं थी, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बेड-बाय प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे मुख्य फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न दीपक ढूँढ पाओगे न ही दियासलाई । अंधेरे में न खुद को खुद दिखोगे और न किसी अौर को। दीपक जलाओ; रोशनी देख कर अंधेरे में से निकल कुछ और लोग भी तुम्हारे संग होंगे। "तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। चलोगे न ?
खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।। चलोगे न ?
"मृत्योर्माऽमृतं गमय।"
पुरूषार्थ का प्रथम पदार्थ धर्म है, प्रेम का प्रथम सोपान समर्पण है और परम-प्रिय वह परमात्मा है। धर्म के पथ पर निकलो, परमात्मा के पावन चरणों में समर्पित हो जाओ। देखो वह तुम्हारा भजन कर रहा है।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४/११
योगेश्वर कृष्ण कह रहे हैं कि जो मनुष्य जिस तरह से मेरा अर्चन करते हैं, मुझसे प्रेम करते और आनंदित होते हैं, मैं भी उन्हें उसी तरह अपनाता हूँ, उनका स्मरण करता हूँ और आनंदित होता हूँ। उस की ओर जाने का मार्ग अमृतमयी है। अपनी दृष्टि को व्यष्टि से समष्टि की ओर मोड़नी होगी। वे दृष्य विहंगम हैं जो अन्तर्यात्रा में स्पष्ट दिखाई देंगे। वहाँ केवल आनन्द ही आनन्द है। वह यात्रा मुक्तिपथ है। इससे पहले कि कोई बाधा खड़ी हो जाए, चल पड़ो। तुम्हारा प्रथम डग मंजिल की कुल दूरी को एक कदम कम कर देगा।
चल पड़ो इस पार से, अब खुद को समेटो
उस पुरातन गीत में, अब नूतन स्वर जगाओ
खोल दो सब गाँठ मन की, प्रीत की मधुरिम कड़ी है
अंजुरी में पुष्प भर लें, अर्चना की शुभ घड़ी है।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment