Thursday, 15 December 2016

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम  रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं। वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।

स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो जाती  हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है। स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में  दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ?  वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा। 

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं

ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥

एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं  "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं  हैरान था कि कर मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी पर आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।
यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल मैं रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।
दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में मैं ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं अद्वैत हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।

जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन  इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर देखें।

यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका साक्षी बना रहूँगा। यह काल का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है,आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।

मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

चित्त-दोष। ...अनवस्थित

एक खिलौने से एक बच्चा खेल रहा था। खिलौना बड़ा अजीब था, एक विदूषक की शक्ल-सूरत का, लंबा धड़ पर पैर नहीं थे। बस धड़ का निचला भाग बे पैंदे के लौटे जैसा। बच्चे ने उसे दाहिनी तरफ दबा कर जमीन पर  टिका दिया। लेकिन जैसे ही दबाव हटा विदूषक खड़ा हो गया जैसे मुँह चिढ़ा रहा हो कि कुछ भी प्रयास कर लो मैं फिर खड़ा हो जाऊँगा। चाहे जिस दिशा में चाहे जितना झुकाता वह वापस खड़ा हो जाता। बच्चे ने विदूषक के कान में जाकर पूछा कि जब तक मैं प्रयास करता हूँ तुम वैसे ही रहते हो और छोड़ते ही मेरा सारा प्रयास विफल हो जाता है, आखिर ऐसा क्यों? वह बोलता तो कुछ है ही नहीं बस करता ही करता है। असल में कम्पनी ने ही उसे ऐसा बनाया है। उसमें यह चंचलता भर दी है। विज्ञान में इसे ग्रेविटी टॉय कहते हैं। ग्रेविटी एक नैसर्गिक सिद्धान्त है। आदमी का नहीं प्रकृति का बनाया हुआ है। हमारा स्वभाव भी इसी तरह का है। इसे योग अथवा अध्यात्म में वृत्ति कहते हैं। जिस चित्त की वहाँ बात होती है वह यह विदूषक जैसा ही है। हम उसकी वृत्ति के निरोध करने में रत रहते हैं लेकिन प्रयास हटते ही वह पुनः अपनी वृत्ति में लौटने का प्रयास करता है। यह चित्त अन्तःकरण की क्रियाशील तीसरी और अन्तिम इकाई है। अन्तिम होने से सारी क्रियाएं यहाँ से सुपर कमाण्डो जैसी होती है। इसके बाद की इकाई बस कन्ट्रोल रूम है जिसे माण्डूक्य उपनिषद् ने स्पष्ट करके बताया है जिसे अहंकार कहा है। यह खुद तो कुछ करता नहीं है लेकिन इसके कहे आदेश के बिना कोई क्रिया अथवा कर्म असंभव है। ....


पतन्जलि योग सूत्र के समाधिपाद के तीसवें सूत्र में चित्त के दोषों में से नवाँ दोष बताया है-"अनवस्थितत्व"। मतलब चित्त का यह स्वभाव है कि आप उसकी स्थिति बदलने का प्रयास करते हैं तो भी वह वहाँ अवस्थित नहीं रहता, टिकता नहीं क्योंकि यह किसी अन्य स्थिति में रुक पाने का स्वभाव नहीं है।

Monday, 7 November 2016

अन्तर्यात्रा


आँख खुली है तो जगत दिखता है, बन्द करें तो दिखना बन्द हो जाता है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ जगत की ओर होती है तो वे सब सूचनाएँ भीतर की ओर भेजती ही रहती हैं; मन उसे पढ़ता रहता है फिर उसे जो करना है करता रहता है। न चाहे तो सूचनाएँ द्वार पर अटकी रह जाती हैं। भीतर जाएँगी तो प्रभाव होगा अन्यथा कुछ भी होता रहे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उबलता हुआ पानी थर्मस फ्लास्क में भर कर फ्रिज में रख दें तो बाहर ठंडक होगी परन्तु फ्लास्क के भीतर गर्मी बनी रहेगी क्योंकि बाहर से आने वाली ठंडक में अवरोध उत्पन्न हो गया।
हमारे शरीर के दो हिस्से किए जाएँ जिसमें से एक हो बहिःकरण और दूसरा अन्तःकरण। बहिःकरण है हमारा हाड़-मांस का स्थूल शरीर, समस्त इन्द्रियाँ, प्राण आदि तथा अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। अन्तःकरण और बहिःकरण ओत-प्रोत है इन्हें अलग अलग नहीं किया जा सकता।8 फिर भी बहिर्जगत और अन्तर्जगत को अपने-अपने कर्मक्षेत्रों में निरोध किया जा सकता है अर्थात् दोनों के अपने अपने क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रमों को एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना उन्हें अपनी अपनी जगह बरकरार रहने दिया जा सकता है। जैसे फ्रिज की ठण्डक  फ्रिज में रहे और थर्मस फ्लास्क की भीतरी ऊष्मा भीतर रहे। इसमें फ्लास्क का ढक्कन अत्यन्त महत्वपूर्ण बैरियर है। ठीक इसी तरह शरीर में यह स्थान है मन का द्वार है। बहिःकरण में चल रहे आवगों, संवेगों, सुखों, दुःखों और संवेदनाओं को अन्तःकरण तक पहुंचने से रोक देना हँसी खेल नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में बताए गए समत्व योग से यह सिद्ध हो सकता है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
हे धनञ्जय ! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्दिमें समान बुद्धिवाला होकर, योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोंको कर; यही समत्व योग कहलाता है ।। ४।।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।६/३२।।
हे अर्जुन जो पुरुष अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है वह परम योगी माना गया है।
हम यह नहीं जानते कि बहिःकरण से शक्तिशाली अन्तःकरण होता है। हमारा बाहर सब कुछ भीतर के संकल्पों और निर्देशों से ही क्रियान्वयित होता है। अर्जुन ने निश्चय किया कि उसे युद्ध करना है और वह युद्ध भूमि में उपस्थित हो गया; यह भीतर का निर्णय था। सेना में दोनों ओर अपने लोग ही मरने-मारने के लिए आमने सामने खड़े हो गए यह देख कर  उसे भीतर ही ग्लानि हुई और वह कहने लगा कि मुझे युद्ध नहीं करना; यह भीउसके अन्तःकरण से ही निर्णय आया था। और अन्त में वह गीतोपदेश सुनता है और कहता है स्मृतिर्लब्धा, गतसंदेहाः यह भी भीतर ही भीतर घटित हुआ था। अर्थात् जो कुछ बाहर हुआ वह सब अन्दर ही अन्दर, अन्तर्जगत में घटित संयोजनों का ही परिणाम था। युद्ध जैसे कठोरतम निर्णय बाहर के निर्णय नहीं थे। वे सब अन्तर्जगत के उद्वेलन और परिणाम थे।
मन के द्वार को यदि सम्यक् रूप से रेगयूलेट किया जा सके तो विलक्षण उपलब्धियाँ हो सकती हैं।

           अनवरत.......

Friday, 4 November 2016

आईने का सच


आईने कई तरह के होते हैं. सरल-सपाट, उथले-उभरे, धंसे-गहरे. सरल-सपाट आइना दर्शक की छबि विकृत नहीं करता, उभरे उथले आईने पास की वास्तु दूर और छति बताते है वहीँ धंसे-गहरे आईने छबी को उल्टा-पुल्टा कर देते हैं. आईने की इन छबियों में जीवन एवं दर्शन के कुछ साम्य अवस्थाएँ बताती हैं. यह देखने के लिए हमें आईने के सामान्य गुणों को जानना होगा .
यहाँ हम केवल सरल सपाट आईने की ही चर्चा करेंगे. लोग कहते हैं आइना झूठ नहीं बोलता. यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है केवल आभास है. यह ज्यादातर सच और थोडा थोडा झूंठ दिखाता है. चलिए आईने के सामने हम एक परिदृश्य के साथ खड़े होते है. नीचे जमीन और ऊपर आसमान है. मेरे दाएं हाथ में फूलों का एक गुलदस्ता है. मैं यहाँ परमात्मा की प्रार्थना गा रहा हूँ. मेरे आगे-पीछे दायें-बाएं लोग आ-जा रहे हैं. मेरे पीछे लगे एक नल से पानी बह रहा है, बहता हुआ पानी मेरे पावों को गीला कर रहा है. गुलदस्ते से भीनी-भीनी खुशबू आ रही है. कुछ लोग मुझ से आगे आईने की ओर और कुछ मेरे पीछे आईने से दूर जा रहे हैं. वातावरण बिजली से चालित बल्ब की रौशनी से प्रकाशित हो रहा है.
आईने के भीतर और बाहर के परिदृश्य में जो झूंठ और सच दिखाई दे रहा है वह कुछ इस प्रकार है –
१ आईने में जमीन नीचे, आसमान ऊपर ही लेकिन दायें की बजाय बाएं हाथ में गुलदस्ता दिखाई दे रहा है. सर ऊपर, पैर नीचे .जो लोग आईने की ओर जा रहे हैं वे आते हुए लेकिन मुझसे पीछे जाते हुए वास्तव में दूर ही जाते दिखाई दे रहे हैं. इसी तरह मेरे बाएं हाथ की ओर आते हुए लोग आईने में मेरे दाहिने हाथ के करीब आते दीख रहे हैं.
२ आइना एक दीवार पर लगा है, दीवार के उस पार एक असत्य अर्थात सदैव न रहने वाला संसार दिखी दे रहा है. मैं सामने खड़ा हूँ तो आइना मुझे लेकिन मेरे हट जाने पर दूसरा व्यक्ति आ जाएगा तो वह उसे दिखाने लगेगा. मेरी उपस्थिति मेरे आईने के सामने होने पर ही आइना दिखा सकेगा लेकिन वहीँ मेरा अस्तित्व रहने पर भी आईने के सामने न होने पर आइना मुझे नहीं दिखा सकेगा.
३ मेरे पैर पानी मे गीले होने से ठंडक मह्सूस करा रहे हैं. बहता पानी आईने के उस पार बहता दीख रहा है लेकिन आईने को गीला नहीं कर रहा है. गुलदस्ते के फूलों की महक आईने में नहीं हो सकती,इन्हें केवल इस पार ही महसूस किया जा सकता है, वहां केवल आभासित हो रहा है. मेरे चेहरे पर आये भाव मुझे अपनी आँखों से इस पार नहीं लेकिन उस पार आईने में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं.
४ आईने के इस पार और उस पार दृश्य रौशनी में दिखाई दे रहा है और रौशनी के जाते ही दिखाई देना बंद हो जाते हैं.इस स्थिति में मैं भी हूँ आइना भी है. सब कुछ है लेकिन रौशनी के अभाव में एक मौन खड़ा हो जाता है, आभास ही नहीं होता. रौशनी के आते ही फिर दिखाई देने लगता है.
इस स्थिति में मैं अन्दर सम्पूर्ण रूप से वही हूँ जीवन वैसा ही चल रहा है, स्वास है, धड़कन है, सभी इन्द्रियां अपनी- अपनी जगह हैं. उनके विषय ग्रहण करने की क्षमता उनमें मौजूद भी है, अंतर केवल इतना है कि वे फ़िलहाल आईने के उस पार कोई हरकत नहीं देख पा रही हैं, अगर रौशनी बहाल हो जाए तो फिर वही चलने लग जावेगा.
५ आईने के इस पार मैं हूँ मैं स्वयं जीवित हूँ यह जो जीवन की चेतना है मेरे शरीर के जीवित होने का कारन और प्रमाण है. आईने के इस पार मैं जीवन के स्रोत चेतना को लिए घूमता हूँ लेकिन चेतना का साकार दर्शन संभव नहीं. चेतना के नहीं रहने पर यह शरीर सभी भौतिक तत्वों के रहते हुए भी वैसा कुछ नहीं कर पाएगा जो पहले कर रहा था. न आईने के इस पार कुछ भी महसूस कर सकेगा न आईने के उस पार उसे कुछ महसूस होता हुआ जाना जा सकेगा. अलबत्ता इस पड़े हुए मै को कोई और आ कर देख सकता है. इस चेतना को कोई महसूस नहीं कर सकता, न ही पकड़ सकता, न इसमें गंध है न स्वाद है, न छूने योग्य है लेकिन इसके होने से ही “मै हूँ” इसका आभास है.
६ आईने के इस पर परिदृष्य बदल जाने पर आइना उसे उसी तरह दिखने लगेगा जिस तरह पहिले दिखा रहा था.
आईने का यह सच कोई अनोखा नहीं है. सब अच्छी तरह जानते हैं. यहाँ इस तथ्य को एक घटना की तरह लिया गया है जिससे माण्डुक्य उपनिषद में प्रतिपादित आत्मा के चतुष्पाद को समझने में आसानी होगी. इन चतुष्पादों की व्याख्या से ओंकार के सम्पूर्णता के लक्षणों को समझने में भी सहायता मिलेगी.
अष्टांग योग में के छटवें चरण में ध्यान की साधना बतायी गई है. ध्यानावस्था को प्राप्त करने में उक्त सिद्धांतों को समझने में बहुत आसानी होगी. ध्यान करने के लिए इसके पूर्व के पाँच चरणों का अभ्यास और व्यव्हार अपने आचरण में उतारना अत्यंत आवश्यक होगा. ध्यानावस्था योग का सबसे महत्वपूर्ण अंग है. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ध्यान साधना अपने अन्दर उतरने का प्रथम सोपान है. इसके पूर्व के पाँच चरण केवल शरीर को बाहर से तैयार करने के उद्यम है एवं बहिर्मुखी कृत्य है तथा अन्तर्मुखी होने की पूव की तयारी है. श्रीमद्भागवद्गीता में इस शरीर के चौबीस स्थूल-सूक्ष्म तत्व बताए हैं.

इनमे पाहिले बीस बहिर्मुखी हैं जबकि अंतिम चार तत्व मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार जो मिलकर अंतःकरण कहलाते है इस मानव देह के अन्तः पुर ही हैं. अध्यात्म इन विषयों के बिना समझा या व्यव्हार में लाया जाना असंभव है.
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माण्डूक्योपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। इसमें आत्मा या चेतना के चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
प्रथम दस उपनिषदों में समाविष्ट केवल बारह मंत्रों की यह उपनिषद् उनमें आकार की दृष्टि से सब से छोटा है किंतु महत्व के विचार से इसका स्थान ऊँचा है, क्योंकि इसमें आध्यात्मिक विद्या के सूत्र भर दिए गए है। इस उपनिषद् में ऊँ की मात्राओं की सूक्षम व्याख्या करके जीव और विश्व की ब्रह्म से उत्पत्ति और लय एवं तीनों का तादात्म्य अथवा अभेद प्रतिपादित हुआ है।
आईने के सच के घटना के आलोक में इसे ऐसे समझा जा सकता है.
आत्मा चतुष्पाद है अर्थात उसकी अभिव्यक्ति की चार अवस्थाएँ हैं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
1. जाग्रत अवस्था की आत्मा को वैश्वानर कहते हैं, इसलिये कि इस रूप में सब नर एक योनि से दूसरी में जाते रहते हैं। इस अवस्था का जीवात्मा बहिर्मुखी होकर "सप्तांगों" तथा इंद्रियादि 19 मुखों से स्थूल अर्थात् इंद्रियग्राह्य विषयों का रस लेता है। अत: वह बहिष्प्रज्ञ है।
2. दूसरी तेजस नामक स्वप्नावस्था है जिसमें जीव अंत:प्रज्ञ होकर सप्तांगों और 19 मुर्खी से जाग्रत अवस्था की अनुभूतियों का मन के स्फुरण द्वारा बुद्धि पर पड़े हुए विभिन्न संस्कारों का शरीर के भीतर भोग करता है।
3. तीसरी अवस्था सुषुप्ति अर्थात् प्रगाढ़ निद्रा का लय हो जाता है और जीवात्मा क स्थिति आनंदमय ज्ञान स्वरूप हो जाती है। इस कारण अवस्थिति में वह सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और अंतर्यामी एवं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और लय का कारण है।
4. परंतु इन तीनों अवस्थाओं के परे आत्मा का चतुर्थ पाद अर्थात् तुरीय अवस्था ही उसक सच्चा और अंतिम स्वरूप है जिसमें वह ने अंत: प्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ और न इन दोनों क संघात है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ और न अप्रज्ञ, वरन अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिंत्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, शांत, शिव और अद्वैत है जहाँ जगत्, जीव और ब्रह्म के भेद रूपी प्रपंच का अस्तित्व नहीं है (मंत्र 7)
ओंकार रूपी आत्मा का जो स्वरूप उसके चतुष्पाद की दृष्टि से इस प्रकार निष्पन्न होता है उसे ही ऊँकार की मात्राओं के विचार से इस प्रकार व्यक्त किया गया है कि ऊँ की अकार मात्रा से वाणी का आरंभ होता है और अकार वाणी में व्याप्त भी है। सुषुप्ति स्थानीय प्राज्ञ ऊँ कार की मकार मात्रा है जिसमें विश्व और तेजस के प्राज्ञ में लय होने की तरह अकार और उकार का लय होता है, एवं ऊँ का उच्चारण दुहराते समय मकार के अकार उकार निकलते से प्रतीत होते है। तात्पर्य यह कि ऊँकार जगत् की उत्पत्ति और लय का कारण है।
वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ अवस्थाओं के सदृश त्रैमात्रिक ओंकार प्रपंच तथा पुनर्जन्म से आबद्ध है किंतु तुरीय की तरह अ मात्र ऊँ अव्यवहार्य आत्मा है जहाँ जीव, जगत् और आत्मा (ब्रह्म) के भेद का प्रपंच नहीं है और केवल अद्वैत शिव ही शिव रह जाता है।

🤔अंधेरे का अध्यास😴



अन्धकार को सब कोसते हैं, प्रकाश की कामना सब करते हैं। क्या अन्धकार इतना बुरा है, अवांछित है, अनपेक्षित है? अन्धकार कोई स्वीकार नहीं करता।
वेद कहता है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" अर्थात् अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ। स्पष्ट है; अन्धकार को पहले स्वीकारता है, उसकी उपस्थिति को पूर्व में मौजूद होना भी पूरी तरह मानता है तभी तो वह उससे प्रकाश की ओर जाने को कहता है। प्रकाश आता है तो अन्धकार उसे जगह देता है। अन्धकार आता नहीं है पर प्रकाश ने कुछ समय तक के लिए उसकी जगह ऑकूपाय कर ली है। इसलिए कहना चाहिए कि अन्धकार उतना ही महत्व पूर्ण है जितना कि प्रकाश है। इसके बावजूद भी हम अंधकार से डरते क्यों हैं?
चौबीसों घण्टे प्रकाश रहा तो सो कब पाओगे। सिर्फ दो दिन पूरी तरह जाग कर देखो विक्षिप्तता के निकट पहुंच जाओगे। प्रकाश जीवन चलाने के लिए जरूरी है तो अंधकार जीवन बचाने के लिए जरूरी है। हमने पहले अंधकार को नहीं समझा और सीधा प्रकाश को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। एक यथार्थ यह है कि हम प्रकाश में प्रकाश को नहीं आस पास मौजूद अन्य वस्तुओं को देखते हैं जबकि अंधेरे में हम केवल अन्धकार को ही देखते हैं इस तरह कि जैसे अंधकार दर्शनीय हो। अनुभव कर के देखो अंधकार में आप प्रज्ञाचक्षु हो जाते हो, आपकी इंद्रियोँ की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। आपके कान दिशाओं का बारीकी से जानने लगते हैं। यह आभास तो होता है कि अंधेरे में हम कुछ नहीं देख रहे हैं जबकि हमारी आँखें खुली रहती है अौर खुली आँखों से तो हम देखते ही हैं; अर्थात् हम अंधेरे को देखते ही हैं।
प्रकाश हमें वस्तुस्थिति का बोध भले ही करा दे पर जरूरी नहीं कि वह शान्ति उपलब्ध करा दे अलबत्ता अंधकार में आस पास का खालीपन हमें हल्का महसूस करा सकता है। अंतरिक्ष स्वयं अंधकार से परिपूर्ण है इसलिये वहाँ यात्री जब विचरण करता है तो गहन शान्ति के सागर में तैरता है। एस्ट्रॉनाट बताते हैं कि अंतरिक्ष के अन्धमहासागर में जो शान्ति उपलब्ध है उसकी कल्पना भी धरती पर किया जाना संभव नहीं। अगर वहाँ कुछ चमकता दीख पड़ता है तो वे हैं दूरस्थ आकाशीय पिंड। लगता है कोई टिमटिमाते दिये अनन्त और गहन काले सागर में तैर रहे हैं।
हमें समझाया गया है कि प्रकाश जीवन है और अन्धकार तो मृत्यु है। परन्तु यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई एक पहलू वाला सिक्का हमें बताना चाहता हो, जैसे व्यक्ति को केवल सुख, आनन्द और जीवन ही मिलेगा। जो केवल जीवन माँगना चाहता है वह मृत्यु से बहुत डरता है लेकिन जो मृत्यु से पूर्णतः परिचित है वह जीवन जीने का आनन्द प्राप्त कर लेता है। जो प्रेम को पाना चाहता है वह एक पीड़ा को निमन्त्रण दे रहा है। इसके बगैर उसे प्रेम मिलेगा भी नहीं। जो माँ धरती पर एक जीवन लाना चाहती है वह एक प्रसव पीड़ा को निमंत्रण दे रही है। इसके बिना उसका अवतरण नहीं हो पाएगा। बरसात चाहिए तो एक तपन से गुजरना होगा। बादल बिना बिजली की प्रताड़ना के बरस नहीं पाएँगे।इसलिए प्रकाश को पाना चाहते हो तो अन्धकार को पहले स्वीकार करना होगा, उसकी सत्ता के बोध में सदैव रहना होगा। वह अभिषाप नहीं है। वह यथार्थ भी है और प्रकाश से अभिन्न भी है। अज्ञान और अन्धकार दोनों अनादि हैं। ज्ञान और प्रकाश परवर्ती है। प्राणी मात्र जीवन को प्राप्त करने के पूर्व अर्थात् जन्म के पूर्व लम्बी अवधि तक अन्धकार के महासागर में तैरता रहा है। यह कदापि संभव नहीं है कि उसका अस्तित्व सीधा प्रकाश में प्रकट हो जावे। वस्तुत: अन्धकार को प्रकृति के उपादानों से पृथक् मत समझो।

हम सब कौन हैं?


😨हम सब कौन हैं?😊

हमारी जीवन यात्रा देह से शुरू होती है और देह पर ही समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि एक फुट भर का आदमी; पाँच सात पौंड का आदमी अपने शरीर को पालते - पोसते जीवन भर उसके लिये करता ही रहता है और पार्थिव से चल कर वापस पार्थिव तक पहुँच जाता है। यदि यह केवल ऐसा ही होता तो सब के सब एक से ही होते। हम सब एक दूसरे से नितान्त अलग क्यों हैं? हम सब में कुछ कुछ मिलता जुलता है और कुछ कुछ एक दम अलग। जो मिलता जुलता है वह है- शरीर सप्त धातुओं से मिल कर बना है। सामान्यतः शरीर के अवयव जो दिखाई देते हैं; जैसे आँख, नाक, कान, हाथ,पैर आदि सबके हैं। सब  मनुष्योंमें काम करने खाने पीने सोने जागने की, व्यवहार करने की क्षमता होती है। अन्तर केवल मात्रा, गुणवत्ता, शक्ति आदि का होता है। 

📙वेदान्त इसे व्यवस्थित रूप से पारिभाषित करता है। सबमें स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि; ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि तात्विक रूप से मौजूद है। सभी लोग जन्मते हैं और अन्त में सब अवसान को उपलब्ध हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे २४ तत्व जड़ अर्थात् बेजान बताए हैं। ये सभी एक कम्पलीट मशीन की तरह असेम्बल्ड हैं और बस पाॅवर मिलते ही यह मशीन अपने कार्य करने में सक्षम हो जाएगी। अभी यह असेम्बली पार्थिव ही है। जन्मते समय छोटी थी और क्रमशः कम ज्यादा होती रहती है। केवल एक तत्व "चेतन" है जिससे यह जीवित है। पार्थिव में यही संयुक्त होता है और अन्त में जीवात्मा विलग हो जाता है। शरीर अवस्थाओं से गुजरता है लेकिन यह चेतन अविच्छिन्न है, अपरिवर्तनीय है, अखण्ड है, अतुल्य है, उसके जैसा केवल वही है। चेतना उसका ही प्रभाव है, चेतना उसके कारण ही है, हम उसे ही जीवन तत्व कहते हैं। वही परमात्म सत्ता मुझमें है, तुम में है, उन में है, सब में हैं। सब के सब अपने आप में अलग भले ही दीख रहे हो पर अगर सब में तात्विक रूप से कॉमन कुछ है तो केवल वह आत्मा है। आत्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्म है वही सत्य है, वही नित्य है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥२२॥

इस देह में स्थित आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है । वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीव रुप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा कहा गया है ।
जगत अथात् इस सृष्टि के पू;र्व भी वही था, अभी वर्तमान है, सदैव वही रहेगा भी। वह इन तीनों कालों के परे भी है। काल से अबाधित है।

ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १॥ 
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ माण्डूक्य उपनिषद्/२॥ 

“अहम आत्मा गुडाकेश सर्व भूताशय स्थितः ” अर्थात् ; हे अर्जुन ! मैं सभी प्राणियों में स्थित आत्मा हूँ। आत्मा ही परमात्मा है ,यह भगवान का उपदेश है। आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग सत्ता नहीं है। यदि तुम “आत्मस्मरण ” रखते हैं ,तो सभी के अंदर “एक” परमात्मा की अनुभूति होगी ।एकत्व की अनुभूति होगी। 

वास्तव में तो तुम ही ब्रह्म हो। तुम्हारा जो नाम है वह इस शरीर की संज्ञा है। जो तुम असल में हो वह अनाम ही हो। आत्मा अमूर्त है। आत्मा ब्रह्म है। अद्वैत है। इसलिये तात्विक रूप से सब के सब अभिन्न है।
“अयं आत्मा ब्रह्म ” -यह आत्मा ही परमात्मा है।।उपनिषद्।।
"ज्ञानात् एव तू कैवल्यं" इस बात को समझ लेना कैवल्य का जान लेना है और 
ही तुरीय है, यही परमात्म सत्ता का बोध है।

निवेदक
रामनारायण सोनी

Saturday, 29 October 2016

😋प्रसाद का माधुर्य

 😋प्रसाद का माधुर्य☺

मंदिर के भीतर लड्डू जाता है पर लौट कर प्रसाद आता है। कमाल लड्डू का नहीं, मंदिर का नहीं, मूरत का नहीं, पुजारी का नहीं, कमाल है आपकी श्रद्धा का, विश्वास का आस्था का, मान्यता का और प्रेम का।
श्रद्धा नहीं तो प्रेम नहीं, विश्वास नहीं तो प्रेम टिकता नहीं, आस्था नहीं तो प्रेमी बंधता नहीं और मान्यता नहीं तो लड्डू अंदर जाएगा और टूटा - फूटा लड्डू ही बाहर आवेगा। लड्डू बाहर आकर मीठा तो होगा लेकिन उसमे माधुर्य तभी होगा जब आप उस देवता और उसके देवत्व से प्रेम करोगे। मीठा जबान तक मिठास देगा परन्तु प्रेम आपके मन को मीठा कर देगा। क्या कभी यह महसूस किया कि  प्रसाद हाथ पर आता है और हृदय उस देवता के पास दौड़ जाता है। आप श्रद्धा और प्रेम से भर जाते हो। जिसने लडडू खाया उसने बस कवल लड्डू खाया लेकिन जिसने प्रसाद खाया उसने अपने मन को मीठी खुराक पहुँचा दी। यह जो मन तक पहुंची मिठास है यही "माधुर्य" है। आप कहीं भी खड़े हो मन का माधुर्य आपको अपने देवता के पास ले जाकर खड़ा कर देगा, देवता में प्रेम और बढ़ जावेगा। आपको पहले तो लगेगा कि आप देवता के पास पहुँच गये हो लेकिन फिर तुरन्त यह भी लगेगा कि प्रसाद में देवता का आशीष और स्नेह घुल कर आ गया है और इसके साथ ही वह आपके हृदय को गुदगुदा रहा है। आपका हृदयाकाश एक अप्रतिम आलोक से भर गया है। प्रसाद ने आपको आपके देवता से जोड़ दिया है। यह प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और आस्था के रॉ मटेरियल से बना सेतु है।
इसलिए.....
लडडू की मिठास में मत अटको हृदय को प्रसाद के माधुर्य से भर डालो।

गुरु अमृत की खान

☝गुरु अमृत की खान☝

मैने सुना है - गुरू गाय है। दुधारू गाय। गाय के स्तनों में भरा दूध तब तक बाहर नहीं आता है जब तक उसका बछड़ा दूध पीने नहीं आता।
यह कपाट उसकी स्नेह मयी ममता से ही खुलता है। खुला ही रहता है जब तक बछड़ा तृप्त नहीं हो जाता। माँ पिलाती रहती है बछड़ा पीता चला जाता है। किसी को दूध दिखाई नहीं देता है।
एक तरफ स्रोत है , ममत्व है, देने का ही भाव है। दूसरी दूसरी तरफ ललक है, प्यास है, अनुरक्ति है और ग्रहण करने की चाह है।
मैने तो यह भी सुना है कि अगर गाय का आँचल (मालवा में गाय के स्तनों को आँचल कहते हैं) दूध से भरा हो और बछड़ा उसे न पिए तो उसके आँचल में दर्द होने लगता है? कहना बड़ी बात नहीं होगी कि दुधारू गाय को भी बछड़े की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसके ऊपर यह भी सत्य है कि बछड़े को दूध उसकी माँ ही पिलाएगी। यह रिश्ता है ममत्व का, दाता का, करुणा का, प्यास का, प्रेम का।

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मैने यह भी सुना है कि गुरु बहती गंगा है। बीच में धार बहती है दोनों ओर रेत ही रेत है। सूखी रेत। किसी को प्यास लगी उसने १००-२०० मीटर दूर रेत में गड्ढा बनाया तो वह देखता है कि निर्मल, स्वच्छ नीर छन छन कर गड्ढे में तैयार है। गंगा को पता ही नहीं कौन आया और अपनी प्यास बुझा गया। लेकिन गंगा में जल है तो पोखर में पानी होगा, पोखर तब होगा जब कोई प्यासा होगा और पोखर तब होगा जब प्यास होगी, पोखर तब होगा जब प्यासा उसे खोदने का यत्न करेगा, और प्यास तब बुझेगी जब प्यासा जल पिएगा। "जल अजस्र होगा।" चाहे जितना पिए, पोखर भरता जाएगा। गंगा अपनी धारा ले कर कहीं बहती रहे। प्यासे के लिए वह रेत के भीतर से बह कर आवेगी। किसी को पता नहीं चलेगा गंगा वहाँ कैसे पहुँच गई। यहाँ रिश्ता है गंगा का और प्यासे का। प्यासे के विश्वास का कि पोखर में गंगा आवेगी, उसकी प्यास बुझाएगी। एक तृप्ति तक ले जाएगी।

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मैने यह भी सुना है कि गुरू सितार है। कोई दूसरा सितार कहीं पास में रखा है। दोनों सितारों के तारों में अनुदैर्य का साम्य हो गया। अनुदैर्य याने वे समान फ्रीक्वेन्सी पर ट्यून्ड हैं। पहला सितार बजना प्रारंभ करता है। उसमें से स्वर लहरियाँ निकलती हैं। यह नाद है। यहाँ सप्तक है। सुरम्य तरंगें वातावरण गूँजती है। तरंगें दूसरे सितार तक पहुंचती हैं तब वह दूसरा सितार अपने आप बज उठता है। उसे कोई नहीं बजा रहा पर  अनुगूँज से ही बज उठता है। पहले सितार को पता ही नहीं चला कि दूसरा सितार बज उठा है।
बस वह मुख्य सितार तो बज रहा है, बजता जा रहा है। उसमें नाद है। नाद तो असल में ब्रह्म है। इसलिये यह ब्रह्मनाद ही है। जो बजाए से बजे वह तरंग है लेकिन कबीर कह गया कि जो बिना बजाए बज गया वही अनहद है। यहाँ रिश्ता है सितारों का, उनकी ट्यूनिंग का, नाद का, अनुनाद का, हद से अनहद-नाद का।

🛂रिश्ता🛐
रिश्ता गाय-बछड़े का, रिश्ता गंगा से प्यासे का, रिश्ता सितार-दर-सितार का-- रिश्ता है सद्गुरू से शिष्य का।

"वैदिक मनोविज्ञान"

☺"वैदिक मनोविज्ञान"☺

यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१

भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

१.जाग्रत अवस्था में.....

घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी  रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।

हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
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"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
अगले अंक में.....