Thursday, 22 September 2016

वैदिक मनोविज्ञान अंक २


वैदिक मनोविज्ञान

अंक २

"ज्योतिषां ज्योतिरेकम्"

बिजली के बल्ब में काँच है, फिलामेंट है। छत पर टँगा है। वह लगा इसलिए है कि जब भी हमें जरूरत हो तब बिजली की बटन दबाएं और हमें रोशनी मिल जाए। यह रोशनी मात्र बटन और बल्ब के कारण से नहीं है अपितु उसमें बहने वाली अद्दष्य विद्युत धारा से है। विद्युत धारा नहीं तो बल्ब में कोई चमक नहीं। इसकी रोशनी में हम वह देख पाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन कमरे में कुछ नहीं दिखने के कारण ये हैं :-

१, चीजें है ही नहीं
२, चीजें हैं देखने वाली आँखें नहीं है
३, चीजें भी हैं, आँखे भी हैं पर अंधेरा है।
४, चीजें हैं, आँखें है, वातावरण में उजेला भी है लेकिन आँखों में देख पाने की क्षमता नहीं है।

मतलब यह कि जिस कमरे में देखना है वहाँ चीजें हों, देखने वाली आँखें हों, प्रकाश हो और देखने वाली आँखों में देखने की क्षमता हो।
इस सबसे ऊपर एक और विचित्र बात वह है जिसे 'वैदिक मनोविज्ञान' ही समझा सकता है। वह यह कि सम्पूर्ण परिदृष्य में से सब कुछ मौजूद होने के बावजूद यदि चीजें दिखाई नहीं देती है तो उसका कारण है "मन"। हाँ,  केवल मन।

दो ढाई साल का बच्चा चलते-चलते जमीन पर गिर जाता है घुटनों से खून बहने लगता है। जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगता है। माँ जमीन ठोंक कर कहती है, देख! चींटी  मर गई। असल में तो वहाँ चींटी है ही नहीं, केवल मन की दिशा का परिवर्तन है। कभी चिड़िया दिखाने लगती है, कहती है, देख! चिड़िया उड़ गई। बालक का मन चींटी और चिड़िया में रम जाता है। रोना रुक जाता है, चाहे खून बहता रहे। मन घुटने से छूट कर चिड़िया और चींटी को देखने में टिक जाता है। त्वचा की संवेदना पीछे छूट जाती है क्योंकि मन अब कुछ और देख रहा है। मन उस संवेदना को प्रकाशित नहीं कर रहा।

संत सूरदास कहते हैं- "ऊधो मन न भए दस-बीस।" मन तो एक ही है, इधर लगा लो चाहे उधर और एक बार में एक तरफ ही जाता है।
यहाँ ठीक वैसा ही कुछ घट जाता है जैसे अन्धेरे में कुछ घट जाए और पता ही न चले। इससे यह भी स्पष्ट है कि मन के प्रकाश में ही समस्त जगत प्रकाशित होता है। मन के इस गुण के अभाव में समस्त जगत अप्रकाशित, अनजान और अज्ञान के अन्धकार से आवृत्त रह जावेगा। जिस प्रकार चीजें वहीं थीं, आँखें वही थी, आँखे सक्षम भी थी, देखने वाला व्यक्ति भी वही था पर मन ने नहीं देखा तो कुछ नहीं दिखा। मन ने संवेदना ग्रहण नहीं की लगा कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। मन ने देखा तो सब दिखा। आँखें मात्र इक्विपमेंट हैं, खिड़कियाँ हैं जहाँ से दृष्य भीतर प्रवेश कर रहे है।
आँखे ही नहीं समस्त इन्द्रियाँ भी मन के अनुशासन में हरकत करती हैं। जहाँ पर मन का प्रकाश होगा वही प्रकाशित होगा। मन के द्वारा सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषय के ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद जीभ नहीं अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को भाते हैं। मन उद्विग्न हो तो चंद्रकिरणें भी चुभन लगती हैं । विषयों की अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
"मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं।"
इसका अर्थ यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ ही कृत कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीवात्मा का दिव्य माध्यम है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो।

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)

इन्द्रिय रूपी अश्व उसी के अनुशासन में रहते हैं। उसी से उनके विषयों को जानने की क्षमता पाते है। इसलिए श्रुति ने मन को "इन्द्रियोँ की लगाम" कहा है। सामान्य अर्थों में मन ही इन्द्रियों और शरीर से सब कुछ करवाता है लेकिन स्पष्ट है लगाम कोई और धारण करता है वह है "जीवात्मा"। श्रुति मन को जड़ परिभाषित करती है। परन्तु बिना लगाम के रथ और घोड़े नहीं चल पाएंगे। इससे मन की महत्ता भी सिद्ध होती है। लेकिन यह भी स्वयंसिद्ध है कि ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ उस परमचेतना से ही अनुप्राणित हैं। "ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।"

"वैदिक मनोविज्ञान" अंक ३

"वैदिक मनोविज्ञान"  अंक ३

"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।" ।।यजुर्वेद ३४/१।।

अन्वयार्थ:-
यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु।

भावार्थ:-
जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी दूर दूर तक चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
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"वैदिक मनोविज्ञान"       अंक ३

"ज्योतिषां ज्योतिरेकं"

ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ, ज्योतियाँ अर्थात् प्रकाशित दीपशिखाएँ, ज्योतियाँ अर्थात् वे शक्तियाँ जिनके आलोक में उपस्थितों का ज्ञान हो।

मिट्टी के दीपक के तीन अवयव हैं; मिट्टी का दीपक, बाती और तेल। इसमें प्रकाश उत्सर्जन की अपूर्व क्षमता है और अभी यह प्रकाश करेगा भी लेकिन बिचारा अकेला कुछ नहीं कर सकता। एक ज्योति आती है इसकी बाती में ज्योति जगाती है और अप्रकट रूप में यहीं मौजूद रहती है तो मिट्टी का अप्रकाशित दिया भी प्रकाश देने लगता है। इस बाती से इसकी आई हुई ज्योति यदि चली गई तो दिया फिर अक्षम हो जावेगा। स्पष्ट है; इसकी ज्योति भी अन्य ज्योति से ज्योतित है।
उक्त तीनों स्थितियों और अर्थों में वे ज्ञान की प्रकाशक ही हैं। ज्ञान उसका जो है। बोध उसका जो अप्रकट था। ज्ञान उसका जो हम जान पाएँ। प्रकट होने पर भी अगर बोध न हो पाए, प्रकट होने पर भी यदि प्रकाशित वस्तु का तात्पर्य ग्रहण न हो पाए या तो प्रकट अथवा अप्रकट में कोई अन्तर नहीं हो तो सभी व्यर्थ है।
अन्धेरे कमरे में यदि टेबल पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो तो दिखेगा कैसे। देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए। चलिये अब प्रकाश के लिए हमने दीप जला कर रख दिया। टेबल पर रखी कोई वस्तु दिखाई देने लगी। यदि यह ज्ञान नहीं हो कि यह वस्तु गुलदस्ता है तो प्रकाशित हो जाने पर भी उसका लाभ नहीं हानि ही है।
वस्तुतः चीजों का प्रकाश तो एक ज्योति ने कर दिया परन्तु अभी एक और ज्योति अर्थात् ज्ञान की आवश्यकता है जो उसके मूल स्वरूप का ज्ञान दे सके। वस्तु को गुलदस्ते के रूप में हमारे भीतर डिस्टिंग्विश कर सके। रस्सी को रस्सी और साँप को साँप समझा सके तथा इनमें से किसी की आपस की भ्रान्ति न आ सके अर्थात् हम रस्सी को साँप न समझ लें।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ज्योति जो बाहरी है वह अपूर्ण अथवा अपर्याप्त है जिससे वह पूर्ण ज्ञान करा सके। इसे एक परम ज्योति की आवश्यकता है, इसे एक "शाश्वत" ज्ञान की बेकिंग या सपोर्ट चाहिए।
यह ज्योति मन ही है। मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी तो है ही पर उनके विषयों को उनका ज्ञान कराने वाला भी केवल यही है। कान सूँघ नहीं सकता, आँख सुन नहीं सकती आदि आदि। आँख को उसके विषय "देखने" की समझ केवल मन से ही आई है। आँखें देखती रहे तो भी सब अनदेखा रह जाएगा यदि उसे मन ने नहीं देखा। सुना सब अनसुना रह जाएगा यदि मन ने नहीं सुना। इसकी क्वालिटी और तात्पर्य भी मन ही निकालता है; जैसे आम आदमी के पाँव को छूने और गुरू के पाँव को छूने का भेद भी मन ही जानता है। छूने का ज्ञान त्वचा से हुआ पर उसे मन ही समझ कर ग्रहण करता है। इस गुणात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
"वैदिक मनोविज्ञान" विश्व का सर्वश्रेष्ठ मनोविज्ञान है जो पाश्चात्य मनोविज्ञान से भिन्न है। उनका मनोविझान व्यवहार पर आधारित है जबकि "वैदिक मनोविज्ञान" आदमी के अन्तःकरण के संश्लेषण पर आधारित है।

श्रुति कहती है; "ज्योतिषां ज्योतिरेकं"।