Thursday, 22 September 2016

बड़ी समस्या, छोटे-छोटे हल

बड़ी समस्या, छोटे-छोटे हल

घर का दरवाजा घर से छोटा, दरवाजे पर लगने वाला ताला दरवाजे से छोटा और इस ताले से भी छोटी होती है इसकी कुंजी। कहाँ विशाल घर और कहाँ छोटी सी कुंजी। घर की सुरक्षा की पहली और अंतिम जिम्मेदारी कुंजी की ही है। कुंजी पूरा घर खोल सकती है। कुंजी न हो तो घर कैसे बन्द हो और कैसे खुले। एक बात और है कि घर पर ताला लागा हो और कुंजी न हो तो अपना मकान भी अपने काम का नहीं।
कुंजी की खास बात यह है कि वह एक बारीक से छिद्र से ताले के भीतर प्रवेश करती है और वहीं अपना काम करती है, वहाँ जाकर ताले के भीतरी भाग में संपूर्ण चक्कर लगाती है। उसे इस प्रकार बनाया गया है कि ताले के भीतरी पुर्जों में सधी हुई मात्रा में काम करती है।
देखो!  जितना ख्याल मकान का रहे उतना ही कुंजी का भी रहे।
जिस तरह मकान को खोलने के लिए छोटी सी कुंजी कमाल का काम करती है उसी तरह बड़ी बड़ी समस्याओं का हल छोटी छोटी बातों से, छोटे छोटे सुविचारों से संभव है। वे हमारे भीतर जा कर कुंजी की तरह काम करते है। इस प्रकार आवश्यकता है सम्यक सोच की,आवश्यकता है सम्यक दृष्टि की, सम्यक प्रकार से समस्या के समाधान में विचारों का उपयोग करने की।

परम चेतना

"परम चेतना"
एक आदमी हरि प्रसाद चौरसिया के घर इस नीयत से चोरी करने घुस गया कि इनकी बॉंसुरी से मधुर संगीत झरता है। वहॉ से उसने चार-पाँच बँसुरियाँ चुरा ली और एक संगीत संध्या में बजाने पहुँच गया। उस बिचारे को पता नहीं था कि वाँसुरी में स्वर उस बाँस से नहीं अपितु वादक के हृदय से प्रारंभ हो कर बॉंसुरी के छिद्रों से बाहर निकलते हैं। वस्तुतः बाँसुरी उन स्वरों की अभिव्यक्ति का साधन है जो हृदय की भूमि पर लहलहा रहे हैं। वेद कहता है --
"ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्टितम्...।"
हे दयामय ! मुझे वरदान दो कि वाणी मेरे मन में प्रक्तिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। साधक को पहले वाणी को हृदय में प्रतिष्ठित करना होगा, फिर मन और वाणी का तादात्म्य पाना होगा और तब लय प्राप्त होगी। लय तो योग है ही। जो हृदय मे बैठ जाएगी वही बाहर आवेगी। वाणी तो स्पन्दन है, स्पन्दन ही सुर है, सुर ही हवा पर सवार होते है। यह जगत वाणी के विस्तार का स्थान है।
एक बात और इसके भी ऊपर है वह यह कि इसके मूल कारण में परम चैतन्य है। बिना चेतना का हरिप्रसाद चौरसिया कोई बाँसुरी नहीं बजा सकेगा।
मेरे जीवन की बॉसुरी भी आत्मा की चेतना ही से बज रही है। जितनी भी बाँसुरियाँ है सब की सब उसी चेतना ही से तो बज रही है। बाँसुरी का प्राण रंध्र चेतना की फूँक पाता है फिर वह सात निर्गम द्वारो से जगत में प्रवेश करती है। जो स्वर जगत सुनता है उसका मूल कारण तो चेतना की फूँक ही है। हमें लगता है इसे चौरसिया जी ही बजा रहे है। असल में तो ...."निमित्त मात्रं शरीराणि।"

लघु चिन्तन

आज का लघु चिन्तन
धरती पर ये प्राणी  हमें कुछ सिखाते हैं:---

१, हमारी सुबह और शाम कैसी हो, बरगद के झुरमुट में चहचहाते पंछियों से सीखें।
२, उल्लू को हम चाहे जितना कोसें, वह अन्धकार में भी जीवन ढूँढ लेता है।
३, चमगादड़ भले ही उल्टी लटकती रहती है पर वह कमाल का राडार है।
४, कोई सामूहिकता, चक्रव्यूहात्मक आक्रमण और सशक्त टीम वर्क सीखना चाहे तो जंगली कुत्तों से सीखे।
५, गाय की जुगाली से एकाग्रता और चिन्तन
सीखें।
६, मोर और लार्क से आनन्द को उत्सव बनाना सीखें।
७, शेर से ''स्वयमेव  मृगेन्द्रता'' सीखें।
८, कोयल सा वाणी का माधुर्य और भला कहाँ।
९, बकरी से सीखें काँटों के बीच से भी अपना भोजन चुन लेना।
१०, मधुमक्खी से सीखें कड़वे-मीठे फूलों से मधुर-मधु बनाना।
११, गिद्ध से सीखें दूरदृष्टि और पैनी दृष्टि रखना।
१२, चकोर से सीखें लक्ष्य साधना और धारणा में स्थित होना।
१३, कंगारू से सीखें अपनी सन्तान को संग और सुरक्षित रखना।
१४, तोते से सीखें शुभवाक्यों को कंठस्थ करना

आदमी समय को रोकने के लिये घण्टाघर की सुई पर लटक भी जाए तो न तो वक्त रुकेगा न वक्त की बरबादी।

डर का डर

"डर का डर"

"तावद् भयस्य भेतव्यम्, यावद् भयम् अनागतम्।
आगतम् तु भयम् विक्ष्य, नरः कुर्यात् यथोचितम्।।"

"तावद् भयस्य भेतेव्यं" अर्थात् "तब तक भय से भय खाना।"
डर से बड़ा डर का डर है। हम किसी सामान्य स्थिति में खड़े हैं और डर अभी जब दूर ही है, वह एक दम सामने नहीं खड़ा है तब उसके पूर्वानुमान में ही डर बैठ गया यही डर का डर है। डर हर प्राणी का नैसर्गिक स्वभाव है।
नाव अभी साहिल से बंधी है और तेज चलती हवाएँ डर पैदा कर रही है लगता है कि तबाही का आलम बस आने ही वाला है यह सीधा तूफान का डर नहीं है उसके डर का पूर्वानुमान किया और हम डर गए। तूफान जब आवेगा तब उसका डर वास्तविक डर होगा। जैसे कि  बादल गरजने से पूर्व बिजली की चमक को देख कर दिल दहला देने वाली गरज का  अनुमान किया जाना, मूसलाधार बारिश के अनुमान करके डरने जैसा है, वह अज्ञात डर है जो अभी सामने आया ही नहीं है।
अक्सर देखा गया है कि डर का डर ही आदमी को कुण्ठित कर डालता है और वह बिना लड़ाई लड़े ही हार जाता है। जब चूहा अपने बिल से बाहर दूर निकल आता है और बाहर सपाट मैदान हो छुपने की कहीं जगह न हो ऐसे में सामने बिल्ली पड़ जावे तो बिल्ली के झपटने के पूर्व ही चूहा अपने प्राण त्याग देता है। यहाँ उसकी अपनी क्षमता नहीं उसका मन हारता है, संकल्प हारता है, चरित्र हारता है। वह इस प्रवृत्ति को काबू नहीं कर पाता है, साहस नहीं रख पाता है तो जीवन हार जाता है।
"यावद् भय अनागत" अर्थात् जब तक भय आया नहीं है।
इसके एक अन्य पक्ष को देखा जाना चाहिये। डर के मूल कारण के संपूर्ण लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा सावधानी से करना चाहिए और तथाकथित डर के स्वरूप को स्पष्ट होने देना चाहिए। डर में आशंकाओं को विलय मत घोलो अलबत्ता डर के मूल कारणों पर गौर किया जाना जरूरी है।
"आगतम् तु भयं वीक्ष्य" अर्थात् "आए हुए भय को सामने देख कर"।
भय को सामने आने पर क्या करना है इसका निर्णय उसके आने के बाद ही किया जा सकता है। यदि डर से डरे नहीं तो मस्तिष्क के पास उपयुक्त समय और अवसर है उससे निबटने का।
"नरः कुर्यात् यथोचितम् ।।" अर्थात् "व्यक्ति उचित हो वह करता है।"
डर से डरे नही, पलायन नहीं किया, डर के सामने प्रकट होने पर उसके मूल कारण को जाना; समझा; उपाय विचारे और उससे साहस तथा धैर्य पूर्वक निबटने का यत्न किया तो डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
तब लगेगा कि सारा उपक्रम अपने आप में एक चुनौति लेकर आया था और एक सफलता दे कर चला गया।

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

"स्वप्न और उसकी प्रतीति"

'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम  रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं।
वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।

स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो पाती  हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है।
स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में  दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ?  वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा।

या मौला खर्च बढ़ा


मेरे जीवन की एक छोटी सी घटना

मैं चश्मे के काँच लगने की प्रतीक्षा में बैठा था, कटारिया औप्टीशियन के ८० वर्षीय मालिक से मैने पूछा एक वाक्य में अपने जीवन का अनुभूत आदर्श सन्देश बताइये।

वे तपाक से बोले-
मैं सुबह उठते ही बोलता हूँ ---

🙏या मौला! खर्च बढ़ा...

🤔🤔🤔
मैं आश्चर्य में उनकी ओर देखने लगा। इस पर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हर व्यक्ति की ऐसी ही प्रतिक्रिया उन्हे देखने को मिलती थी।
....
.....




उन्होंने पूछा -  कारण जानना नहीं चाहोगे?

मैने हाँ इसलिये नहीं कहा कि मैं तो खर्च कम करना चाहता हूँ,
और
ना इसलिये नहीं बोला कि शायद इसके पीछे अदृष्य जरूर कुछ होगा ही।

परन्तु

उन्होने कहा.....
....
.....
......

मैं उस खर्च को बढ़ाने की कह रहा हूँ  जिससे मैं
.......अपने परिवार के हर बड़े छोटे सदस्य का परिपालन कर सकूँ....
मेहमान की अच्छी आवभगत कर सकूँ....
असहाय की मदद कर सकूँ......
जितना बन पड़े सत्कार्यों में दान कर सकूँ....

और चूँकि.....

""अब खर्च मैंने मौला से माँगा है तो कहाँ से आएगा, इसकी फिक्र मौला ही करेंगे।""

मेरा चश्मा तैयार हो गया। मालिक मुस्कुराते हुए दुकान से निकला और स्कूटर पर बैठ कर लन्च पर चला गया।

मैं अवाक् रह गया कि---

उनमें कर्म की प्रतिष्ठा, अपनी जिम्मेदारी, परमार्थ का संकल्प और ईश्वर पर अटल विश्वास का अद्भुत समन्वय था।

सौन्दर्य जीवन का

उपासना, स्वप्न और बीज एक जैसे है। सामान्यतया तो ऐसा लगता है कि इनमें कुछ नहीं है लेकिन इनमे सब कुछ करने की क्षमता है।

उपासना, सपने और बीज। इन तीनों में एक विचित्र सा साम्य है। प्रत्यक्ष रूप में तो ऐसा लगता है कि ये तीनों ही अपने आप में कुछ नहीं लेकिन इनके गर्भ में असीम वैभव भरा पड़ा है। उपासना से आनन्द, सपने से जीवन और बीज से आगे सृष्टि का सृजन होता है। जिस तरह वटवृक्ष के एक बीज के भीतर एक वटवृक्ष और फिर उस एक वटवृक्ष के द्वारा पुनः अनगिनत बीजों का सृजन संभव है। उसी तरह एक उपासना में और सपने में अनंत सृजन की सम्भावना भरी पड़ी है। उपासना के अपने ढंग हो सकते हैं, सपनों के अपने आकार हो सकते हैं और बीज की अपनी बहुगुणन क्षमता हो सकती है परंतु एक बात तो तय है कि ये तीनों ही अपने भीतर वैभव की विशाल सम्पदा संजोए है। बगैर उपासना के परम की आराधना, बगैर सपनों के सार्थक जीवन और बगैर बीज के अग्रिम भविष्य के बीजों का होना अकल्पनीय है। आवश्यकता है इस क्षमता को पहचानने की, आवश्यकता है इनके महत्व को अनावृत्त करने की, आवश्यकता है इसके आचरण में लाने की।


अपने जीवन में सौंदर्य देखना चाहते हो तो आओ जरा मेरे साथ चल कर देखो।

हम में से हर एक के जीवन में यादों का विशाल भंडार भरा पड़ा है।
कुछ मधुर तो कुछ कड़वे,
कुछ आनन्द पूर्ण कुछ पीड़ा दायक,
कुछ अवसाद भरे तो कुछ प्रेरणास्पद।

कुछ ऐसे पल भी हैं कि जिनके कारण हमारा जीवन सँवर गया,  वहीँ कुछ ऐसे पल भी थे कि जो हाथ से फिसल गए और जिनके कारण सुनहरे अवसर का लाभ नहीं ले पाए।

अपनी याददाश्त को टटोल कर जैसा आप देखना चाहते हो वैसे-वैसे चुन कर देख लो, जो जो देखोगे उस-उस के अनुरूप अभी अनुभतियाँ सजग हो जाएगी। चुनाव आपका ही है कि आप इनमें से क्या पसंद करते हैं।

बेहतर ता यही होगा कि आप सुखानुभूति वाले पल चुनें। वे आपको गुदगुदाऐगे। आप और भी आनन्दित महसूस करेंगे। 

मूल की ओर जाओ

बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता परंतु आग ही नहीं पानी भी गर्म होने पर शरीर को जला सकता है। अंतर केवल पानी की विभिन्न स्थितियोँ का है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है और ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है। भाप से चलने वाले इंजिन में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। अग्नि का ऊर्जा रूप पानी के मूल स्वरुप में संग्रहित होता है और वही पानी वापस अपने मूल स्वरूप में लौटने पर उसी ऊर्जा स्खलन हो जाती है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अन्तर्निहित हो अथवा किसी स्रोत से मिले पर ऊर्जा का होना कर्म की प्रथम आवश्यकता है। गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता, ऊर्जा किसी स्रोत से मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परमात्मा के अक्षय ऊर्जा भंडार से ही मिलते है। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना लेले।

जीवन का उत्सव

जीवन का उत्सव

      हर सुबह मेरा एक नया जन्म होता है और मेरा यह दिन मेरे लिए एक संपूर्ण जीवन के बराबर है । मैं आज वह सब कुछ करूँगा जिसके लिए मेरे परमात्मा ने इस धरती पर मुझे जन्म दिया है । मेरा दुनिया में जीना व दुनिया से जाना दोनों ही सुरुचिपूर्ण होने चाहिए ।

"कीर्तिर्यस्य स जीवति।"

कायर व कमजोर होकर नहीं अपितु स्वाभिमान व आत्मज्ञान के साथ जीवन को जीना कला है। भगवान ने महान् कार्य करने हेतु हमारा सृजन किया है।
इसलिए न बहुत भागो! न बहुत भोगो !!  हड़बड़ा कर भागने वाले कायर, कमजोर लोग हैं तथा भोगी तो अविवेकी ही होते हैं। भागम-भाग तो दुनियाँ में सदा से मची है। हम भी इससे न बच पाएँगे। यहाँ हर कोई चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में से किसी न किसी को या सब को पाने के लिए भाग रहा है, लेकिन इस भागने में खुद को नहीं भूलना है।
रात विश्रान्ति के लिए, दिन भर का श्रम दूर करने के लिए थी। रात अनचाहे, अचीते स्वप्नों से भरी हो सकती है
अतः अब जागो !
जागो! जागने पर ही सवेरा ज्ञात हो पाएगा। बिना जागे सवेरा न देख पाओगे। जागते ही ऊषा की रक्तिम रश्मियाँ हमारा स्वागत करेगी। और जागने पर मन चाहे स्वप्न देख पाओगे। भुवन भास्कर परमात्मा का अव्यय स्वरूप है। अव्यय याने जो खर्च करे पर उसके पास खूटे ना। वह  इस रूप में करोड़ों साल से ऊर्जा खर्च कर रहा है पर खुटी नहीं। आज भी वह ऊर्जा लेकर आया है। घर बैठे पा लो। जीवन एक उत्सव है। यह जीवन परमात्मा का सबसे बड़ा उपहार है। यह देह देवालय, शिवालय व भगवान का मन्दिर है। यह शरीर अयोध्या है। इसमें अपने राम का, अपने इष्ट का एहसास करो।

"जीवन में सत्कर्म के फूलों की खेती होगी तो सौंदर्य और सुगन्ध एक साथ आवेगी।"

गुरु अमृत की खान

गुरु अमृत की खान

मैने सुना है - गुरू गाय है। दुधारू गाय। गाय के स्तनों में भरा दूध तब तक बाहर नहीं आता है जब तक उसका बछड़ा दूध पीने नहीं आता।
यह कपाट उसकी स्नेह मयी ममता से ही खुलता है। खुला ही रहता है जब तक बछड़ा तृप्त नहीं हो जाता। माँ पिलाती रहती है बछड़ा पीता चला जाता है। किसी को दूध दिखाई नहीं देता है।
एक तरफ स्रोत है , ममत्व है, देने का ही भाव है। दूसरी दूसरी तरफ ललक है, प्यास है, अनुरक्ति है और ग्रहण करने की चाह है।
मैने तो यह भी सुना है कि अगर गाय का आँचल (मालवा में गाय के स्तनों को आँचल कहते हैं) दूध से भरा हो और बछड़ा उसे न पिए तो उसके आँचल में दर्द होने लगता है? कहना बड़ी बात नहीं होगी कि दुधारू गाय को भी बछड़े की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसके ऊपर यह भी सत्य है कि बछड़े को दूध उसकी माँ ही पिलाएगी। यह रिश्ता है ममत्व का, दाता का, करुणा का, प्यास का, प्रेम का।

🌌
मैने यह भी सुना है कि गुरु बहती गंगा है। बीच में धार बहती है दोनों ओर रेत ही रेत है। सूखी रेत। किसी को प्यास लगी उसने १००-२०० मीटर दूर रेत में गड्ढा बनाया तो वह देखता है कि निर्मल, स्वच्छ नीर छन छन कर गड्ढे में तैयार है। गंगा को पता ही नहीं कौन आया और अपनी प्यास बुझा गया। लेकिन गंगा में जल है तो पोखर में पानी होगा, पोखर तब होगा जब कोई प्यासा होगा और पोखर तब होगा जब प्यास होगी, पोखर तब होगा जब प्यासा उसे खोदने का यत्न करेगा, और प्यास तब बुझेगी जब प्यासा जल पिएगा। "जल अजस्र होगा।" चाहे जितना पिए, पोखर भरता जाएगा। गंगा अपनी धारा ले कर कहीं बहती रहे। प्यासे के लिए वह रेत के भीतर से बह कर आवेगी। किसी को पता नहीं चलेगा गंगा वहाँ कैसे पहुँच गई। यहाँ रिश्ता है गंगा का और प्यासे का। प्यासे के विश्वास का कि पोखर में गंगा आवेगी, उसकी प्यास बुझाएगी। एक तृप्ति तक ले जाएगी।


मैने यह भी सुना है कि गुरू सितार है। कोई दूसरा सितार कहीं पास में रखा है। दोनों सितारों के तारों में अनुदैर्य का साम्य हो गया। अनुदैर्य याने वे समान फ्रीक्वेन्सी पर ट्यून्ड हैं। पहला सितार बजना प्रारंभ करता है। उसमें से स्वर लहरियाँ निकलती हैं। यह नाद है। यहाँ सप्तक है। सुरम्य तरंगें वातावरण गूँजती है। तरंगें दूसरे सितार तक पहुंचती हैं तब वह दूसरा सितार अपने आप बज उठता है। उसे कोई नहीं बजा रहा पर  अनुगूँज से ही बज उठता है। पहले सितार को पता ही नहीं चला कि दूसरा सितार बज उठा है।
बस वह मुख्य सितार तो बज रहा है, बजता जा रहा है। उसमें नाद है। नाद तो असल में ब्रह्म है। इसलिये यह ब्रह्मनाद ही है। जो बजाए से बजे वह तरंग है लेकिन कबीर कह गया कि जो बिना बजाए बज गया वही अनहद है। यहाँ रिश्ता है सितारों का, उनकी ट्यूनिंग का, नाद का, अनुनाद का, हद से अनहद-नाद का।

🛂रिश्ता🛐
रिश्ता गाय-बछड़े का, रिश्ता गंगा से प्यासे का, रिश्ता सितार-दर-सितार का-- रिश्ता है सद्गुरू से शिष्य का।
🙏🙏🙏🙏
वन्दन सहित....