आईने कई तरह के होते हैं. सरल-सपाट, उथले-उभरे, धंसे-गहरे. सरल-सपाट आइना दर्शक की छबि विकृत नहीं करता, उभरे उथले आईने पास की वास्तु दूर और छति बताते है वहीँ धंसे-गहरे आईने छबी को उल्टा-पुल्टा कर देते हैं. आईने की इन छबियों में जीवन एवं दर्शन के कुछ साम्य अवस्थाएँ बताती हैं. यह देखने के लिए हमें आईने के सामान्य गुणों को जानना होगा .
यहाँ हम केवल सरल सपाट आईने की ही चर्चा करेंगे. लोग कहते हैं आइना झूठ नहीं बोलता. यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है केवल आभास है. यह ज्यादातर सच और थोडा थोडा झूंठ दिखाता है. चलिए आईने के सामने हम एक परिदृश्य के साथ खड़े होते है. नीचे जमीन और ऊपर आसमान है. मेरे दाएं हाथ में फूलों का एक गुलदस्ता है. मैं यहाँ परमात्मा की प्रार्थना गा रहा हूँ. मेरे आगे-पीछे दायें-बाएं लोग आ-जा रहे हैं. मेरे पीछे लगे एक नल से पानी बह रहा है, बहता हुआ पानी मेरे पावों को गीला कर रहा है. गुलदस्ते से भीनी-भीनी खुशबू आ रही है. कुछ लोग मुझ से आगे आईने की ओर और कुछ मेरे पीछे आईने से दूर जा रहे हैं. वातावरण बिजली से चालित बल्ब की रौशनी से प्रकाशित हो रहा है.
आईने के भीतर और बाहर के परिदृश्य में जो झूंठ और सच दिखाई दे रहा है वह कुछ इस प्रकार है –
१ आईने में जमीन नीचे, आसमान ऊपर ही लेकिन दायें की बजाय बाएं हाथ में गुलदस्ता दिखाई दे रहा है. सर ऊपर, पैर नीचे .जो लोग आईने की ओर जा रहे हैं वे आते हुए लेकिन मुझसे पीछे जाते हुए वास्तव में दूर ही जाते दिखाई दे रहे हैं. इसी तरह मेरे बाएं हाथ की ओर आते हुए लोग आईने में मेरे दाहिने हाथ के करीब आते दीख रहे हैं.
२ आइना एक दीवार पर लगा है, दीवार के उस पार एक असत्य अर्थात सदैव न रहने वाला संसार दिखी दे रहा है. मैं सामने खड़ा हूँ तो आइना मुझे लेकिन मेरे हट जाने पर दूसरा व्यक्ति आ जाएगा तो वह उसे दिखाने लगेगा. मेरी उपस्थिति मेरे आईने के सामने होने पर ही आइना दिखा सकेगा लेकिन वहीँ मेरा अस्तित्व रहने पर भी आईने के सामने न होने पर आइना मुझे नहीं दिखा सकेगा.
३ मेरे पैर पानी मे गीले होने से ठंडक मह्सूस करा रहे हैं. बहता पानी आईने के उस पार बहता दीख रहा है लेकिन आईने को गीला नहीं कर रहा है. गुलदस्ते के फूलों की महक आईने में नहीं हो सकती,इन्हें केवल इस पार ही महसूस किया जा सकता है, वहां केवल आभासित हो रहा है. मेरे चेहरे पर आये भाव मुझे अपनी आँखों से इस पार नहीं लेकिन उस पार आईने में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं.
४ आईने के इस पार और उस पार दृश्य रौशनी में दिखाई दे रहा है और रौशनी के जाते ही दिखाई देना बंद हो जाते हैं.इस स्थिति में मैं भी हूँ आइना भी है. सब कुछ है लेकिन रौशनी के अभाव में एक मौन खड़ा हो जाता है, आभास ही नहीं होता. रौशनी के आते ही फिर दिखाई देने लगता है.
इस स्थिति में मैं अन्दर सम्पूर्ण रूप से वही हूँ जीवन वैसा ही चल रहा है, स्वास है, धड़कन है, सभी इन्द्रियां अपनी- अपनी जगह हैं. उनके विषय ग्रहण करने की क्षमता उनमें मौजूद भी है, अंतर केवल इतना है कि वे फ़िलहाल आईने के उस पार कोई हरकत नहीं देख पा रही हैं, अगर रौशनी बहाल हो जाए तो फिर वही चलने लग जावेगा.
५ आईने के इस पार मैं हूँ मैं स्वयं जीवित हूँ यह जो जीवन की चेतना है मेरे शरीर के जीवित होने का कारन और प्रमाण है. आईने के इस पार मैं जीवन के स्रोत चेतना को लिए घूमता हूँ लेकिन चेतना का साकार दर्शन संभव नहीं. चेतना के नहीं रहने पर यह शरीर सभी भौतिक तत्वों के रहते हुए भी वैसा कुछ नहीं कर पाएगा जो पहले कर रहा था. न आईने के इस पार कुछ भी महसूस कर सकेगा न आईने के उस पार उसे कुछ महसूस होता हुआ जाना जा सकेगा. अलबत्ता इस पड़े हुए मै को कोई और आ कर देख सकता है. इस चेतना को कोई महसूस नहीं कर सकता, न ही पकड़ सकता, न इसमें गंध है न स्वाद है, न छूने योग्य है लेकिन इसके होने से ही “मै हूँ” इसका आभास है.
६ आईने के इस पर परिदृष्य बदल जाने पर आइना उसे उसी तरह दिखने लगेगा जिस तरह पहिले दिखा रहा था.
आईने का यह सच कोई अनोखा नहीं है. सब अच्छी तरह जानते हैं. यहाँ इस तथ्य को एक घटना की तरह लिया गया है जिससे माण्डुक्य उपनिषद में प्रतिपादित आत्मा के चतुष्पाद को समझने में आसानी होगी. इन चतुष्पादों की व्याख्या से ओंकार के सम्पूर्णता के लक्षणों को समझने में भी सहायता मिलेगी.
अष्टांग योग में के छटवें चरण में ध्यान की साधना बतायी गई है. ध्यानावस्था को प्राप्त करने में उक्त सिद्धांतों को समझने में बहुत आसानी होगी. ध्यान करने के लिए इसके पूर्व के पाँच चरणों का अभ्यास और व्यव्हार अपने आचरण में उतारना अत्यंत आवश्यक होगा. ध्यानावस्था योग का सबसे महत्वपूर्ण अंग है. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ध्यान साधना अपने अन्दर उतरने का प्रथम सोपान है. इसके पूर्व के पाँच चरण केवल शरीर को बाहर से तैयार करने के उद्यम है एवं बहिर्मुखी कृत्य है तथा अन्तर्मुखी होने की पूव की तयारी है. श्रीमद्भागवद्गीता में इस शरीर के चौबीस स्थूल-सूक्ष्म तत्व बताए हैं.
इनमे पाहिले बीस बहिर्मुखी हैं जबकि अंतिम चार तत्व मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार जो मिलकर अंतःकरण कहलाते है इस मानव देह के अन्तः पुर ही हैं. अध्यात्म इन विषयों के बिना समझा या व्यव्हार में लाया जाना असंभव है.
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माण्डूक्योपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। इसमें आत्मा या चेतना के चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
प्रथम दस उपनिषदों में समाविष्ट केवल बारह मंत्रों की यह उपनिषद् उनमें आकार की दृष्टि से सब से छोटा है किंतु महत्व के विचार से इसका स्थान ऊँचा है, क्योंकि इसमें आध्यात्मिक विद्या के सूत्र भर दिए गए है। इस उपनिषद् में ऊँ की मात्राओं की सूक्षम व्याख्या करके जीव और विश्व की ब्रह्म से उत्पत्ति और लय एवं तीनों का तादात्म्य अथवा अभेद प्रतिपादित हुआ है।
आईने के सच के घटना के आलोक में इसे ऐसे समझा जा सकता है.
आत्मा चतुष्पाद है अर्थात उसकी अभिव्यक्ति की चार अवस्थाएँ हैं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
1. जाग्रत अवस्था की आत्मा को वैश्वानर कहते हैं, इसलिये कि इस रूप में सब नर एक योनि से दूसरी में जाते रहते हैं। इस अवस्था का जीवात्मा बहिर्मुखी होकर "सप्तांगों" तथा इंद्रियादि 19 मुखों से स्थूल अर्थात् इंद्रियग्राह्य विषयों का रस लेता है। अत: वह बहिष्प्रज्ञ है।
2. दूसरी तेजस नामक स्वप्नावस्था है जिसमें जीव अंत:प्रज्ञ होकर सप्तांगों और 19 मुर्खी से जाग्रत अवस्था की अनुभूतियों का मन के स्फुरण द्वारा बुद्धि पर पड़े हुए विभिन्न संस्कारों का शरीर के भीतर भोग करता है।
3. तीसरी अवस्था सुषुप्ति अर्थात् प्रगाढ़ निद्रा का लय हो जाता है और जीवात्मा क स्थिति आनंदमय ज्ञान स्वरूप हो जाती है। इस कारण अवस्थिति में वह सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और अंतर्यामी एवं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और लय का कारण है।
4. परंतु इन तीनों अवस्थाओं के परे आत्मा का चतुर्थ पाद अर्थात् तुरीय अवस्था ही उसक सच्चा और अंतिम स्वरूप है जिसमें वह ने अंत: प्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ और न इन दोनों क संघात है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ और न अप्रज्ञ, वरन अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिंत्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, शांत, शिव और अद्वैत है जहाँ जगत्, जीव और ब्रह्म के भेद रूपी प्रपंच का अस्तित्व नहीं है (मंत्र 7)
ओंकार रूपी आत्मा का जो स्वरूप उसके चतुष्पाद की दृष्टि से इस प्रकार निष्पन्न होता है उसे ही ऊँकार की मात्राओं के विचार से इस प्रकार व्यक्त किया गया है कि ऊँ की अकार मात्रा से वाणी का आरंभ होता है और अकार वाणी में व्याप्त भी है। सुषुप्ति स्थानीय प्राज्ञ ऊँ कार की मकार मात्रा है जिसमें विश्व और तेजस के प्राज्ञ में लय होने की तरह अकार और उकार का लय होता है, एवं ऊँ का उच्चारण दुहराते समय मकार के अकार उकार निकलते से प्रतीत होते है। तात्पर्य यह कि ऊँकार जगत् की उत्पत्ति और लय का कारण है।
वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ अवस्थाओं के सदृश त्रैमात्रिक ओंकार प्रपंच तथा पुनर्जन्म से आबद्ध है किंतु तुरीय की तरह अ मात्र ऊँ अव्यवहार्य आत्मा है जहाँ जीव, जगत् और आत्मा (ब्रह्म) के भेद का प्रपंच नहीं है और केवल अद्वैत शिव ही शिव रह जाता है।
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