Friday, 4 November 2016

🤔अंधेरे का अध्यास😴



अन्धकार को सब कोसते हैं, प्रकाश की कामना सब करते हैं। क्या अन्धकार इतना बुरा है, अवांछित है, अनपेक्षित है? अन्धकार कोई स्वीकार नहीं करता।
वेद कहता है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" अर्थात् अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ। स्पष्ट है; अन्धकार को पहले स्वीकारता है, उसकी उपस्थिति को पूर्व में मौजूद होना भी पूरी तरह मानता है तभी तो वह उससे प्रकाश की ओर जाने को कहता है। प्रकाश आता है तो अन्धकार उसे जगह देता है। अन्धकार आता नहीं है पर प्रकाश ने कुछ समय तक के लिए उसकी जगह ऑकूपाय कर ली है। इसलिए कहना चाहिए कि अन्धकार उतना ही महत्व पूर्ण है जितना कि प्रकाश है। इसके बावजूद भी हम अंधकार से डरते क्यों हैं?
चौबीसों घण्टे प्रकाश रहा तो सो कब पाओगे। सिर्फ दो दिन पूरी तरह जाग कर देखो विक्षिप्तता के निकट पहुंच जाओगे। प्रकाश जीवन चलाने के लिए जरूरी है तो अंधकार जीवन बचाने के लिए जरूरी है। हमने पहले अंधकार को नहीं समझा और सीधा प्रकाश को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। एक यथार्थ यह है कि हम प्रकाश में प्रकाश को नहीं आस पास मौजूद अन्य वस्तुओं को देखते हैं जबकि अंधेरे में हम केवल अन्धकार को ही देखते हैं इस तरह कि जैसे अंधकार दर्शनीय हो। अनुभव कर के देखो अंधकार में आप प्रज्ञाचक्षु हो जाते हो, आपकी इंद्रियोँ की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। आपके कान दिशाओं का बारीकी से जानने लगते हैं। यह आभास तो होता है कि अंधेरे में हम कुछ नहीं देख रहे हैं जबकि हमारी आँखें खुली रहती है अौर खुली आँखों से तो हम देखते ही हैं; अर्थात् हम अंधेरे को देखते ही हैं।
प्रकाश हमें वस्तुस्थिति का बोध भले ही करा दे पर जरूरी नहीं कि वह शान्ति उपलब्ध करा दे अलबत्ता अंधकार में आस पास का खालीपन हमें हल्का महसूस करा सकता है। अंतरिक्ष स्वयं अंधकार से परिपूर्ण है इसलिये वहाँ यात्री जब विचरण करता है तो गहन शान्ति के सागर में तैरता है। एस्ट्रॉनाट बताते हैं कि अंतरिक्ष के अन्धमहासागर में जो शान्ति उपलब्ध है उसकी कल्पना भी धरती पर किया जाना संभव नहीं। अगर वहाँ कुछ चमकता दीख पड़ता है तो वे हैं दूरस्थ आकाशीय पिंड। लगता है कोई टिमटिमाते दिये अनन्त और गहन काले सागर में तैर रहे हैं।
हमें समझाया गया है कि प्रकाश जीवन है और अन्धकार तो मृत्यु है। परन्तु यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई एक पहलू वाला सिक्का हमें बताना चाहता हो, जैसे व्यक्ति को केवल सुख, आनन्द और जीवन ही मिलेगा। जो केवल जीवन माँगना चाहता है वह मृत्यु से बहुत डरता है लेकिन जो मृत्यु से पूर्णतः परिचित है वह जीवन जीने का आनन्द प्राप्त कर लेता है। जो प्रेम को पाना चाहता है वह एक पीड़ा को निमन्त्रण दे रहा है। इसके बगैर उसे प्रेम मिलेगा भी नहीं। जो माँ धरती पर एक जीवन लाना चाहती है वह एक प्रसव पीड़ा को निमंत्रण दे रही है। इसके बिना उसका अवतरण नहीं हो पाएगा। बरसात चाहिए तो एक तपन से गुजरना होगा। बादल बिना बिजली की प्रताड़ना के बरस नहीं पाएँगे।इसलिए प्रकाश को पाना चाहते हो तो अन्धकार को पहले स्वीकार करना होगा, उसकी सत्ता के बोध में सदैव रहना होगा। वह अभिषाप नहीं है। वह यथार्थ भी है और प्रकाश से अभिन्न भी है। अज्ञान और अन्धकार दोनों अनादि हैं। ज्ञान और प्रकाश परवर्ती है। प्राणी मात्र जीवन को प्राप्त करने के पूर्व अर्थात् जन्म के पूर्व लम्बी अवधि तक अन्धकार के महासागर में तैरता रहा है। यह कदापि संभव नहीं है कि उसका अस्तित्व सीधा प्रकाश में प्रकट हो जावे। वस्तुत: अन्धकार को प्रकृति के उपादानों से पृथक् मत समझो।

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